असम में आतंकवाद पीड़ितों के साथ वादा नहीं निभा पाई सरकार

गुवाहाटी, 3 मार्च (आईएएनएस)। असम में आतंकवाद पीड़ित विधवाओं के साथ किए अपने वादे को सरकार पूरा नहीं कर पाई है।

अधेड़ उम्र की खु़दिजा खातून के पति मोहम्मद अरब अली वर्ष 1998 में आतंकियों की गोली के शिकार हो गए, लेकिन खुदिजा को अभी तक सरकार की ओर से फूटी कौड़ी नहीं मिली है। यहां तक कि आतंकवाद पीड़ितों के परिजनों को दी जाने वाली अनुग्रह राशि भी उन्हें नहीं मिल पाई है।

प्रतिबंधित युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के अलगाववादियों ने अली का अपहरण कर लिया था और बाद में पूर्वी असम के मोरीगांव जिले में उनके गृहनगर जगीरोड के पास उन्हें गोलियों से भून डाला था।

अनामिका नाथ भी इसी तरह की एक पीड़िता हैं। उनके पति पश्चिमी असम के बोंगईगांव जिले में प्राथमिक स्कूल के प्राध्यापक थे। उल्फा के आतंकियों ने वर्ष 2001 के विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी हत्या कर दी थी।

सरकारी मंत्रियों ने उस समय अनामिका को नौकरी का आश्वासन दिया था, लेकिन आठ वर्ष बीत चुके हैं, वह अभी भी दफ्तरों का चक्कर लगा रही हैं।

खुदिजा और अनामिका की तरह असम में आतंकवाद में अपने पतियों को गंवा चुकीं सैकड़ों ऐसी विधवाएं हैं, जिन्हें न तो सरकार की ओर से घोषित अनुग्रह राशि मिल पाई है और न ही कोई नौकरी।

खुदिजा ने आईएएनएस को बताया, "मुझे सरकार की ओर से फूटी कौड़ी नहीं मिली है। मेरे पास चार बच्चे हैं और सरकार की ओर से बिना किसी वित्तीय मदद के जिंदगी नरक बन गई है।"

अनामिका रोते हुए कहती हैं, "पति की मौत के बाद मुझे एक नौकरी का वादा किया गया था। उसके लिए मैंने कई बार सरकारी दफ्तरों का चक्कर लगाया, लेकिन भाग्य ने मेरा साथ नहीं दिया।"

हालांकि अनामिका इस मामले में भाग्यशाली रहीं कि पति के मरने के साल भर बाद सरकार द्वारा घोषित अनुग्रह राशि के रूप में उन्हें वर्ष 2002 में 100,000 लाख रुपये मिल गया।

लेकिन वह बताती हैं कि इस राशि को प्राप्त करने में भी उन्हें इसकी आधी राशि गंवानी पड़ी थी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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