रंग शाला में बदली इंदौर की केन्द्रीय जेल
इंदौर, 3 मार्च (आईएएनएस)। जेल का जिक्र आते ही दिमाग में ऊंची-ऊंची दीवारों के बीच खूंखार अपराधियों की तस्वीर उभरने लगती है, मगर इंदौर की केन्द्रीय जेल का नजारा इससे कुछ जुदा है। अब यहां के कैदी बन गए हैं कलाकार और उनके लिए जेल की दीवारें बन चुकी है कैनवास। दीवारों पर बने भारत माता से लेकर कई अन्य देवी देवताओं के चित्र और बिखरा पड़ा रंग जेल के जेल होने का नहीं, बल्कि रंग शाला होने का एहसास करा जाता है।
लगभग 104 साल पुरानी केन्द्रीय जेल को बाहर से देखकर भले ही अंदर की दुनिया के नीरस और उदास होने का एहसास होता है, परंतु ऐसा है नहीं। किसी न किसी जुर्म की सजा काट रहे कैदी अब कलाकार बनने की राह पर चल पड़े है। कभी जुर्म करने वाले हाथों में अब रंगों में डूबी कूंची है जिसके जरिए वे अपनी भावनाओं और कल्पनाशीलता को आकार देने में लग गए है। इसके लिए जेल प्रशासन ने काफी मशक्कत की है।
केन्द्रीय जेल के अधीक्षक संजय पांडे बताते है कि जेल के भीतर कैदियों के लिए कई ऐसे कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं जिससे उनके कला कौशल का विकास हो और वे जब जुर्म की सजा काटकर जेल से बाहर जाए तो वे इज्जत के साथ दो वक्त की रोटी कमा सके । पांडे का मानना है कि आज जो अपने अपराध की सजा काट रहे है वे हमारे ही तरह कभी समाज का हिस्सा रहे है और अब अपने में बदलाव लाना चाहते है जिसमें जेल प्रशासन उनकी मदद कर रहा है।
केन्द्रीय जेल में जघन्य अपराधों की सजा काट रहे सत्यानन्द, मनोज, नवनीत, मुन्ना और हनीस वे लोग है जिन्होंने अपने उन्हीं हाथों में कूंची थामकर भारत माता, सरस्वती, पनघट की राधा, गांधी और नेहरू की तस्वीरें बना डाली है, जिनसे कभी उन्होंने वारदात को अंजाम दिया था। जेल के भीतर बंद कैदियों में चित्रकला सीखने का जुनून सा सवार हो गया है। यही कारण है कि चित्रकला में दक्ष हो चुके कैदियों से उनके साथी प्रशिक्षण हासिल कर रहे है।
जेल प्रशासन अब इस कोशिश में है कि बाहरी दुनिया के लोग यह जान सके कि जेल सिर्फ ऊंची दीवारों और लोहे के सीखचों का ढांचा नहीं है बल्कि इसके भीतर भी एक दुनिया है, जहां अपराध करके पहुंचने वालों को फिर से सभ्य समाज के लायक बनाया जा सकता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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