बाटला हाउस मुठभेड़ से जुड़ा नया विवाद

जामिया मिलिया इस्लामिया के शिक्षकों के एक संघ ने बाटला हाउस मुठभेड़ की स्वतंत्र जांच करा के एक रिपोर्ट पेश की है जिसमें पुलिस के दावों पर कई सवाल उठाए गए हैं.
साथ ही इस मुठभेड़ में मारे गए पुलिस इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा को अशोक चक्र से सम्मानित करने के सरकार के फ़ैसले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों के विपरीत बताया गया है.
पुलिस और भारत के सुरक्षा सलाहकार हालांकि 19 सितंबर को हुए बाटला हाउस मुठभेड़ के फ़र्ज़ी होने को हास्यास्पद करार दे चुके हैं और उस वारदात की न्यायिक जांच की मांग को ख़ारिज कर चुके हैं, मामला थमता नहीं लग रहा.
जामिया मिलिया इस्लामिया के शिक्षक संघ ने कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कानून विशेषज्ञों के साथ मिल कर इस वारदात की स्वतंत्र जांच करके कई सवाल उठाए हैं जो उनके मुताबिक इस ओर इशारा करते हैं कि दिल्ली धमाकों के बाद हुई इस मुठभेड़ के फर्ज़ी होने की संभावना है.
'मानवाधिकार आयोग का उल्लंघन'
पुलिस का दावा था कि इस मुठभेड़ में मारे गए साजिद और आतिफ़ दिल्ली बम धमाकों के लिए ज़िम्मेदार थे और मुठभेड़ के दौरान गोलीबारी में दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा की मौत हो गई.
जामिया मिलिया इस्लामिया टीचर्स सॉलिडारिटी ग्रुप की मनीषा सेठी कहती हैं, "मुठभेढ़ विशेषज्ञ कहलाने वाले मोहनचंद शर्मा के ख़िलाफ़ कई मामले अदालत में लंबित हैं. ऐसे में उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित करना राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों का उल्लंघन है."
मुठभेढ़ विशेषज्ञ कहलाने वाले मोहनचंद शर्मा के ख़िलाफ़ कई मामले अदालत में लंबित हैं. ऐसे में उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित करना राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों का उल्लंघन है मनीषा सेठी
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मगर आप यह बात बीबीसी के कार्यक्रमों में पुलिस महकमें के कई वरिष्ठ अधिकारियों और विशेषज्ञों से सुन चुके होंगे कि कई बार पुलिस अधिकारियों पर झूठे मुकदमें उनके काम में रुकावट डालने के लिए भी लाए जाते हैं.
बहरहाल इस रिपोर्ट के प्रकाशन के दौरान कानूनविदों ने यह भी कहा कि भारत में फ़र्ज़ी मुठेभेड़ की दर्जनों वारदातें होतीं हैं और उसके बाद कानूनी कार्यवाही का उल्लंघन होता है.
वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता कॉलिन गोंसालविस कहते हैं, "कानून के मुताबिक हर मुठभेड़ के बाद अगर उस मुठभेड़ में किसी पुलिसकर्मी के हाथों किसी की मौत होती है भले फिर वो आत्मरक्षा के लिए क्यों ना हुई हो, उस पुलिसकर्मी के ख़िलाफ़ मामला दर्ज होता है और फिर अदालत ही तय करती है कि पुलिसकर्मी निर्दोष था और मुठभेड़ फर्ज़ी नहीं थी."
स्वतंत्र जाँच की माँग
भारत में ज्यादातर पुलिस के हाथों मरने वाले के ख़िलाफ़ ही मामला दर्ज होता है. कॉलिन गोंसालविस का कहना था कि यह बाटला हाउस मुठभेड़ में भी हुआ और यह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों के विपरीत है.
इसकी स्वतंत्र जाँच की माँग हो रही है
वहीं यह गुट राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से भी मांग कर रहा है कि वो बाटला हाउस मुठभेड की स्वतंत्र रूप से जांच कराए. मगर आयोग का कहना है कि जब तक पुलिस की जांच पूरी नहीं हो जाती वो ऐसा नहीं कर सकता.
हालांकि कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर मानवाधिकार आयोग चाहे तो यह जांच हो सकती है.
जामिया मिलिया इस्लामिया के शिक्षकों के इस कार्यक्रम में जानीमानी लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुंधति रॉय भी मौजूद थी.
उन्होंने कहा कि यह सबको सोचना चाहिए कि हम किस तरह के समाज में जीना चाहते हैं.
अरुंधति रॉय कह रही थीं कि क्या हम ऐसा समाज चाहते हैं जहां फ़र्ज़ी मुठभेड़ होना स्वीकार्य हो.
वो कहती हैं, "मोहनचंद शर्मा के हाथों कम से कम पैंतीस लोगो मारे गए थे. उनके ख़िलाफ़ कई मामले अदालत में थे. अपने आपको धर्मनिरपेक्ष कहने वाली सरकार को ज़रा सोचना चाहिए."
इन बयानों के बाद और रिपोर्ट में पेश तथ्यों के बाद बाटला हाउस मुठभेड़ प्रकरण पर फिर बहस छिड़ सकती है.


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