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अंतरिम बजट और लेखानुदान में अंतर

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अंतरिम बजट और लेखानुदान में अंतर

भारत सरकार की ओर से 16 मार्च को प्रणब मुखर्जी अंतरिम बजट पेश कर रहे हैं क्योंकि मौजूदा संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का कार्यकाल मई में ख़त्म हो रहा है.

वित्त वर्ष 2008-09 का बजट सिर्फ़ तीस अप्रैल तक के लिए है. इस लिहाज़ से 30 अप्रैल के बाद नई सरकार के गठन तक के लिए वित्तीय लेखाजोखा और सरकारी खर्चे को संसद की मंज़ूरी मिलना ज़रूरी है.

आम तौर पर ऐसी स्थितियों में सरकार लेखानुदान पारित कराती है. लेखानुदान राजस्व और खर्चों का लेखाजोखा मात्र होता है. इसमें तीन या चार महीनों के लिए सरकारी कर्मियों के वेतन, पेंशन और अन्य सरकारी कार्यों के लिए राजकोष से धन लेने का प्रस्ताव होता है.

ऐसा इसलिए है कि संविधान के मुताबिक राजकोष से धन निकालने के लिए संसद की मंज़ूरी आवश्यक है. लेकिन इस बार सरकार ने अंतरिम बजट पेश करने का फ़ैसला किया है. यानी लेखानुदान की बाध्यताएँ इस पर लागू नहीं होंगी.

मूलभूत अंतर

लेखानुदान के तहत सरकार कोई नीतिगत फ़ैसला नहीं करती है. जैसे कर दरों में बदलाव या नई योजनाओं की घोषणा आम तौर पर इसमें नहीं होती.

लेखानुदान में कोई नीतिगत फ़ैसला नहीं किया जाता

इसके पीछे सैद्धांतिक तर्क ये है कि जब सरकार का कार्यकाल ख़त्म हो रहा हो तो वो अगले पूरे साल के लिए घोषणाएँ नहीं कर सकती क्योंकि चुनाव बाद किसी और दल या गठबंधन की सरकार बन सकती है.

ऐसे में मौजूदा सरकार अगली सरकार पर अपने वित्तीय फ़ैसले और बजट को नहीं थोप सकती. हालाँकि इस पर नियम स्पष्ट नहीं हैं. ये बाध्यकारी भी नहीं है बल्कि स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा है.

दरअसल भारतीय संविधान में 'अंतरिम बजट' जैसा कोई शब्द नहीं है. इसके मुताबिक सरकार चाहे तो साल में दो बार भी बजट पेश कर सकती है.

पिछले अनुभव

इस बार राजनीतिक परिस्थितयाँ भी वर्ष 2004 से अलग हैं जब तत्कालीन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की ओर से जसवंत सिंह ने लेखानुदान पेश किया था.

वर्ष 1997-98 का बजट बिना चर्चा के पारित हुआ

उस समय अर्थव्यवस्था कुँलाचे भर रही थी और विकास दर बढ़ रही थी लेकिन इस वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था भी वैश्विक मंदी के असर में है.

अंतरिम बजट पेश करने के तर्क को इसलिए भी सही ठहराया जा सकता है कि चुनाव आयोग ने अभी तक चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं किए हैं. इसलिए आचार संहिता लागू नहीं है और सरकार कुछ लोकप्रिय घोषणाएँ करने के लिए स्वतंत्र है.

जब बजट पर चर्चा भी नहीं हुई

भारत के इतिहास में पहला अंतरिम बजट मोरारजी देसाई ने वर्ष 1962-63 में पेश किया था. वर्ष 1991-92 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार जाने के बाद यशवंत सिन्हा ने अंतरिम बजट पेश किया.

चुनावों के बाद पीवी नरसिंह राव की अगुआई में कांगेस की सरकार बनी और तब मनमोहन सिंह ने पूर्ण बजट पेश किया. वर्ष 1997-98 में संवैधानिक संकट उत्पन्न हो गया जब इंद्र कुमार गुजराल की सरकार गिर गई.

इससे निपटने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया गया. पी चिदंबरम तब वित्त मंत्री थे. उन्होंने बजट पेश किया और बिना किसी चर्चा के इसे पारित कर दिया गया.

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