भारत लौटेंगी गाँधी की वस्तुएँ

विजय माल्या की ओर से टोनी बेदी ने नीलामी में हिस्सा लिया और सफल बोली लगाने के बाद स्पष्ट किया कि बापू के सामान भारत सरकार को लौटाए जाएंगे.
नीलामी की प्रक्रिया शुरु होते ही बापू के स्मृति चिन्हों के संग्रहकर्ता जेम्स ऑटिस इन्हें बेचने की घोषणा से पलट गए और नीलामी रोकने की अपील की.
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. हालाँकि नीलामी के बाद उन्होंने इस बात पर खुशी जताई कि किसी भारतीय की ओर से सफल बोली लगी.
जेम्स ऑटिस ने आख़िरी क्षणों में नीलामी रोकने की अपील की
महात्मा गांधी का एक चश्मा, जेब घड़ी, एक जोड़ी चमड़े की चप्पलें, एक पीतल की थाली और कटोरी के लिए अंतिम बोली 18 लाख डॉलर (लगभग साढ़े नौ करोड़ रुपए) की लगी.
नीलामी करने वाली कंपनी एंटीकोरम ने महात्मा गाँधी की इन निजी वस्तुओं की आरक्षित क़ीमत 20 से 30 हज़ार अमरीकी डॉलर के बीच रखी थी.
हालाँकि कंपनी ने घोषणा की है कि दो हफ़्ते तक ये सामान ख़रीदार को नहीं दिए जाएंगे ताकि किसी भी संभावित क़ानूनी विवाद को सुलझाया जा सके.
'देश के लिए बोली'
टोनी बेदी ने कहा कि बापू के सामान भारत की धरोहर हैं और इन्हें सरकार को सौंपा जाएगा.
उनका कहना था, "मुझे विश्वास है कि सभी भारतीय इस बात से खुश होंगे कि बापू की वस्तुएँ अपने देश में लौट रही है."
मुझे विश्वास है कि सभी भारतीय इस बात से खुश होंगे कि बापू की वस्तुएँ अपने देश में लौट रही है टोनी बेदी
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उन्होंने स्पष्ट किया कि इन सामानों को अपने पास रखने का माल्या का कोई इरादा नहीं है. टोनी बेदी ने कहा कि वो अपने देश के लिए बोली लगा रहे थे.
न्यूयॉर्क में भारतीय वाणिज्य दूतावास की प्रेस प्रवक्ता डॉ नीना मल्होत्रा ने इस नीलामी की पुष्टि की है और स्पष्ट किया है कि भारत सरकार ने इस नीलामी में हिस्सा नहीं लिया.
विरोध
भारत सरकार शुरु से ही इस नीलामी का विरोध कर रही थी. उसका तर्क था कि यह भारत की राष्ट्रीय धरोहर है और इसकी नीलामी नहीं की जानी चाहिए.
फ़िलहाल ये वस्तुएँ नीलाम घर के पास हैं
सरकार ने इसे रोकने के लिए नीलाम कर रहे जेम्स ओटिस से संपर्क भी किया था और अमरीकी प्रशासन से भी संपर्क किया गया था.
डा नीना मल्होत्रा के अनुसार दिल्ली हाईकोर्ट के आदेशों का पालन करते हुए सरकार ने नीलामी में हिस्सा नहीं लिया.
उनका कहना है कि सरकार की ओर से अमरीका प्रशासन को इस अदालती आदेश से अवगत करवा दिया गया था.
यह पूछे जाने पर कि नीलामी हो जाने के बाद अब भारत सरकार का अगला क़दम क्या होगा, उन्होंने कहा कि इस समय वे और कोई जानकारी देने की स्थिति में नहीं हैं.
संग्रहकर्ता जेम्स ओटिस ने पहले तो भारत सरकार के सामने कई शर्तें रखीं थीं जिसे मानने से भारत सरकार ने इनकार कर दिया था.
लेकिन बाद में जेम्स ओटिस नीलामी रोकने के लिए राज़ी हो गए थे. हालांकि यह पता नहीं चल सका था कि वे किन शर्तों पर नीलामी रोकने पर राज़ी हुए हैं.
ओटिस का फ़ैसला
मैं इस नीलामी से कोई विवाद खड़ा नहीं करना चाहता था जेम्स ओटिस, संग्रहकर्ता
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नीलामी से कुछ ही देर पहले महात्मा गांधी की निजी वस्तुएँ नीलामी से हटाने की घोषणा करते हुए जेम्स ओटिस ने कहा था, "मैं इस नीलामी से कोई विवाद खड़ा नहीं करना चाहता था."
उनकी ओर से यह स्पष्ट भी किया गया कि वे ये नीलामी पैसे के लिए नहीं कर रहे थे.
इससे पहले जेम्स ओटिस के सलाहकार प्रोफ़ेसर लेसलर कर्ट्स ने भी टेलीविज़न चैनल 'टाइम्स नाउ' से हुई बातचीत में कहा है कि जेम्स ओटिस ने इस नीलामी को रोकने का फ़ैसला किया है.
प्रोफ़ेसर कर्ट्स के अनुसार जेम्स ओटिस चाहते हैं कि महात्मा गांधी के विचारों का प्रचार-प्रसार हो जिससे की नई पीढ़ी को गांधी के विचारों से परिचित करवाया जा सके.
उन्होंने कहा कि जेम्स ओटिस भारत में ग़रीबों की स्थिति, ख़ासकर उनको मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर चिंतित हैं, जो गांधी के विचारों के अनुरुप भी है.
क़ीमत
उल्लेखनीय है कि नीलामी रोकने के लिए जेम्स ओटिस ने भारत सरकार के सामने कुछ शर्तें रखीं थीं.
गांधी जी के सामानों की नीलामी करने वाले जेम्स ओटिस ने अपनी शर्त में कहा था कि अगर भारत सरकार अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा ग़रीबों के स्वास्थ्य की देखभाल पर ख़र्च करे तो वह महात्मा गांधी कि निजी वस्तुओं को नीलामी से वापस ले सकते हैं.
इसके जवाब में विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा ने कहा कि ओटिस इस बात को जानते हैं कि भारत सरकार ग़रीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओं के अलावा भी ग़रीबों की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर बजट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ख़र्च करती है.
ओटिस की इस मांग पर कि भारत अपने दूतावासों के ज़रिए दुनिया के 78 देशों में गांधीवादी विचारों के प्रचार-प्रसार में मदद करे, विदेश राज्य मंत्री ने कहा कि भारत पहले से ही महात्मा गांधी के विचारों को बढ़ावा दे रहा है.


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