सोलह वर्ष से कोमा में रही महिला की मौत

मौत के अधिकार को लेकर चल रही बहस का केंद्र रही इतावली महिला एलुआना एंग्लारो की मौत हो गई है. वो 1992 में हुए हादसे के बाद से कोमा में थीं.एलुआना एंग्लारो के मौत के अधिकार की माँग को लेकर देश ही नहीं पूरी दुनिया में बहस चल रही थी.
एंग्लारो की मौत की घोषणा इटली के स्वास्थ्य मंत्री मौरीज़िओ सकोनी ने इटली की संसद में की. पिछले काफ़ी समय से नेताओं के बीच ऐसा क़ानून बनाने के लिए बहस चल रही थी जिससे डाक्टरों को उस महिला को खाना देते रहना पड़ता.
38 वर्षीय एंग्लारो 1992 में हुए एक कार हादसे में घायल होने के बाद से कोमा में थीं. उत्तरी इटली के शहर उदीन के एक निजी क्लीनिक के डॉक्टरों ने पिछले शुक्रवार से उन्हें खाद्य पदार्थ नहीं दिए थे.
इससे पहले डॉक्टरों ने कहा था कि एंग्लारो अगले दो सप्ताह तक जीवित रह सकती हैं. एंग्लारो को मरने देने के फ़ैसले को निंदनीय बताते हुए वेटिकन ने ईश्वर से उनकी मौत के लिए ज़िम्मेदार लोगों को माफ़ करने को कहा.
वेटिकन के स्वास्थ्य मंत्री ज़ेवियर लोज़ेनो बैरागन ने एक समाचार एजेंसी से कहा, " ईश्वर उसका स्वागत करे और उन लोगों को माफ़ करे जिन्होंने उसे वहाँ जाने दिया."
ईश्वर उसका स्वागत करे और उन लोगों को माफ़ करे जिन्होंने उसे वहाँ जाने दिया वेटिकन के स्वास्थ्य मंत्री
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जिस वक्त एंग्लारो की मौत की ख़बर आई, सांसद उसी विधेयक पर चर्चा कर रहे थे जिसके आधार पर उसे खाना देने के लिए लगाई नलियाँ हटाई जाएँ या नहीं.
एंग्लारो के पिता बेपिनो 1999 से इटली की एक अदालत में अपनी बेटी की इच्छामृत्यु का मामला लड़ रहे थे. उनका कहना था कि उसकी यही इच्छा थी.
अदालत का आदेश
जुलाई में मिलान की अदालत ने आदेश दिया था कि डॉक्टरों ने साबित कर दिया है कि एंग्लारो कोमा की हालत से कभी बाहर नहीं आ सकतीं. अदालत ने यह भी माना था कि उसने कृत्रिम रूप से जीवित रहने के बजाए मर जाने की इच्छा भी व्यक्त की थी.
सरकार की ओर से मामला लड़ने वाले वकील ने इस आदेश के ख़िलाफ़ अपील की थी लेकिन रोम की एक अदालत ने नवंबर में इस चुनौती को ख़ारिज कर दिया था.
इसके बाद इटली के स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी अस्पतालों को एंग्लारो की जीवन रक्षा के साधन न हटाने का आदेश जारी किया था.लेकिन इस आदेश को 21 जनवरी को मिलान की एक अदालत ने रद्द कर दिया था.
इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी ने पिछले सप्ताह एक आदेश का प्रारूप बनाया जिससे कि डॉक्टर उसे मरने न दें लेकिन राष्ट्रपति जॉर्जियो नेपोलीतानो ने इस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था.
सरकार की इस कार्रवाई से विपक्षी दल गुस्से में आ गए थे. उनका आरोप था कि सरकार इस मामले से राजनीतिक लाभ उठाना चाहती है.
शुरू में एंग्लारो की देखभाल एक चर्च के अस्पताल में की जा रही थी लेकिन पिछले सप्ताह उन्हें उदीन के एक क्लीनिक में भर्ती करा दिया गया था.


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