विद्युत उत्पादन के गढ़ में रोशनी को तरस रहे हैं लोग !

लखनऊ, 14 फरवरी (आईएएनएस)। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि उत्तर भारत में बिजली उत्पादन की राजधानी कह कर पुकारे जाने वाले रेणुकूट के आसपास के गांवों के निवासी रात के नीम अंधेरे का मुकाबला अब भी लालटेन, ढिबरी और दीये की रोशनी से करते हैं। यह दास्तान एक दो नहीं बल्कि उन 200 से अधिक गांवों की है, जहां आजादी के 60 साल बाद आज भी लोग बिजली की बाट जोह रहे हैं।

बिजली की किल्लत झेल रहे कुलडुमरी गांव के पूर्व प्रधान रामकेवल यादव कहते हैं यह तो विडंबना ही है कि जो स्थान देश के विभिन्न हिस्सों में बिजली की आपूर्ति करता है, उसी के आसपास के गांव आज भी अंधकारमय हैं। इसे ही कहते हैं दीया तले अंधेरा।

उत्तरप्रदेश के सोनभद्र जिले का रेणुकूट उत्तरी ग्रिड की जान माना जाता है और यहां की किसी भी इकाई पर संकट आता है तो पूरी ग्रिड गड़बड़ा जाती है।

रेणुकूट की औद्योगिक इकाइयां इस बिजली से जगमगाती हैं जबकि आस-पास के बभनी, म्योरपुर, घोरावल और पिपरी जैसे अन्य ब्लाकों के (क्षेत्र पंचायत) के करीब 200 से ज्यादा गांव अभी तक बल्ब की रोशनी से वंचित हैं।

पिपरी ब्लाक के गांव लहुबंध की प्रधान कुसुमा देवी कहती हैं कि अनपरा तापीय परियोजना के लिए लोगों को विस्थापित कर डिबुलगंज गांव में बसाया गया लेकिन अभी तक वहां के लोगों को बिजली तो दूर पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं कराया गया है।

स्थानीय विधायक सत्य नारायण जैसल इसके लिए पिछली सरकारों को दोषी बताते हुए कहते हैं कि उन्होंने कभी मामले को गंभीरता से नहीं लिया। रेणुकूट में रिहंद बांध और नेशनल थर्मल पावर कोर्पोरेशन (एनटीपीसी)की तीन इकाइयों से बिजली का उत्पादन होता है। सोनभद्र के सूचना अधिकारी निसार अहमद ने बताया कि जिले में विभिन्न इकाइयों से लगभग 10,500 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है और यह बिजली उत्तरी ग्रिड में डाल दी जाती है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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