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एक आँख-दो आँखों का दायरा!

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एक आँख-दो आँखों का दायरा!

हमसे पूछिए का यह अंक

ज़रा सोचकर देखिए कि अगर हम दोनों आँखों से दो अलग-अलग चीज़ें देखते तो कितनी मुश्किल होती है. ये तो आप जानते ही हैं कि हमारी दो आँखों के बीच कोई ढाई इंच की दूरी है. ये दोनों आँखें, किसी भी वस्तु को ज़रा से अलग कोण से देखती हैं. आज़माइश के लिए एक फूल को अपने सामने रखकर पहले एक आँख से देखिए और फिर दूसरी से. दाहिनी आँख, फूल के दाहिने हिस्से को अधिक देखती है जबकि बाईं आँख फूल के बाएँ हिस्से को. अगर दोनों छवियों को एक के ऊपर एक रखा जाए तो वह धुंधली दिखाई देगी. लेकिन जब हमारे मस्तिष्क में ये अलग-अलग छवियाँ जाती हैं तो वह एक त्रिआयामी छवि तैयार करती हैं. यानी दो आँखों की वजह से हमें वस्तु की गहराई दिखाई देती है. इसलिए दो आँखो से हमें बेहतर दिखाई देता है.

पद्मासन में बैठ कर साधना करने से क्या लाभ होता है. यह सवाल किया है नयाटोला कटिहार बिहार से कुलदीप कुमार साहा ने.

योग साधना का उद्देश्य है ध्यान और आप ध्यान तभी कर पाएंगे जब आप मानसिक और शारीरिक रूप से स्थिरता प्राप्त कर लें. महर्षि पतंजलि ने आसन की परिभाषा देते हुए कहा है स्थिरं सुखम आसनम. अर्थात आसन ऐसा होना चाहिए जिसमें स्थिरता हो और सुख का अनुभव किया जा सके. पद्मासन एक श्रेष्ठ और ध्यानात्मक आसन है. इसमें दोनों पैरों के तलवे को जंघा के ऊपर रखते हैं, रीढ़ को सीधा रखते हैं और दोनों हथेलियों को घुटनों पर रखा जाता है. साधना की दृष्टि से आंखे बंद रखना चाहिए और अपना ध्यान भ्रू मध्य में लगाकर रखना चाहिए. पूर्ण अभ्यास हो जाने पर स्थिरता, शांति और आनन्द का अनुभव होगा और ध्यान केन्द्रित होता चला जाएगा. लेकिन पद्मासन पर विजय पाना कोई एक दिन का खेल नहीं है. साधना की दृष्टि से इसका नियमित अभ्यास करें तो साल भर में सक्षम हो सकते हैं. हां योग गुरु की आज्ञा के बिना कोई भी आसन न करें. पद्मासन से हमारे अतिसूक्ष्म प्राण ऊर्द्धगामी हो जाते हैं यानि प्राण मूलाधार चक्र जो रीढ़ के मूल में है से लेकर हमारे सिर तक प्रवाहित होते हैं और हम ध्यान की उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं. जिन्हें साइटिका या कमर दर्द है तो इसका अभ्यास न करें और अगर घुटने कमज़ोर हैं या जोड़ों में दर्द रहता है तो दूसरे योगाभ्यास करके उन्हे पहले सक्षम बना लें.

पुणे महाराष्ट्र से अमोल गोसावी पूछते हैं कि घोड़ा बैठता क्यों नहीं.

घोड़ा खड़े-खड़े भी नींद ले लेता है

अमोल जी, घोड़ा बैठता भी है और लेटता भी है. हां ये सच है कि घोड़ा खड़े-खड़े सो भी सकता है. जानते हैं, घोड़े जब समूह में होते हैं तो बेहतर ढंग से सो पाते हैं क्योंकि कुछ सोते हैं और कुछ चौकसी रखते हैं. अकेला घोड़ा ठीक से नहीं सो पाता. हमारी तरह घोड़ा लंबी नींद नहीं सोता. वह चार से लेकर पंद्रह घंटे तक खड़े खड़े आराम कर लेता है. उसकी नींद कई मिनट से लेकर एक-दो घंटे की ही होती है. लेकिन कुछ एक दिनों में उसे घंटे दो घंटे के लिए ज़रूर लेटना पड़ता है. अगर कई दिनों तक वह लेट न पाए तो अचानक गिर सकता है.

