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अश्व की छवियों की दास्तान

By Staff
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    अश्व की छवियों की दास्तान

    तीस के दशक की आर्थिक मंदी की पृष्ठभूमि में कही गई घुड़दौड़ की कहानी के फ़ौरन बाद सामने आई कलाओं में 'अश्व की छवियों की दास्तान'.

    आज विश्व दोबारा आर्थिक मंदी की चपेट में है तब इस प्रदर्शनी में दिलचस्पी पैदा होना लाज़मी था.

    रही सही कमी पूरी कर दी आदिवासी कला परिषद् एवं तुलसी साहित्य परिषद् के निदेशक कपिल तिवारी ने यह कहकर, "घोड़ा सदा से न सिर्फ़ सौन्दर्य रचनाओं में अहम स्थान पाता रहा है बल्कि वह उर्जा, शक्ति और गति का प्रतीक भी माना जाता है."

    प्रदर्शनी के द्वार पर खड़े तमिलनाडु के लकड़ी से बने, सुंदर रंगों से पेंट किए, ऊँचे "कुदुरे मुथा" को देखकर कुछ ऐसा लगा भी.

    प्रदर्शनी में हर ओर घोड़े ही घोड़े थे. कुम्हार की चाक पर मिट्टी से बनाये गए, काष्ठ यानी लकड़ी से तराशे गए, लोहे के पत्तरों की सहायता से बनाए गए, पीतल में ढले हुए, कपड़े को आकार देकर बनाए गए और रंगों के सहारे दीवार या काग़ज़ पर उकेरे गए. हर आकार और विभिन्न रुपों के अश्व.

    घुड़सवार को पीठ पर बिठाए, कई रंगों से रंगे और द्वार पर खड़े घोड़े के अलावा तमिलनाडु में मिटटी के घोड़े बनने की भी कला परम्परा है और वहाँ के मिटटी के ये घोड़े भारत के अन्य इलाक़ों में बनाए जाने वाले घोड़ों से सामान्य रुप से ऊँचे होते हैं.

    पीतल की ही बात करें और अन्य प्रदेशों को छोड़ दें तो सिर्फ़ मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ही करीब एक दर्जन जगहों, टीकमगढ़, शिवपुरी, बैतुल, बस्तर वगैरह में भरेवा, झारा, मलार आदि पद्धति में अश्व की मूर्तियाँ और चित्र तैयार किए जाते हैं.

    आंध्र प्रदेश में पीतल के काम के सुंदर नमूने देखने में आते हैं.

    बस्तर में तो लोहे के चद्दरों को जोड़कर भी अश्व बनाने की परम्परा रही है. खड़े कान और लंबे मुंह वाले घोड़े.

    नया प्रयास

    मगर आजकल कई बार कलाकार परंपरागत शैली से हटकर इनके मुंह को लंबे आकार दे रहे हैं, आँखें सामने कर दी गई हैं और गर्दन और दुम के बालों को भी दर्शाने का प्रयास साफ़ दिखता है.

    आदिवासी लोक कला परिषद् के महेशचन्द्र शाण्डिल्य कहते हैं, "यह बाज़ार की मांग और कलाकारों का दूसरे इलाके की पद्धति या आकारों से परिचय होने के कारण है."

    जंगली जानवर से पालतू बनाये गए इस पशु का महत्त्व इसकी शक्ति और उर्जा के कारण इंसानी समाज में बढ़ता गया और इसी प्रकार यह लोक कलाओं का हिस्सा बन बैठे महेश चंद्र शांडिल्य

    जंगली जानवर से पालतू बनाये गए इस पशु का महत्त्व इसकी शक्ति और उर्जा के कारण इंसानी समाज में बढ़ता गया और इसी प्रकार यह लोक कलाओं का हिस्सा बन बैठे

    वे कहते हैं, "जब एक कलाकार किसी प्रदर्शनी या मेले में दूसरे क्षेत्र की कला से रुबरु होता है तो कभी जाने और कभी अनजाने उस शक्ल और आकार की नकल करने लगता है."

    जैसे बुंदेलखंड के छतरपुर में ही जहाँ लड़कों के उत्तम जीवन की कामना करने की रीति सदियों पुरानी मानी जाती है.

