मिग-23 विमान को वायुसेना ने कहा अलविदा
समारोह की अध्यक्षता वायु सेना अध्यक्ष एयर चीफ मार्शल फाली होमी मेजर ने की। स्क्वैड्रन 221 के विग कमांडर वाई.जे. जोशी और स्क्वैड्रन लीडर टी. आर. साहू ने मिग-23 विमान की अंतिम उड़ान भरी।
स्क्वैड्रन 221 ही एक मात्र ऐसी स्क्वैड्रन है जिसकी सूची में मिग -23 बीएन विमान शामिल हैं। यह स्क्वैड्रन 'वेलियन्टस' नाम से सुविख्यात है। 1963 में बैरकपुर में स्क्वैड्रन लीडर एक छतरथ के साथ 22 अधिकारियों की कमान में इस स्क्वैड्रन का गठन किया गया था। शुरू में इस स्क्वैड्रन में वेम्पायर, स्पिटफायर और हरिकेन विमान थे। दिसम्बर, 1971 में पूर्वी बंगाल में भारतीय सेना की सहायता के लिए चुने जाने के बाद इसे संचालन इकाई के नाम से सुशोति किया गया ।
1970 के दशक के अंतिम वर्षो में भारतीय वायुसेना की वायुयान से सामरिक हवाई हमले की आवश्यकता के परिणामस्वरूप 24 जनवरी, 1981 को मिग -23 बी एन को शामिल किए जाने के साथ 'वेलियंट' विमानों के स्विग - विग युग में प्रवेश किया।
उत्तरी लद्दाख में सियाचिन ग्लेशियर को बचाने के लिए चलाए गए आपरेशन मेघदूत के लिए इस स्क्वैड्रन को सावधान किया गया था। तब 4 अप्रैल, 1984 को इस विमान ने संचालन का पहला प्रदर्शन किया। इसने 1985 में जम्मू कश्मीर में बनिहाल दर्रे को रात के समय पार करने वाले पहले लड़ाकू विमान की अद्वितीय विशेषता प्राप्त की।
25 मई, 1999 को 'आपरेशन सफेद सागर' चलाया गया। भारतीय वायु सेना को अगली सुबह की पहली किरण के साथ आक्रामक हवाई कार्रवाई शुरू करनी थी। मिग- 23 बी एन को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। उस का लक्ष्य टाइगर हिल पर शत्रु के ठिकानों पर 57 एमएम राकेट और 500 किलोग्राम वजन वाले बम गिराना था। 26 मई से 15 जुलाई के बीच के 7 सप्ताहों के दौरान इस स्क्वैड्रन ने 155 आक्रमक उड़ानें भरीं जो दिसम्बर, 1971 के दौरान भरी गयी आक्रमक उड़ानों से कहीं अधिक थीं, जो कि उस क्षेत्र में गिराये गए कुल सामग्री का 28 प्रतिशत और उड़ानों का 30 प्रतिशत था।
कारगिल लड़ाई के दौरान इस विमान को द्रास और कारगिल की ऊंची पहाड़ियों पर सर्वाधिक शस्त्र छोड़ने का गौरव प्राप्त हुआ। मिग 23 ने राष्ट्र की सेवा करते हुए एक लाख 54 हजार घंटे से अधिक समय तक उड़ानें भरीं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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