कुछ इस तरह चला नीलामी का पूरा खेल....

मैडिसन एविन्यू में 595 नंबर में महात्मा गाँधी की कुछ निजी वस्तुओं की नीलामी होनी थी.
भारत लौटेंगी गाँधीजी की वस्तुएँ
पिछले कुछ दिनों से भारतीयों के बढ़ते गुस्से और फिर रूचि के बाद अंतत: नीलामी होने का वक्त आ गया था. लेकिन ये क्या - यदि उन चीज़ो के मालिक का बस चलता तो नीलामी होती ही नहीं....
जैसे ही टीवी कैमरामैनों की भीड़ स्वयंभू गाँधीवादी केलीफ़ोर्निया के जेम्स ओटिस के पास पहुँची, उन्होंने पहले तो पल्ला ही झाड़ लिया और कहा कि बहुत हो गए विवाद...
राष्ट्रीय धरोहर
अगर इसमें मीडिया की इतनी रूचि नहीं होती तो यह ज़्यादा आसान रहता संत सिंह चटवाल, भारतीय-अमरीकी होटल मालिक
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बहुत दिनों से भारतीय सरकार इस बिक्री को रोकने की कोशिश कर रही थी. अंत में ओटिस ने नीलामी वापस लेने की घोषणा भी कर दी थी.
उन्होंने कहा, "मैं इस नीलामी से कोई विवाद खड़ा नहीं करना चाहता था. मैं प्रार्थना करता हूँ कि इसका परिणाम सकारात्मक और ऐसा हो जिसे गाँधीजी भी सही ही मानते."
जबसे ओटिस ने गाँधीजी की वस्तुओं को नीलाम करने की बात की, भारत सरकार ने अपना विरोध ज़ाहिर किया. भारतीय जनता की ओर से भी इसका भारी विरोध किया जा रहा था.
इन वस्तुओं में महात्मा गांधी का एक चश्मा, जेब घड़ी, एक जोड़ी चमड़े की चप्पलें, एक कटोरी और पीतल की वह थाली शामिल हैं जिसमें महात्मा गांधी ने 1948 में अपनी हत्या से पहले अंतिम बार भोजन किया था.
इस नीलामी में महात्मा गाँधी की जेब घड़ी भी शामिल थी
नीलामी घर में अनेक लोग जमा थे और सबके मन में यही सवाल था कि क्या नीलामी रुकेगी?
भारत के कुछ सबसे धनी कुछ लोग और उनके प्रतिनिधियों को भी यकीन नहीं था कि वे राष्ट्रीय धरोहर को बचा भी पाएंगे या नहीं.
नीलामी का बुख़ार
और तब – 'लौट नंबर 364' की घोषणा हुई.
नीलामी करने वाले ने कहा, "मैं इसे 20 हज़ार से 30 हज़ार डॉलर से शुरू करता हूँ."
यही इस सामान की बिक्री का पहला आकलन था और यह शुरूआत थी. कुछ ही सेकेंड के अंदर बोली एक लाख डॉलर और फिर दो लाख डॉलर तक पहुँच गई. कमरे में सन्नाटा छा गया.
टेलीफ़ोन पर, इंटरनेट पर और कमरे से लगाई जा रही बोलियों के बीच ब्रिटेन के किसी अनजान व्यक्ति की ओर से एक और बोली लगी.
मुझे लगता है कि इसका सही मूल्य यही नहीं बल्कि इससे भी कहीं ज़्यादा है. अगर आप महात्मा गाँधी की धरोहरों और उनके आदर्शों को देखें तो उसके लिए यह दाम ज़्यादा नहीं हैं विजय माल्या के प्रतिनिधि टोनी बेदी
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और नीलामीकर्ता ने अपना हथौड़ा बजाते हुए कहा, छह लाख डॉलर......
भौतिकतावाद को नकारने वाले गाँधीजी की वस्तुओं की नीलामी और इस तरह लग रही आक्रामक बोली -- हो सकता है ये उनकी भी बर्दाश्त के बाहर होता...
दामों के तरह, इस नीलामी में लोगों की रुचि भी भारत सरकार की नीलामी रोकने की कोशिशों के साथ पिछले कुछ दिनों से तेज़ी से बढ़ी थी.
इस नीलामी में दिलचस्पी इसलिए भी बढ़ गई थी क्योंकि भारत सरकार ने कूटनयिकों को भेज नीलामी रुकवाने के प्रयास किए थे. सरकार ने कहा था कि 'राष्ट्रपिता की धरोहर वापस भारत लानी होगी.'
विवाद
नीलामी में भाग लेने आए भारतीय-अमरीकी होटल मालिक संत सिंह चटवाल ने नीलामी से पहले मुझसे कहा था, "अगर इसमें मीडिया की इतनी रूचि नहीं होती तो यह ज़्यादा आसान रहता."
उन्होंने कहा, "इसे बहुत मुश्किल बना दिया है. इसके रिज़र्व दाम ही 20 हज़ार से 30 हज़ार डॉलर हैं और मुझे पता लगा है कि रिज़र्व दाम अब ढाई लाख से तीन लाख डॉलर हो जाएँ."
फिर भी वह भारत की धरोहर भारत लाने के लिए यह दाम चुकाने को तैयार थे. अंत में नीलामी पूरी हुई. पूरे 18 लाख डॉलर में बिक्री संपन्न हुई.
मंदी चल रही है? कैसी मंदी?
और किसके लिए. पहले तो स्पष्ट ही नहीं था. फिर पता लगा कि गाँधीजी की चप्पलें शायद भारत पहुँच जाएं.
भारत वापसी
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस सामान को जनता के दर्शन के लिए रखा जाएगा या नहीं
ख़रीदार भारत के सर्वाधिक संपन्न लोगों में से ही एक थे. ये थे यूनाइटेड ब्रूयरीज़ के अध्यक्ष विजय माल्या जो पूरे वक्त फ़ोन पर अपने प्रतिनिधि टोनी बेदी से बात कर रहे थे.
टोनी बेदी सफ़ेद पगड़ी और बेहतरीन पोशाक में सामने ही बैठे थे. मैंने उनसे पूछा, "क्या इस सामान का मूल्य वाकई 18 लाख डॉलर है?"
उन्होंने कहा, "निश्चित रूप से...मुझे लगता है कि इसका सही मूल्य यही नहीं बल्कि इससे भी कहीं ज़्यादा है. अगर आप महात्मा गाँधी की धरोहरों और उनके आदर्शों को देखें तो उसके लिए यह दाम ज़्यादा नहीं हैं."
मैंने पूछा, "यह सामान अब कहाँ जाएगा? उन्होंने कहा, "शायद भारत."
मैंने पूछा, "क्या इसे जनता के दर्शन के लिए रखा जाएगा?" उन्होंने कहा, "मुझे नहीं पता, शायद यह डॉक्टर माल्या ही तय करेंगे." कुछ लोग देख रहे थे कि यह सारा मामला क्या है.


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