    इसके लिए हमेशा से मकर संक्रांति के दिन मिट्टी के बने छोटे-छोटे घोड़े भगवान को अर्पित किए जाते थे. अब कलाकार उन घोड़ों को अधिक अलंकृत करने लगे हैं, उसी तरह से जैसे पहले दक्षिणी भारत में ही दिखते थे.

    मिटटी के 'अश्व-सृजन' की परम्परा इस क्षेत्र के अन्य इलाकों जैसे बस्तर, मंडला आदि में रही है.

    झाबुआ में भी, जहाँ इन्हें तैयार करने का तरीक़ा पश्चिम बंगाल के बांकुरा, बिहार, उड़ीसा और तमिलनाडु जैसा है.

    इन जगहों पर चाक पर मुँह, पेट और टांगों को अलग अलग तैयार का फिर उन्हें जोड़ दिया जाता है. पर जहाँ बंकुरा के अश्व जिराफ जैसी लम्बी गर्दन के मालिक होते हैं वहीं बिहार का सवार घोड़े की गर्दन से बिल्कुल सटा दिखता है.

    उड़ीसा में तो अश्व सृजन की पत्थर कला भी है.

    मंडला के अगरिया लौह शिल्प में भी अश्व के सृजन की शुरुआत एक प्रकार से पत्थर से ही होती है.

    अगरिया जनजाति, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ही सबसे पहले लोहे की खोज की थी, आज भी लौह अयस्क को भट्ठी में पका कर उससे लोहा निकलते हैं जिससे वह अश्व तैयार करते हैं.

    परंपरा

    मशहूर पेंटर एमएफ़ हुसैन के कैनवास के घोडों और बिहार की मधुबनी पेंटिंग्स से लेकर, इतिहास पूर्व के चित्रों में भी घोड़े अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं.

    विभिन्न इलाक़ों में कलाकार इसे अलग-अलग तरह से देखते हैं

    भीमबैठका की गुफाओं के चित्रों में भी; जिन्हें कुछ इतिहासकार लाखों वर्ष पुराना मानते हैं, घोड़े मौजूद हैं.

    भीलों द्वारा दीवारों पर बनाये जाने वाले पेंटिंग्स में जिसे भीली पिथोरा चित्रकला कहा जाता है, कथा के प्रमुख पात्र अश्व का चित्रांकन अवश्य किया जाता है.

    महेशचन्द्र शाण्डिल्य कहते हैं, "जंगली जानवर से पालतू बनाये गए इस पशु का महत्त्व इसकी शक्ति और उर्जा के कारण इंसानी समाज में बढ़ता गया और इसी प्रकार यह लोक कलाओं का हिस्सा बन बैठे."

    उनके अनुसार भीलों में मन्नत पुरी होने पर 'बापजी' देव के स्थान पर मिटटी के बने अन्य जानवरों के साथ घोड़ों की मूर्ति अर्पित करने की परम्परा है साथ ही उनके स्मृति स्तंभों में पिता को घोड़े पर सवार दिखाया जाता है.

    कोरकू जनजाति में भी माना जाता है कि पिता की आत्मा घोड़े पर सवार होकर ही आराम के लिए सूर्य लोक में जाती है और इसी वजह से वह अपने काठ के स्मृति स्तंभों में मृतक पिता को घुड़सवार के रूप में दिखाते हैं.

    मान्यताओं के अनुसार ईसा से तक़रीबन 4500 साल पहले पालतू बनाए गए इस जानवर के बारे में कपिल तिवारी लोक परम्पराओं में अश्व की विभिन्न मुद्राओं की व्याख्या करते अपने एक लेख में कहते हैं कि चूँकि वह गति है इसीलिए कलाकार जब उसकी एक भंगिमा काढ़ लेता है तो उसे लगता है कि कोई अन्य भंगिमा छूट गई इसीलिए 'उसे पकड़ने और फिर रचने के लिए सदियों से शिल्पी और चित्रकार अनवरत उसका पीछा कर रहे हैं.'

    भोपाल की यह प्रदर्शनी इसी अनवरत प्रयास को प्रदर्शित करती है.

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