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गांधी की निशानियां भारत आएंगी (लीड-3)

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इस बीच उद्योगपति विजय माल्या ने शुक्रवार को कहा कि भारतीय अधिकारियों ने गांधी की वस्तुओं को खरीदने को लेकर उनसे कोई संपर्क नहीं किया है लेकिन वे उन वस्तुओं को सरकार को भेंट कर देंगे। जबकि केंद्रीय संस्कृति व पर्यटन मंत्री अंबिका सोनी ने कहा कि विजय माल्या ने गांधीजी की वस्तुओं को भारत सरकार के सहयोग से खरीदा है।

माल्या ने न्यूयार्क में अपने प्रतिनिधि द्वारा बोली जीतने के कुछ घंटे बाद फ्रांस में सीएनएन-आईबीएन को बताया, "मैंने जिन वस्तुओं को खरीदा है, उनके बारे में आगे की बात सोच रहा हूं और इस मसले को जल्द ही निपटा लिया जाएगा।"

माल्या ने कहा, "भारत सरकार के किसी भी व्यक्ति ने मुझसे संपर्क नहीं किया है। लेकिन इन वस्तुओं को खरीद कर भारत सरकार को भेंट करने में मुझे भावनात्मक संतुष्टि मिलेगी।"

इससे पहले भारत सरकार के कड़े विरोध और दिल्ली उच्च न्यायालय की रोक तथा ऐन मौके पर अमेरिकी संग्रहाक जॉन ओटिस द्वारा स्वयं भी पीछे हटने के बावजूद एंटीकोरम ऑक्शनीयर्स ने गांधी की वस्तुओं की नीलामी की।

इन वस्तुओं में गांधीजी का चश्मा, वर्ष 1910 की घड़ी, एक जोड़ी चप्पलें, कटोरा, एक थाली शामिल हैं।

अमेरिकी न्याय विभाग ने नीलामी करने वाली संस्था से कहा है कि वह इन वस्तुओं को दो सप्ताह तक अपने पास रखे।

पूर्व सांसद एवं यूबी समूह के मालिक माल्या की ओर से बोली लगाने वाले टोनी बेदी ने बाद में घोषणा की कि ये निशानियां भारत जाएंगी और इन्हें जनता के दर्शनार्थ रखा जाएगा।

बेदी ने संवाददाताओं को बताया, "मुझे पक्का यकीन है कि सभी भारतीयों को ये जानकर बहुत खुशी होगी कि गांधीजी की वस्तुएं देश में लाई जा रही हैं।"

इससे पहले बुधवार को नीलामी को रुकवाने की सशर्त पेशकश करने वाले ओटिस ने गुरुवार को नीलामी से वस्तुएं हटाने की घोषणा की। नीलामी संस्था द्वारा उन वस्तुओं की नीलामी कराने के बाद ओटिस के वकील ने इस बिक्री को अवैध करार दिया।

उनके वकील रवि बत्रा ने कहा कि मसला महात्मा गांधी की धरोहर की नीलामी का नहीं था। ओटिस ने बिक्री से पहले संवाददाताओं से कहा, "मेरी मंशा विवाद खड़ा करने की नहीं थी। शुक्र है कि इसका नतीजा सकारात्मक रहा।"

उन्होंने कहा कि अगर भारत सरकार गरीबों पर खर्च बढ़ाने को राजी हो जाती, वे उन्हें भारत को दान कर देते।

नीलामी के दौरान कक्ष में मौजूद दस से ज्यादा व्यक्तियों, टेलीफोन के माध्यम से 30 व्यक्तियों और लिखित रूप से 20 से ज्यादा लोगों ने बोली लगाई।

गांधी की वस्तुएं बिक्री के लिए पेश करते हुए पियानो की धुन के बीच उनका स्लाइड शो प्रदर्शित किया गया। इस दौरान वहां सन्नाटा छा गया। वस्तुओं का मूल्य 10,000 डॉलर रखा गया था लेकिन बोली शुरू होने के दो मिनट बाद ही इनकी कीमत दस लाख डॉलर तक पहुंच गई।

नीलामी के दौरान एक समय तो माल्या के प्रतिनिधि बेदी और भारत के पूर्व क्रिकेटर दिलीप दोषी के गर्नसे ऑक्शन हाउस के प्रतिनिधि एर्लेन एटनर के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली।

