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मंदी की मार या मंदी की बहार

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मंदी की मार या मंदी की बहार

आर्थिक मंदी की वजह से प्यार का उफ़ान भी मंदी पर है या नहीं, या फिर प्रेमी जोड़े एक दूसरे के प्यार में खोकर मंदी के दर्द को भूल जाना चाहते हैं.

इस पर अटकलों का ज़ोरदार दौर चल रहा है और दोनों तरफ़ से दलीलें पेश की जा रही हैं.

प्रोफ़ेसर हेलेन फिशर का कहना है कि "लोग पैसे की कमी और नौकरी छिन जाने के डर से इतने परेशान हैं कि उनके दिमाग़ में डोपामाइन नाम के रसायन का प्रवाह बढ़ जाता है, यह वही रसायन है जो प्रेम की भावना से भी जुड़ा है".

प्रोफ़ेसर फिशर कहती हैं, "तनाव के समय विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण की संभावना बढ़ जाती है, तनाव के दौर में आपके प्रेम में पड़ने के आसार बढ़ जाते हैं."

उनका यह दावा 1974 में किए गए एक शोध पर आधारित है जिसमें पाया गया था कि ख़तरे की अवस्था में पुरुष आकर्षक महिलाओं में अधिक दिलचस्पी लेने लगते हैं.

लोग पैसे की कमी और नौकरी छिन जाने के डर से इतने परेशान हैं कि उनके दिमाग़ में डोपामाइन नाम के रसायन का प्रवाह बढ़ जाता है, यह वही रसायन है जो प्रेम की भावना से भी जुड़ा है प्रोफ़ेसर हेलेन फिशर

लोग पैसे की कमी और नौकरी छिन जाने के डर से इतने परेशान हैं कि उनके दिमाग़ में डोपामाइन नाम के रसायन का प्रवाह बढ़ जाता है, यह वही रसायन है जो प्रेम की भावना से भी जुड़ा है

डेटिंग वेबसाइटों पर लोगों की आवाजाही के बढ़ने को भी एक दलील के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है, ईहार्मोनी और मैच डॉट कॉम नाम की वेबसाइटों का कहना है कि मंदी का दौर शुरू होने के बाद से उनकी साइट पर आने वालों की तादाद 20 प्रतिशत बढ़ गई है.

बीस हज़ार से अधिक ब्रितानी पुरुषों के बीच नवंबर 2008 में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ लोगों ने सेक्स को मनोरंजन का सबसे सस्ता साधन माना है.

चीन, नीदरलैंड, अमरीका और यूरोप के कई अन्य शहरों से ऐसी ख़बरें मिल रही हैं कि सेक्स से जुड़ी चीज़ें बेचने वाली दुकानों की बिक्री बहुत बढ़ गई है.

समलैंगिकों की डेटिंग साइट मैनहंट के केन हेरॉन कहते हैं कि सबसे अधिक लोगों ने उनकी साइट की मेंबरशिप सितंबर महीने में ली जबकि अमरीका अर्थव्यस्था मंदी की चपेट में आ रही थी.

विशेषज्ञों का कहना है कि जब लोग अकेलापन महसूस करते हैं, उनके ख़तरे का आभास होता है तो वे किसी से निकट संबंध और संपर्क चाहते हैं जो उन्हें राहत पहुँचाता है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस धारणा का वैज्ञानिक आधार ये है कि प्रेमपूर्ण निकटतम संबंधों की स्थिति में शरीर में ऑक्सीटोसिन नाम का रसायन प्रवाहित होता है जिस 'फीलगुड केमिकल' कहा जाता है.

ठीक विपरीत विचार

लेकिन दूसरी ओर कई लोगों का मानना है कि मंदी ने प्रेम और चाहत की आँच को भी मंदा कर दिया है.

जोड़ों को संबंधों के मामले में सलाह देने वाली एक एजेंसी रिलेट का कहना है कि मंदी का सीधा असर रिश्तों पर पड़ा है और जोड़ियों के बीच तनाव बढ़ रहा है.

आर्थिक अनिश्चितता लोगों को बेचैन कर देती है, ऊपर से उनके ऊपर नई नौकरी खोजने का दबाव है या फिर किसी के पार्टनर की नौकरी जाने से दूसरे पर बोझ पड़ रहा है, ऐसे में दिन के अंत में सेक्स के लिए लोग तैयार नहीं हो पाते डेनिस नोएल्स, सेक्स विशेषज्ञ

आर्थिक अनिश्चितता लोगों को बेचैन कर देती है, ऊपर से उनके ऊपर नई नौकरी खोजने का दबाव है या फिर किसी के पार्टनर की नौकरी जाने से दूसरे पर बोझ पड़ रहा है, ऐसे में दिन के अंत में सेक्स के लिए लोग तैयार नहीं हो पाते

रिलेट की सेक्स विशेषज्ञ डेनिस नोएल्स कहती हैं, "आर्थिक अनिश्चितता लोगों को बेचैन कर देती है, ऊपर से उनके ऊपर नई नौकरी खोजने का दबाव है या फिर किसी के पार्टनर की नौकरी जाने से दूसरे पर बोझ पड़ रहा है, ऐसे में दिन के अंत में सेक्स के लिए लोग तैयार नहीं हो पाते."

उनका कहना है कि मंदी के दौर में लोगों का आत्मविश्वास बहुत घट जाता है, ख़ास तौर पर उनका जिनकी नौकरी छिन गई है. इसके अलावा जो आर्थिक तौर पर नाकाम पार्टनर है उसके प्रति उसके साथी का व्यवहार भी बदल सकता है.

इस तरह दोनों विचार एक-दूसरे के ठीक विपरीत लगते हैं लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि दोनों ही सही हैं, मंदी की वजह से लोग एक दूसरे के अधिक निकट आ तो जाते हैं लेकिन जब बात सेक्स की होती है उनमें आम वक़्त की तरह जोश और आत्मविश्वास नहीं होता.

डेनिस नोएल्स का कहना है कि ऐसी जटिल परिस्थिति में सबसे अच्छा उपाय यही है कि जोड़े आपस में संवाद बनाए रखें और इस मसले पर बात करें.

वे कहती हैं, "अगर आप बहुत थके हैं या आप चिंतित हैं कि आप सेक्स का आनंद नहीं उठा पाएँगे तो अपने पार्टनर को इसके बारे में ज़रूर बताएँ, अगर आप अचानक सेक्स के प्रति विमुख हो जाएँगे और इस पर चर्चा नहीं करेंगे तो यह सही नहीं होगा."

लोगों के निजी और वैवाहिक जीवन पर आर्थिक मंदी का क्या असर हो रहा है इसकी कोई बिल्कुल साफ़ तस्वीर पेश करना संभव नहीं है लेकिन इतना तो ज़रूर है कि इसका असर पड़ रहा है जिससे कोई इनकार नहीं कर सकता.

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