अस्थायी शिक्षक 18 साल बाद नौकरी से वंचित, अदालत से राहत नहीं

नई दिल्ली, 11 फरवरी (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल के एक सरकारी स्कूल में 18 वर्षो से नौकरी करने वाले एक शिक्षक को बेराजगारी का दंश झेलना पड़ रहा है और अदालत ने इस आधार पर शिक्षक के खिलाफ फैसला सुनाया है कि शिक्षक की नियुक्ति अस्थायी पर हुई थी।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति मरक डेय काटजू ने शिक्षक बनीव्रत घोष की याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा, "शिक्षक के वकील का कहना है कि इस मामले में शिक्षक की अर्जी पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाना चाहिए, क्योंकि फैसला उनके पक्ष में नहीं जाने से वह बेरोजगार हो जाएंगे। अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि याचिकाकर्ता के प्रति 'अनुचित सहानुभूति' नहीं दिखाई जा सकती।"

पश्चिम बंगाल के नादिया जिले के कृष्णानगर के निवासी घोष को जनवरी, 1991 में शिमुलिया हाई स्कूल में छह महीनों के लिए जीव विज्ञान के शिक्षक के रूप में अस्थाई तौर पर नियुक्त किया था। जून, 1992 तक उनकी सेवा अवधि बढ़ाई जाती रही। जिस स्थायी शिक्षक की जगह उन्हें अस्थायी तौर पर नियुक्त किया गया था, उसके काम पर लौटने के बाद घोष की सेवा समाप्त कर दी गई।

घोष ने स्कूल में डेढ़ वर्ष के अध्यापन के आधार पर स्थायी तौर पर नियुक्त किए जाने की अपील अगस्त, 1992 में कलकत्ता उच्च न्यायालय में की। अदालत ने घोष की सेवा बहाल करने का आदेश दिया। उनकी सेवा बहाल कर दी गई। 10 वर्ष बाद अदालत के सामने यह मामला फिर सुनवाई के लिए आया। अदालत की एकल खंडपीठ ने उनकी सेवा खत्म करने का फैसला सुनाया। घोष ने इसके खिलाफ फिर अर्जी दी। एक अन्य खंडपीठ ने एकल खंडपीठ के फैसले को पलटते हुए घोष के पक्ष में फैसला सुनाया।

राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में इस फैसले को चुनौती दी और फैसला घोष के खिलाफ सुनाया गया।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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