विद्युत की क्या गति होती है. पूछते हैं बंगलौर से भरत.

आमतौर पर ये माना जाता है कि विद्युत की गति प्रकाश की गति की एक तिहाई होती है. प्रकाश की गति 3 लाख किलोमीटर प्रति सैकेन्ड मानी जाती है. इस हिसाब से विद्युत की गति 1 लाख किलोमीटर प्रति सैकेंड हुई. लेकिन इस गति को प्रभावित करने वाले कई कारक होते हैं. क्योंकि विद्युत शून्य में यात्रा नहीं करता. विद्युत इलैक्ट्रॉन्स का प्रवाह है और इलैक्ट्रॉन का द्रव्यमान होता है. इसलिए जब विद्युत शीशे, पानी या हवा से होकर गुज़रता है तो उसकी गति प्रभावित होती है. ये इस बात पर निर्भर करता है कि विद्युत जिस माध्यम से होकर गुज़र रहा है उसके अणु किस तरह से जुड़े हुए हैं.

राजपूताना रायफ़ल्स रेजिमेंट के नायब सूबेदार बियानी प्रकाश ये जानना चाहते हैं कि आकाश में जो तारा गिरता दिखाई देता है उसका क्या कारण होता है.

आकाश में जो तारा गिरता दिखाई देता है उसका असल में तारे से कोई संबंध नहीं है. अंतरिक्ष में छोटे बड़े बहुत से पिंड घूमते रहते हैं. इनमें रेत के कणों से लेकर शिलाखंड जितने बड़े पिंड भी होते हैं. रेत के कणों जैसे पिंडो को अंतरग्रहीय धूल कहा जाता है जबकि बड़े पिंडों को उल्कापिंड कहते हैं. जब कोई उल्कापिंड पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है तो जलने लगता है और रोशनी का एक पुछल्ला सा छोड़ता जाता है. बस वही हमें टूटते तारे जैसा लगता है. अगर इस उल्कापिंड का कोई हिस्सा बच जाता है वह पृथ्वी पर आ गिरता है.

लेडी विद द लैंप किसे कहा जाता है और क्यों. ये जानना चाहते हैं भरहता नरसिंहपुर मध्य प्रदेश से भानु प्रताप नामदेव.

ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध नर्स फ़्लोरैंस नाइटिंगेल को लेडी विद द लैंप कहा जाता है. उनका जन्म 12 मई 1820 को एक समृद्ध परिवार में हुआ. सत्रह साल की अवस्था में उन्हे ईश्वरीय आदेश मिला कि वो अपना जीवन ग़रीब और बीमारों की सेवा में लगाएँ और उन्होंने एक ऐसे व्यवसाय को अपना जीवन समर्पित किया जिसे प्राय ग़रीब घरों की महिलाएँ अपनाती थीं. उनके परिवार वाले उनके निर्णय से बड़े नाराज़ और दुखी हुए. लेकिन उनका निश्चय नहीं बदला. बल्कि सन 1844 में लंदन के एक कारख़ाने के अस्पताल में एक कंगाल की मौत हो जाने का मामला जब प्रकाश में आया तो फ़्लोरैंस ने चिकित्सा सेवाओं में सुधार का बीड़ा उठाया. लेकिन उन्हें प्रसिद्धि मिली क्राइमिया युद्ध के दौरान, जब उन्हें तुर्की में एक ब्रिटिश शिविर में सैनिकों की सेवा के लिए भेजा गया. वहाँ के हालात बहुत ख़राब थे. नर्सों और सेवा कर्मचारियों की कमी थी, दवाओं का अभाव था, सफ़ाई का ध्यान नहीं रखा जाता था इसलिए बहुत से सैनिक विभिन्न संक्रमण से मारे जाते थे. फ़्लोरैंस नाइटिंगेल ने व्यापक सुधार किए जिससे मरने वालों की संख्या काफ़ी घट गई. द टाइम्स अख़बार में एक रिपोर्ट छपी थी जिसमें लिखा था कि जब रात होती थी और सब सो जाते थे तो फ़्लोरैंस नाइटिंगेल एक लालटेन हाथ में लिए घायलों को देखने निकलती थीं... इसी से उनका नाम पड़ा लेडी विद द लैंप.

