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सलमान रश्दी के बाद, फतवे के 20 साल !

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लंदन, 15 फरवरी (आईएएनएस)। सलमान रश्दी की पुस्तक 'द सैटनिक वर्सेस' के प्रकाशन को लेकर दुनियाभर में उठी विरोध की आंधी 20 साल बाद अपने आप थम चुकी है, लेकिन दुनिया को अभी भी 'फतवा' जैसे शब्द से जूझना पड़ रहा है।

ईरानी नेता अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने जब 14 फरवरी 1989 को रश्दी के खिलाफ फतवा जारी किया तो बहुतों को यह भी पता नहीं था कि फतवा होता क्या है। क्या यह कोई राजाज्ञा है ? क्या इसका मतलब मृत्युदंड है? क्या यह कोई कानूनी प्रतिबंध है? इसे जारी और लागू कौन कर सकता है? यह लिखित रूप से जारी किया जाता है या मौखिक होता है?

यहां तक कि इसकी वर्तनी को लेकर भी विवाद था।

वर्ष 1988 में कानसाइज आक्सफोर्ड डिक्शनरी का सातवां संस्करण प्रकाशित हुआ। लेकिन उसमें भी फतवा शब्द के बारे में कुछ नहीं लिखा था।

आज की आक्सफोर्ड डिक्शनरी में फतवा शब्द को 'इस्लामी कानून के मुताबिक एक अधिकारिक आदेश' के रूप में परिभाषित किया गया है।

जिस तरह से यह व्याख्या चुस्त दिखाई देती है, उस हिसाब से हर किसी मुद्दे पर फतवा जारी करने की प्रकिया चुस्त नहीं लगती। मौलानाओं द्वारा जारी किए जाने वाले फतवे की स्थिति, शासकों द्वारा नियमित जारी किए जाने वाले आदेशों जैसी बन गई है।

इंडोनेशिया में 28 जनवरी को योग के खिलाफ फतवा जारी किया गया। लेकिन उसके चार दिनों बाद ही स्थानीय मीडिया में खबर आई कि राजधानी जकार्ता में एक योग स्टुडियो की कक्षा में योग सीखने वालों की लगातार भीड़ बनी हुई है।

लेकिन वर्ष 2002 में नाइजीरिया में स्थिति उस समय खतरनाक हो गई थी, जब एक पत्रकार के खिलाफ फतवा जारी किया गया और उसके बाद भड़की हिंसा में 200 से भी अधिक लोग मारे गए थे।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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