मुद्दों के द्वंद्व से जूझ रही है भाजपा

मुद्दों के द्वंद्व से जूझ रही है भाजपा

भारतीय जनता पार्टी के तीनदिवसीय अधिवेशन की समाप्ति के साथ ही पार्टी ने लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार भी शुरु कर दिया लेकिन नेताओं में आत्मविश्वास की कमी दिखी.

संतरों का शहर नारंगी रंग की बज़ाए भगवे रंग में नहा रहा था. शहर की चौड़ी सड़कों और ऊँची इमारतों पर हर बैनर और होर्डिंग में इसके वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी की फोटो दिखाई दे रही थी. पिछले चुनाव के हीरो अटल बिहारी वाजपेयी इन पोस्टरों में कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे जो दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती हैं.

मैंने एक वरिष्ठ पार्टी नेता से पूछा कि क्या वाजपेयी अब हीरो नहीं रहे? जवाब था पार्टी लीडर का बदलाव एक स्वाभाविक क़दम है लेकिन मीडिया पार्टी के हर क़दम को ग़लत समझती है और हर चीज़ को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करती है.

पार्टी के राजनीतिक प्रस्ताव में मंदिर का मुद्दा था ही नहीं. उनका कहना था, “वाजपेयी जी अब स्वस्थ्य नहीं हैं और इसीलिए आडवाणी जी को पार्टी ने प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित किया है.

उनसे हमारी मुलाक़ात अधिवेशन के आख़िरी दिन भी हुई. उन्होंने मीडिया के ख़िलाफ़ अपनी शिकायत फिर दोहराई. उनका इशारा राम मंदिर के मुद्दे की तरफ़ था. उनका कहना था की पार्टी नें राम मंदिर को श्रद्धा से ज़रूर जोड़ा है लेकिन इसे आगामी लोकसभा चुनाव का मुद्दा बनाने की बात नहीं कही है.

लेकिन उनके अनुसार मीडिया नें अगले दिन इसे तोड़- मरोड़ कर पेश किया और कहा कि भाजपा राम मंदिर के मुद्दे पर फिर से चुनाव लड़ेगी.

प्रस्ताव में मंदि का ज़िक्र नहीं

दरअसल पार्टी ने कृषि, आर्थिक और राजनीतिक प्रस्ताव पारित किए लेकिन इनमें राम मंदिर के निर्माण की चर्चा नहीं की गई. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और इसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी ने कई मुद्दों की चर्चा की, लेकिन अख़बारों की सुर्खी बनी अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की.

दोनों नेताओं ने कहने की कोशिश की कुछ और लेकिन मीडिया ने मतलब निकला कुछ और. राजनाथ और आडवाणी ने कहा यह कि उनकी पार्टी राम मंदिर के मुद्दे को कभी छोड़ नहीं सकती. पार्टी के नेताओं में आत्मविश्वास की कमी दिखी

राजनाथ सिंह का कहना था, "राम में हमारी श्रद्धा है. वो हमारे दिलों में बसे हैं. राम मंदिर का निर्माण उसी समय संभव है जब पार्टी को संसद में दो तिहाई बहुमत प्राप्त होगा."

ज़ाहिर है उनका मतलब था की इस बार यह चुनावी मुद्दा नहीं होगा. आडवाणी जी ने भी कुछ इसी तरह की बात कही. लेकिन एक दो अख़बारों को छोड़ कर सभी ने लिखा की भाजपा राम मंदिर के मामले को फिर से चुनावी मुद्दा बना रही है.

बाद में पार्टी के नेता वेंकैया नायडू ने मीडिया की यह ग़लतफहमी दूर करने की कोशिश की. लेकिन तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी.

कुछ विश्लेषकों का मानना था की स्वयं पार्टी की भी इसमें थोड़ी ग़लती है. पार्टी देश भर से आए विधायकों और महामंत्रियों के प्रोत्साहन के लिए राम मंदिर का ज़िक्र कर रही थी.

पार्टी के कुछ नेताओं ने ऑफ़ द रिकॉर्ड यह स्वीकार किया की राम मंदिर का मुद्दा चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता. कारण, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए में शामिल पार्टियों को यह मंज़ूर नहीं होगा.

असमंजस

शायद इसका दूसरा कारण यह भी था कि भाजपा इन तीन दिनों में कोई ठोस मुद्दा चुनाव के लिए नहीं ढूँढ़ पाई. इसने राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और अर्थव्यवस्था पर बातें ज़रूर कीं मगर इनमें विश्वास कहीं नहीं झलका.

मोदी ने अधिवेशन में नेहरु-गांधी परिवार पर निशाना साधा. कांग्रेस को भी काफ़ी लताड़ा लेकिन कोई ख़ास मुद्दे पर इसे पटक सकने में कामयाब नहीं हो सकी. पार्टी की बैठक का मुख्य उद्देश्य था आगामी चुनाव में पार्टी की रणनीति तैयार करना और चुनाव की तैयारी की घोषणा करना.

तैयारी की घोषणा तो की गई और रणनीति बनाने पर विचार भी हुआलेकिन पार्टी के चुनावी मुद्दे क्या होंगे यह स्पष्ट तौर पर निकल कर सामने नहीं आया.

मैंने देश भर से अधिवेशन में आए भाजपा नेताओं से बातें की मगर उनकाआत्मविश्वास महसूस नहीं हुआ. पार्टी में अपने स्वार्थ के लिए काम करने वालों की एक बड़ी संख्या है जिससे भाजपा को दिल्ली और राजस्थान में हुए विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा.

आत्मविश्वास का अभाव

आडवाणी जी ने अपने भाषण में 'ख़ुद का लक्ष्य' रखने वाले नेताओं को चेतावनी दी कि अगर उन्होंने अब भी अपने लक्ष्य को त्याग कर पार्टी के लक्ष्य को सामने न रखा तो आने वाले चुनावों में पार्टी की जीत संभव नहीं. राजस्थान, दिल्ली में हार के लिए आडवाणी ने नेताओं को ज़िम्मेदार ठहराया.

उन्होंने कहा कि राजस्थान और दिल्ली के चुनाव में ऐसे लोगों के कारण पार्टी का नुकसान तो हुआ ही लेकिन इन तरह के लोगों का नुकसान ज़्यादा हुआ.

उन्होंने पार्टी में इस तरह के लोगों को चेतावनी भरे लहजे में कहा कि इस बार उनका नुकसान कहीं ज़्यादा होगा. भाजपा चुनाव लड़ने के मूड में ज़रूर नज़र आती है और एनडीए का नेतृत्व भी करने के लिए तैयार है.

लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि कि अगर पार्टी को ठोस चुनावी मुद्दे न मिले जिससे कि कांग्रेस की सरकार को दबाव में लाया जा सके तो आगामी चुनाव में इसकी जीत तय नहीं है.

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