अब पश्चिमी घाट को बचाने के लिए सामने आए बहुगुणा

पणजी , 15 फरवरी (आईएएनएस)। 'चिपको आंदोलन' के प्रणेता प्रतिष्ठित पर्यावरणकर्मी सुंदरलाल बहुगुणा अब हिमालय के बाद पश्चिमी घाट के जंगलों को बचाने के लिए मुहिम चलाने जा रहे हैं।

बहुगुणा ने आईएएनएस से कहा, "यदि भारत ग्लोबल वार्मिग से निपटना चाहता है तो उसे बिना विलंब किए पश्चिमी घाट को बचाना होगा।" उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के धुलिया से लेकर तमिलनाडु में कन्याकुमारी तक पश्चिमी घाट को बचाने की जरूरत है।

पद्म विभूषण से सम्मानित बहुगुणा ने कहा, "गंगोत्री में गंगा का उद्गम वर्ष 2030 तक सूख सकता है।" उन्होंने कहा कि इसके लिए वनों को बचाना आवश्यक है।

बहुगुणा ने कहा, "हम प्राचीन काल से ही अरण्य संस्कृति की बात करते आए हैं। भारतीय संस्कृति हमेशा से ही वन को प्रेरणास्रोत मानता आई है।" उन्होंने कहा कि वन भी एक समाज होता है, जहां हर जीव एक दूसरे पर आश्रित होता है।

बहुगुणा ने कहा, "वनों का अर्थ अब वृक्षारोपण हो गया है। वन के नाम पर हमें कृत्रिम वृक्षारोपण को रोकना होगा।" उन्होंने कहा कि वन का अर्थ केवल लकड़ी नहीं है, बल्कि इससे ऑक्सीजन, मिट्टी और जल भी जुड़ा है।

उन्होंने कहा कि जो यह समझ रहे हैं कि अर्थव्यवस्था और इकोलॉजी दो विपरित केंद्र हैं, तो वे भूल कर रहे हैं। दरअसल इकोलॉजी ही स्थायी अर्थव्यवस्था है।

बहुगुणा ने कहा कि अब वक्त आ चुका है कि हम पश्चिमी घाट के मसले पर चर्चा करें। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर एकमत होकर पश्चिमी घाट को बचाना होगा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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