आसान नहीं है आगरा को बंदरों के आतंक से मुक्ति दिलाना

आगरा, 10 फरवरी (आईएएनएस)। मुहब्बत की अनमोल निशानी ताजमहल की धरती आगरा को बंदरों के आतंक से मुक्ति दिलाने पर गहन माथापच्ची जारी है, पर इस शरारती प्राणी की विशाल फौज के लिए कोई मुकम्मल वैकल्पिक ठिकाना तलाशना आसान नहीं है।

शहर के हजारों बंदरों को यहां से करीब 550 किलोमीटर दूर चित्रकूट के जंगल में भेजने की योजना रंग नहीं ला पाई। पिछले सप्ताह आगरा नगर निगम के प्रमुख आनंद बर्धन ने घोषणा की थी कि इस बंदरों को चित्रकूट भेजा जाएगा, लेकिन चित्रकूट के वन विभाग ने इन बंदरों को शरण देने से साफ इंकार कर दिया। विभाग ने कहा है कि इस जंगल में पहले से ही बंदरों की भारी फौज रह रही है। इनकी संख्या बढ़ने से मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

स्थानीय वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि आगरा के कई बंदर टीबी की बीमारी से ग्रस्त हैं। अगर उन्हें जंगल में भेजा जाता है तो वहां के प्राणियों में यह बीमारी फैल सकती है। आगरा में बंदरों के उत्पात से सैलानी और स्थानीय नागरिक परेशान हैं। बंदरों का आतंक ऐसा है कि अभी तक तीन लोग बंदर से बचने के चक्कर में छत से कूदकर जान दे चुके हैं।

यहां के अधिकारी अब आगरा जिले के कीथम स्थित भालू संरक्षण केंद्र की तरह बंदरों के लिए भी आश्रय स्थल विकसित करने के लिए संसाधन जुटा रहे हैं। यहां के करीब 1000 बंदरों को चंबल घाटी में भिजवाने का खर्च वहन करने वाले स्थानीय निवासी मुकेश जैन का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए किसी स्थायी समाधान की जरूरत है।

वह इसके लिए यमुना के किनारे विशाल पिंजरे लगवाए जाने के पक्ष में हैं, ताकि लोग बंदरों को खाना खिलाने की परंपरा का पालन कर सकेंगे और इन पिंजरों के जरिए बंदरों को काबू में कर शहर को इनके आतंक से छुटकारा भी दिलाया जा सकेगा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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