इस बीच भारतीय वाणिज्य दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि इस नीलामी में भारत सरकार ने भाग नहीं लिया। क्योंकि ऐसा करना दिल्ली उच्च न्यायालय की अवमानना होती। प्रवक्ता ने इस बात का खंडन किया है कि भारत के महावाणिज्य दूत प्रभु दयाल के साथ ओटिस की बुधवार की बैठक के बाद भी दूतावास ने गुरुवार को भी उनसे चर्चा जारी रखी।

नई दिल्ली में केंद्रीय संस्कृति व पर्यटन मंत्री अंबिका सोनी ने कहा, "संप्रग (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सरकार ने सफलतापूर्वक महात्मा गांधी की वस्तुओं को खरीद लिया है। इन वस्तुओं को महात्मा गांधी ने अपने जीवन काल में एक व्यक्ति को दान कर दिया था। हम एक भारतीय के सौजन्य से उन वस्तुओं को हासिल करने में सफल हो गए हैं। हम माल्या और उनके प्रतिनिधि से बराबर संपर्क में थे।"

सोनी ने कहा, "चूंकि दिल्ली उच्च न्यायालय ने नवजीवन ट्रस्ट के माध्यम से इन वस्तुओं की नीलामी पर रोक लगाई है। लिहाजा इन वस्तुओं के मालिकाना हक के मसले को हल करने में दो हफ्ते और लग सकते हैं।"

ज्ञात हो कि महात्मा गांधी ने वर्ष 1929 में अपनी सभी निजी वस्तुओं का मालिकाना हक नवजीवन ट्रस्ट के नाम कर दिया था।

सोनी ने कहा, "हम नीलामी को इसलिए रोकना चाहते थे क्योंकि हम मानते हैं कि महात्मा गांधी निजी संपत्ति में विश्वास नहीं करते थे। हमारे लिए वे अमूल्य हैं और हम उनकी कोई कीमत निर्धारित नहीं कर सकते।"

उधर देशवासियों में इस बात को लेकर खुशी है कि वे वस्तुएं अंतत: भारत वापस आ गईं। महात्मा गांधी की पौत्री और गांधी स्मृति व दर्शन समिति की उपाध्यक्ष तारा गांधी भट्टाचार्य ने कहा, "हमने भरसक कोशिश की। हमारी बड़ी जीत यह रही कि भारत शांत होकर नहीं बैठा रहा।"

भट्टाचार्य ने आईएएनएस को बताया, "इस मामले को लेकर हम जितने चिंतित थे उतना कुछ होहल्ला नहीं हुआ। मैं इस बात से खुश हूं कि देश के युवा व बुजुर्ग समान रूप से इस मामले को लेकर चिंतित दिखाई दिए। मीडिया ने भी अपनी भूमिका निभाई।"

महात्मा गांधी के पौत्र तुषार गांधी ने कहा, "मैं बहुत खुश हूं, वाकई बहुत खुश हूं।" उन्होंने कहा कि पूर्व क्रिकेटर दिलीप दोषी भी इन वस्तुओं की बोली लगा कर उन्हें भारत लाने की कोशिश में थे।

तुषार ने एक समाचार चैनल को बताया, "हमने वहां एक सुरक्षा जाल बिछा कर रखा था। दोषी भी इन वस्तुओं की बोली लगा रहे थे। लेकिन जब हमने महसूस किया कि एक भारतीय बोली उनके खिलाफ लगाई जा सकती है तो उन्होंने अपनी बोली 17 लाख डॉलर पर रोक दी।"

गुजरात स्थित साबरमती आश्रम के निदेशक अमृतभाई मोदी ने कहा कि उद्योगपति विजय माल्या द्वारा महात्मा गांधी की वस्तुओं की बोली लगाकर उन्हें स्वदेश लाया जाना प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का क्षण है।

मोदी ने कहा, "माल्या इन वस्तुओं को नई दिल्ली में राजघाट स्थित राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय को भेंट कर सकते हैं या फिर महात्मा गांधी से जुड़ी देश की किसी भी संस्था को दे सकते हैं।"

मोदी ने कहा, "यह हमारे लिए एक ओछा विचार होगा कि गांधी की वस्तुओं को रखने का अधिकार मात्र साबरमती आश्रम को ही है। गांधीजी पूरे देश के हैं, न कि सिर्फ साबरमती आश्रम के।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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