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रेड क्रॉस ने 'मानवीय संकट' की चेतावनी दी

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अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस ने श्रीलंका सरकार और तमिल विद्रोहियों दोनों से अपील की है कि वे संघर्ष में फँसे हुए लगभग डेढ़ लाख लोगों को वहाँ से निकलने दें. अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस इस तरह की सीधी अपील आम तौर पर नहीं करता.

मगर उसका कहना है कि संघर्ष वाले इलाक़ों में आम नागरिक जिस तरह फँसे हुए हैं वो बिल्कुल किसी 'नरक' की तरह है.ऐसा लग रहा है कि श्रीलंका में जारी ये संघर्ष अब निर्णायक दौर में है जहाँ तमिल विद्रोही अपने नियंत्रण वाले सभी नगरों पर से तो नियंत्रण खो ही चुके हैं, जंगलों में उनके गढ़ों पर भी सेना की कार्रवाई जारी है.

इन दोनों पक्षों के बीच फँसे हैं लगभग डेढ़ लाख आम लोग. उनमें से काफ़ी लोग बच निकलने के लिए समुद्र तटों का रुख़ कर रहे हैं और रेड क्रॉस ने उन लोगों को सुरक्षित निकाला भी है.

हालात गंभीर

मगर रेड क्रॉस के दक्षिण एशिया के प्रमुख जैक डि मेयो ने स्थिति को नरक जैसा बताया, " हम जब समुद्र तट पर पहुँचे तो वहाँ भी गोलाबारी हो रही थी, गोलियाँ चल रहीं थीं और हज़ारों लोग तट पर थे.''

 चिकित्सा की कोई सुविधा वहाँ नहीं है...पिछले दो हफ़्तों में हमने दो हज़ार लोगों को निकाला तो है मगर जो लोग छूट गए हैं उनके बारे में हम हमेशा ही सोचते रहते हैं   जैक डि मेयो, अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस

 चिकित्सा की कोई सुविधा वहाँ नहीं है...पिछले दो हफ़्तों में हमने दो हज़ार लोगों को निकाला तो है मगर जो लोग छूट गए हैं उनके बारे में हम हमेशा ही सोचते रहते हैं

उनका कहना था,'' चिकित्सा की कोई सुविधा वहाँ नहीं है क्योंकि जो थीं वो ध्वस्त हो चुकी है. हमारे लोग जब वहाँ से लोगों को निकालने जाते हैं तो वे सभी को नहीं निकाल पाते और पिछले दो हफ़्तों में हमने दो हज़ार लोगों को निकाला तो है मगर जो लोग छूट गए हैं उनके बारे में हम हमेशा ही सोचते रहते हैं."

डि मेयो संघर्ष वाले इलाक़ों में 20 साल से काम करते रहे हैं मगर इतने बड़े पैमाने पर उन्होंने पहले कुछ नहीं देखा,

उनका कहना था " मैंने अब तक जो भी देखा है उसमें से ये निश्चय ही सबसे नाटकीय स्थितियों में से एक है क्योंकि जो लोग वहाँ तड़प रहे हैं या मर रहे हैं उन्हें तुरंत वहाँ से निकाला जा सकता है, उन्हें मानवीय सहायता पहुँचाई जा सकती है."

तमिल विद्रोही दरअसल उन संघर्ष वाले इलाक़ों से आम लोगों को बाहर जाने देना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें डर है कि अगर ऐसा हुआ तो फिर वहाँ सैनिक कार्रवाई के लिए सेना को खुला हाथ मिल जाएगा.

उधर सरकार उन इलाक़ों में ज़्यादा सहायता सामग्री जाने नहीं दे रही है और उसका कहना है कि मानवीय संगठन वहाँ जितने लोगों के फँसे होने का दावा कर रहे हैं उतने आम लोग वहाँ नहीं हैं.

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