क्या ज़रूरी है आदर्श या सामान?

गाँधी को अपनी तरह से भुनाने और उनके आदर्शों-विचारों को नहीं मानने का सिलसिला कोई नया नहीं है, बल्कि इसकी शुरूआत स्वतंत्र भारत के जन्म के साथ ही हुई.
इस समय सरकार अमरीका में नीलाम की जा रही महात्मा गाँधी की निजी वस्तुओं को हर हाल में वापस लानी चाहती है, लेकिन मैं समझता हूँ कि जिस चीज़ को गाँधी ने ख़ुद दे दिया था, उसे वापस लाने के विचार से गाँधी भी सहमत नहीं होते.
इस नीलामी को भारत की गरिमा से जोड़ा जा रहा है. सरकार उन वस्तुओं को हासिल करने के लिए करोड़ो रुपए ख़र्च करने जा रही है. लेकिन सवाल ये है कि सरकार गाँधी के किन-किन सामानों को लाएगी और कहाँ-कहाँ से लाएगी?
मुझे लगाता है कि अगर सरकार गाँधी की स्मृतियों को बचाना और एकत्र करना चाहती तो करे, इस पर आपत्ति तो नहीं की जा सकती.
कोदाल आयोग की रिपोर्ट
इस अवसर पर हमें अतीत के पन्नों को पलटना होगा, कोदाल आयोग की रिपोर्टों पर चर्चा करनी पड़ेगी, आपने आप से ये सवाल भी करना पड़ेगा कि आख़िर जो सरकार गांधी के निजी सामानों को बाहर से वापस लाना चाहती है, वही सरकार कोदाल आयोग की रिपोर्टो पर कार्रवाई नहीं करती?
कोदाल आयोग ने कहा था कि गाँधी संग्रहालय से गाँधी की लगभग छह हज़ार चिट्ठियाँ ग़ायब हो चुकी हैं. इस सिलसिले में अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई.
गाँधी के सामानों को ख़ुद गाँधी के भक्तों ने भी ही उठा लिया. ग़ायब चिट्ठियाँ क्यों नहीं हासिल की जा रही हैं?
फिर भी सरकार को लगता है कि गाँधी की स्मृतियों को बचाया जाना चाहिए तो इसके लिए एक राष्ट्रीय नीति बनानी चाहिए, तब जाकर इस मामले में प्राथमिकताएँ तय हो सकेंगी.
सबसे पहले गाँधी के नाम पर बने संस्थाओं को आज़ाद कराया जाए., जहाँ उनके सामानों के साथ छेडछाड़ होती है, चोरियाँ होतीं हैं या उनके भक्त ही सामान उठा ले जाते हैं.
संस्थाएं काठ हो गईं
सरकार ने इन सामानों को वापस लाने के लिए अपने प्रयास तेज़ कर दिए हैं
सरकार को ये चीज़ें क्यों नहीं दिखतीं कि गाँधी के नाम पर बनी संस्थाएं अब काठ हो गई हैं और वो जीवंत नहीं रहीं. दूसरी तरफ़, बाज़ारवाद की वजह से गाँधी की संस्थाएं गली और कूचों में सिकुड़ती जा रही हैं, उनके संरक्षण के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा है. इस सिलसिले में क़दम उठाने की आवश्यकता है.
ये बात भी ग़ौर करनी चाहिए कि गाँधी की संस्थाएं सिर्फ़ पर्यटक स्थल बनती जा रही हैं, लोग आ रहे हैं ये अच्छी बात है लेकिन इससे काम नहीं चलने वाला है.
मैं स्पष्ट करना देना चाहता हूँ कि मैं सिर्फ़ गाँधी की स्मृतियों को बचाने के लिए एक राष्ट्रीय नीति का समर्थक हूँ, उनके आदर्शों और विचारों के लिए किसी संस्था की कोई आवश्यकता नहीं है.
मैं ये भी मानता हूँ कि अगर हम गाँधी के आदर्शों और विचारों को और शक्ति देना चाहते हैं तो उनकी स्मृतियों के संरक्षण के लिए बनी संस्थाओं को सरकारी मैनजरों से आज़ाद कराना होगा.
मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि वर्ष 2002 में गुजरात दंगों के दौरान साबरमती आश्रम के बाहर लोग मारे जा रहे थे, लेकिन उनको बचाने के लिए कोई नहीं आया क्योंकि वे लोग गाँधी के आदर्शें से संस्कारित नहीं थे और न ही उनमें गाँधीवाद की भावना थी.


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