• search

नीतीश की 'विकास यात्रा' का सच

Subscribe to Oneindia Hindi
नीतीश की 'विकास यात्रा' का सच

बिहार में पिछले 19 जनवरी से ऐसा ही हो रहा है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस ग्रामीण जनसंपर्क अभियान को सरकारी विज्ञापनों में 'विकास यात्रा' नाम दिया गया है.

जबकि विपक्ष इसे सरकारी ख़र्च पर मुख्यमंत्री की 'व्यक्तिगत प्रचार यात्रा' बता रहा है. वैसे गौर करने लायक ख़ास बात ये है कि गाँव के लोगों ने राज्य सरकार को खरी-खोटी सुनाने मे कोई कोताही नहीं बरती.

मुख्यमंत्री और उनके साथ चल रहे अधिकारियों के मुँह पर जन शिकायतों के रोषपूर्ण प्रहार भी ख़ूब हुए.

शिकायतें

"फलां अधिकारी चोर है, रिश्वतखोर है...विकास काग़ज़ पर हो रहा है, पर ज़मीन पर नहीं... सड़क, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य की योजनाओं में पंचायत से लेकर ज़िला स्तर तक लूट मची है... पुलिस वाले घूस लेकर अपराधी को बचाते हैं और निर्दोष को फँसाते हैं..."- ऐसे जुमले या इससे भी सख़्त शब्द वाले आरोपों के तीर चलते रहे और मुख्यमंत्री को ये सब झेलना पड़ा. कभी कभी वो तैश में आ जाते थे पर मीडिया की नज़र अपने ऊपर देख संभल भी जाते थे.

चंपारण से लेकर शेखपुरा तक की अपनी यात्रा में मुख्यमंत्री ने 18 रातें और 24 दिन गाँवों में गुज़ारे. गाँव के बाहर किसी ख़ाली जगह की घेराबंदी करके वहाँ भारी सुरक्षा प्रबंध के बीच तंबुओं और शामियानों से सजे शिविर में तमाम ज़रूरी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती थीं.

पुराने लोग बताते हैं कि आज़ादी से पहले किसी गाँव-देहात के पास और सोनपुर मेले में 'अंग्रेज़ हाकिमों' की ऐसी ही तंबू नगरी सजती थी.

स्थानीय प्रशासन सुविधानुसार ऐसे गाँवों को चुनते थे जहाँ आराम से पहुँचने लायक सड़कें हों, वहाँ नीतीश जी का ये शिविर-प्रवास होता था. पगडंडियों वाले किसी दुर्गम इलाक़े के गाँव में मुख्यमंत्री का शिविर नहीं लगा.

अधिकारियों, पुलिसकर्मियों, मंत्रियों और पार्टी नेताओं की सैकड़ों चमचमाती मोटरकारों का काफ़िला उनके साथ चलता था. जिस गाँव के पास मुख्यमंत्री का तंबू गड़ता था, वहीं 'जनता के दरबार में मुख्यमंत्री' नाम के कार्यक्रम से संबंधित शामियाना भी तन जाता था.

इस 'दरबार' में कहीं सैकड़ों तो कहीं हज़ारों की तादाद में आम लोग अपनी माँगों और शिकायतों के आवेदन लेकर जमा होते थे.

नीतीश कुमार अपने कुछ चुने हुए अधिकारियों को साथ लेकर जनता की उस भीड़ में घुस जाते थे फिर शुरू हो जाता था गुहार, शिकायतों या आरोपों का नरम-गरम शब्द प्रहार.

'लोकहित में'

लोगों ने मुख्यमंत्री से अपनी शिकायतें दर्ज की

एक ऐसे ही मौक़े पर मैंने मुख्यमंत्री से कहा था कि लगता है आपने मधुमक्खी के छत्ते मे हाथ डाल दिया है. मुख्यमंत्री का जवाब था, "लोकहित में जानबूझ कर मैंने ये मुसीबत मोल ली है."

बेगूसराय ज़िले के एक गाँव बरबीघी में तो मुख्यमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल की बैठक ही बुलवा ली. शायद ये सोचकर कि गाँव में राज्य सरकार की इस कैबिनेट मीटिंग को ऐतिहासिक या अभूतपूर्व क़दम माना जाएगा और इसी बहाने मीडिया-प्रचार का ख़ासा फ़ायदा भी हो जाएगा.

लेकिन, इस बैठक का सिर्फ़ प्रतीकात्मक महत्व ही माना गया. मुख्यमंत्री ने ख़ुद कहा भी कि गाँव में कैबिनेट मीटिंग करके उन्होंने राजशक्ति पर लोकशक्ति के वर्चस्व का संकेत देने की कोशिश की.

नीतीश कुमार की इस 'विकास यात्रा' की सबसे ज़्यादा आलोचना सरकार के भारी भरकम ख़र्च को लेकर की जा रही है. विपक्ष का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने अपनी व्यक्तिगत छवि को चमकाने के लिए आम जनता के पैसे को पानी की तरह बहा दिया.

दूसरी तरफ़ लोगों में इसकी सार्थकता इस नाते समझी जा रही है कि लोकहित के सरकारी फ़ैसलों पर अमल की बुरी स्थिति बिलकुल सामने दिख गई.

मुख्यमंत्री और उनके सरकारी अमले को पता चल गया होगा कि बिगड़े हालात को गुलाबी विज्ञापनों से नहीं ढका जा सकता.

जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें

Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

X
We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Oneindia sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Oneindia website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more