क्या वापस आएँगे गुमशुदा बच्चे?

लेकिन निठारी के बाद लोगों में इतना डर बैठ गया है कि अगर कहीं से भी ऐसी किसी घटना की ख़बर आती है तो निठारी में हुई क्रूरता की यादें लोगों को झिंझोड़ देती है.
वर्ष 2007 में दिल्ली के सटे नोएडा के निठारी गाँव में एक घर के पीछे नाले से 17 बच्चों के कंकाल मिलने से सनसनी फैल गई थी.
ज्योति 11 वर्ष, आशु सात वर्ष, निशा सात वर्ष, सुशीला पांच वर्ष- ये नाम हैं पूर्वी दिल्ली के न्यू संजय अमर कॉलोनी में रहने वाले उन कुछ बच्चों के, जो पिछले कुछ महीनों से लापता हैं.
अमर कॉलोनी एक झुग्गी झोपड़ी कॉलोनी है, वहाँ सँकरी गलियाँ हैं, रहने वाले छोटे-मोटे काम कर अपना गुज़ारा करते हैं.
इस इलाक़े से 10 फ़रवरी को एक ही दिन छह बच्चे ग़ायब हो गए. वहाँ ऐसे बहुत से परिवार मिल जाएँगे, जिनके बच्चे दिन-दहाड़े ग़ायब हो गए.
'ख़ुद भाग जाते हैं'
अफ़सोस की बात ये है कि निठारी कांड से पहले जब पुलिस अधिकारियों से बच्चों के ग़ायब होने के कारणों के बारे में पूछा जाता था, तो वो कहते थे कि बच्चे भाग गए होंगे या फिर थोड़े ही दिनों में वो वापस आ जाएँगे.
पिछले कुछ महीनों में न्यू संजय अमर कालोनी से 20 बच्चे ग़ायब हो चुके हैं. लेकिन इस मामले में भी पुलिस के बयान वही पुराने हैं.
वहाँ हमारी मुलाक़ात बाबूलाल से हुई जिनके तीन बच्चे निशा, आशु और सुशीला कई महीनों से ग़ायब हैं.
वो कहते हैं कि जब पुलिसवालों के पास शिकायत लेकर गया, तो उन्होंने थाने से भगा दिया.
बाबूलाल का रोते रोते कहना था, "वर्ष 2003 से पुलिसवालों ने मेरे लापता हुए बच्चों को तलाशने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की. इलाक़े के विधायक नसीब सिंह ने मुझे बहुत गाली दी और कहा कि बच्चे पैदा किया तो उन्हें संभालो. मीडिया के पास क्यों जाते हो, बच्चे से भीख मंगवाते हो, बच्चे बेच देते हो. आप बताइए हम अपने कलेजे के टुकड़े को कैसे बेच देंगे."
बाबूलाल रोते-रोते ज़मीन पर गिर पड़े और ऐसा लगा कि वो बेहोश हो गए. जान-पहचान के लोग उन्हें उठाकर घर ले गए.
माता-पिता ज़िम्मेदार
अगर तीन साल का बच्चा ग़ायब होता है तो क्या मैं इसके लिए ज़िम्मेदार हूँ? वे बच्चा पैदा करते हैं, सड़क पर छोड़ देते हैं तो उनकी ज़िम्मेदारी है या हमारी? ज़िम्मेदारी है माँ-बाप की है, पुलिस या किसी राजनेता की ज़िम्मेदारी नहीं है नसीब सिंह, विधायक
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नसीब सिंह कांग्रेस के विधायक हैं. हमने उनसे फ़ोन पर संपर्क किया. उनका कहना था कि उन्होंने किसी को धमकाया नहीं है और इस इलाक़े से बच्चों के ग़ायब होने के लिए वो ज़िम्मेदार नहीं है.
उनका कहना था, "अगर तीन साल का बच्चा ग़ायब होता है तो क्या मैं इसके लिए ज़िम्मेदार हूँ? वे बच्चा पैदा करते हैं, सड़क पर छोड़ देते हैं, तो उनकी ज़िम्मेदारी है या हमारी? ज़िम्मेदारी है माँ बाप की है, पुलिस या किसी राजनेता की ज़िम्मेदारी नहीं है."
नसीब सिंह कहते हैं कि अधिकतर बच्चे प्यार-मोहब्बत के चक्कर में भाग जाते हैं या फिर मां-बाप उन्हें भीख मंगवाने जैसे कामों में लगा देते हैं. हालांकि वो ये भी कहते हैं छोटे बच्चों के ग़ायब होने वाले कुछ मामले सही हो सकते हैं.
इलाक़े से ग़ायब बच्चों के बारे में ज़्यादा जानकारी के लिए हमने दिल्ली के आनंद विहार पुलिस थाने के प्रमुख से बात की. लेकिन वो इन मामलों को गंभीर नहीं मानते.
लेकिन ये सिर्फ़ दिल्ली की ही बात नहीं, भारत में हर राज्य से बड़ी संख्या में बच्चे ग़ायब हो रहे हैं. कितने बच्चे ग़ायब हो रहे हैं- इस पर अलग-अलग आंकड़े हैं.