ढोली सकरा बिहार से दीपक कुमार दास पूछते हैं थायरॉयड क्या होता है.

सत्यजीत रे निर्देशित फ़िल्म पातेर पांचाली का एक दृश्य

हमारी गर्दन के निचले हिस्से में एक ग्रंथि होती है जिसे थायरॉयड ग्रंथि कहते हैं. इससे जो हारमोंस निकलते हैं उससे पूरे शरीर को ऊर्जा मिलती है. इन्हें टी3 और टी4 हारमोंस के नाम से भी जाना जाता है. जब यह ग्रंथि ज़रूरत से ज़्यादा हारमोन बनाती है तो उस स्थिति को हाइपरथाइरॉयड कहते हैं. इसमें वज़न गिरने लगता है, हृदयगति बढ़ जाती है, पसीना बहुत आता है, चिंता और घबराहट रहती है और मांसपेशियां कमज़ोर हो जाती हैं. जब यह ग्रंथि कम काम करने लगती है तो उस स्थिति को हाइपोथाएरॉयड कहा जाता है. इसमें व्यक्ति बहुत थकान महसूस करता है, शरीर शिथिल रहता है, किसी चीज़ पर ध्यान लगाने में कठिनाई होती है, वज़न बढ़ जाता है, त्वचा ख़ुश्क हो जाती है, चिंता और अवसाद रहता है, क़ब्ज़ हो जाता है, साँस उखड़ती है, पैरों में सूजन आ जाती है, चेहरे पर भी सूजन आ जाती है और महिलाओं में माहवारी अधिक होती है. यह स्थिति आमतौर पर 20 वर्ष से 50 के बीच होती है. लेकिन यह पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में अधिक होता है. इसका इलाज आसान है. बाज़ार में सस्ती गोलियाँ आती हैं जो 14-15 दिनों में असर दिखाने लगती हैं, लेकिन यह सारी उम्र खानी पड़ती हैं.

नई दिल्ली से मदन ने पाथेर पांचाली के बारे में पूछा है.

पॉथेर पांचाली भारत के जाने-माने फ़िल्मकार सत्यजित रे की पहली फ़िल्म थी. यह 1920 के दशक के ग्रामीण बंगाल के एक परिवार की कहानी है जिसका मुख्य पात्र है अपू. इसके बाद रे ने ऑपराजितो और ऑपूर संसार फ़िल्में बनाईं. ये तीनों ही बिभूतिभूषण बंधोपाध्याय के बंगला उपन्यासों पर आधारित हैं. पॉथेर पांचाली 1955 में रिलीज़ हुई थी. इसका संगीत तैयार किया था सुप्रसिद्ध सितार वादक पंडित रविशंकर ने जो बहुत मशहूर हुआ. पॉथेर पांचाली को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार तो मिला ही देश विदेश में इसकी बड़ी चर्चा हुई, बहुत से पुरस्कार मिले विशेषकर कांस फ़िल्म महोत्सव में बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमैंटरी का पुरस्कार भी मिला.

कोटद्वारा गढ़वाल उत्तरांचल से रामरतन सिंह रावत जानना चाहते हैं कि क़ाग़ज़ का आविष्कार कब और कहाँ हुआ.

क़ाग़ज़ का आविष्कार चीन में हुआ. यह माना जाता है कि 105 ईसवी में हन राजवंश के दरबार के एक अधिकारी ने क़ाग़ज़ का आविष्कार किया. उसका नाम था त्साई लुन. उसने फटे-पुराने कपड़ों और पौधों के रेशों से इसका निर्माण किया. हालाँकि हाल में हुई एक पुरातत्वीय खोज में दुनहुआंग शहर के पास से ऐसा क़ाग़ज़ मिला है जो ईसा से 8 साल पहले का बताया गया है यानी त्साई लुन से कोई 100 साल पहले का.

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