ग़ैर-सरकारी संस्था 'बचपन बचाओ आंदोलन' के आंकड़े के मुताबिक़ पहली जनवरी 2008 से अब तक ढाई हज़ार से ज़्यादा बच्चे दिल्ली से ग़ायब हुए हैं.
केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक़ 2005 और 2006 को मिलाकर दिल्ली से क़रीब 14 हज़ार बच्चे ग़ायब हुए हैं.
जबकि देश भर में वर्ष 2005 में 34 हज़ार से ज्यादा बच्चे ग़ायब हुए, जबकि वर्ष 2006 में ये संख्या 44 हज़ार को पार कर गई.
बच्चों के लिए काम करने वाली संस्थाओं को चिंता है कि छोटी उम्र में ग़ायब होने के पीछे कुछ संगठित गिरोहों का हाथ है, जो बच्चों से भीख मंगवाने से लेकर वेश्यावृत्ति तक का काम करवाते हैं.
बच्चों की तस्करी
ग़ैर सरकारी संस्था 'हक़' की मीनाक्षी गांगुली कहती हैं कि बच्चों की तस्करी एक बड़ा मुद्दा है और लड़कियों को वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है.
वो कहती हैं, "जब भी बिहार में भी बाढ़ जैसे मामले पेश आते हैं, वहाँ से बच्चों की बड़ी संख्या में तस्करी होती है."
चंडीगढ़ के वकील और सामाजिक कायर्कता रंजन लखनपाल को सूचना के अधिकारी क़ानून के तहत जानकारी मिली कि लुधियाना में पिछले साल क़रीब 90 बच्चे ग़ायब हुए.
इस मामले पर उन्होंने चंडीगढ़ उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की. वो कहते हैं कि ऐसे कई मामले उनके सामने आए हैं जिनमें बच्चों के अंगों को काटकर उन्हें भीख माँगने के काम में लगा दिया जाता है.
इंदौर के अनुज भार्गव ग़ायब बच्चों के बारे में एक वेबसाइट चलाते हैं. उनकी वेबसाइट पर क़रीब छह सौ बच्चों की तस्वीरें हैं. वो इसके लिए बच्चा गोद लेने देने के नाम पर चल रहे गिरोहों को भी ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
सवाल ये कि बच्चे इतनी बड़ी संख्या में क्यों ग़ायब हो रहे हैं. 'चाइल्डलाइन इंडिया फ़ाउंडेशन' की कोमल गनोत्रा राज कहती हैं, "दिल्ली, मुंबई, उत्तर प्रदेश, बिहार जैसी जगहों में ये समस्या बेहद गंभीर है. ग़ायब बच्चों के नहीं मिल पाने की सबसे बड़ी वजह है उनके बारे में जानकारी का आम आदमी तक नहीं पहुँच पाना."
वो आगे कहती हैं कि कई बार बच्चे ख़ुद ही सामाजिक कारणों की वजह से घर छोड़कर भाग जाते हैं, ख़ासकर जहाँ माँ-बाप में बीच में मतभेद और लड़ाइयाँ होती हैं.
प्रेम प्रसंग
दिल्ली, मुंबई, उत्तर प्रदेश, बिहार जैसी जगहों में ये समस्या बेहद गंभीर है. ग़ायब बच्चों के नहीं मिल पाने की सबसे बड़ी वजह है उनके बारे में जानकारी का आम आदमी तक नहीं पहुँच पाना कोमल गनोत्रा राज
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इस पूरे मामले को दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत गंभीर समस्या नहीं मानते हैं, "बड़े बच्चों के भागने के ज़्यादातर मामले प्रेम प्रसंग के होते हैं और छोटे बच्चों के ग़ायब होने के ज़्यादातर मामलों में बच्चे मिल जाते हैं."
उनका कहना है कि बच्चों के ग़ायब होने के पीछे गिरोह जैसी कोई बात नहीं है. कोमल गनोत्रा कहती हैं कि बच्चों की तस्करी रोकने के लिए मौजूदा क़ानूनी ढाँचा बेहद कमज़ोर है.
वो कहती हैं, "हमारे क़ानून में बस ये है कि बच्चे को ख़रीदना और बेचना अपराध है, लेकिन बच्चे को एक जगह से दूसरी जगह काम के लिए ले जाने को अपराध की दृष्टि से नहीं देखा गया है. इससे भी समस्या आती है."
कारण चाहे जो भी हो, इतनी बड़ी तादाद में बच्चों का ग़ायब हो जाना वाक़ई चिंता का विषय है.
निठारी कांड पर ख़ूब हो-हल्ला मचा और मीडिया ने भी बढ़-चढकर इस मुद्दे को उठाया, तब जाकर सरकार चेती, क्योंकि सवाल उस तबके के बच्चों का था, जिनका संबंध समाज के निचले ग़रीब तबक़े का था.
जिनके बच्चे ग़ायब हुए हैं उनके परिवार आज भी इसी आस में हैं कि उनके बच्चे आज नहीं तो कल ज़रूर लौटेंगे. लेकिन सरकार को ऐसे बच्चों को बचाने के लिए एक ठोस नीति लाने की ज़रूरत है.


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