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चुनाव आयोग राजनीतिक खींचतान के केंद्र में

By Staff
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    चुनाव आयोग राजनीतिक खींचतान के केंद्र में

    देश में लोकसभा चुनाव अप्रैल-मई में होने की संभावना है इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफ़ारिश की वजह से राजनीतिक गलियारों में भारी हलचल मच गई है.

    कांग्रेस ने कहा है कि इस फ़ैसले से कई "बारीक़ क़ानूनी पहलू जुड़े हुए हैं" जिसमें यह बात भी शामिल है कि "क्या मुख्य चुनाव आयुक्त के पास अपने सहकर्मी को हटाने का अधिकार है."

    कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता अभिषेक सिंघवी ने पत्रकारों से कहा, "हमें कोई आधिकारिक नोटिस नहीं मिला है, न ही हमें नोटिस में क्या लिखा है इसकी जानकारी है."

    उन्होंने कहा, "जैसा कि मीडिया रिपोर्टों से पता चला है, गेंद केंद्र सरकार के पाले में है, कानूनी पहलुओं की पूरी पड़ताल किए बिना कोई टिप्पणी करना जल्दबाज़ी होगी."

    जैसा कि मीडिया रिपोर्टों से पता चला है, गेंद केंद्र सरकार के पाले में है, कानूनी पहलुओं की पूरी पड़ताल किए बिना कोई टिप्पणी करना जल्दबाज़ी होगी अभिषेक सिंघवी, कांग्रेस प्रवक्ता

    जैसा कि मीडिया रिपोर्टों से पता चला है, गेंद केंद्र सरकार के पाले में है, कानूनी पहलुओं की पूरी पड़ताल किए बिना कोई टिप्पणी करना जल्दबाज़ी होगी

    कांग्रेस के एक अन्य नेता शकील अहमद ने कहा कि इस तरह का विवाद "देश के सर्वोच्च संवैधानिक संस्थानों की छवि" के लिए नुक़सानदेह है, उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं करनी चाहिए.

    अहमद ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) काफ़ी समय से इस मामले को तूल दे रही है और चुनाव के समय इस संवेदनशील मुद्दे को दोबारा उठाया गया है.

    मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी 20 अप्रैल को रिटायर हो रहे हैं, वरिष्ठता के आधार पर नवीन चावला उनकी जगह मुख्य चुनाव आयुक्त बन सकते थे, ऐसी स्थिति में अगले आम चुनाव उन्हीं की निगरानी में होते.

    भाजपा ने महीनों पहले चावला के 'निष्पक्ष न होने' की शिकायत मुख्य चुनाव आयुक्त से की थी, भाजपा का कहना था कि चावला के कांग्रेस पार्टी से नज़दीकी और पुराने संबंध हैं.

    भाजपा का रुख़

    इस मामले पर विपक्षी पार्टी भाजपा ने "ठोस कार्रवाई" की माँग की है और कहा है कि "चुनाव आयोग की विश्वसनीयता दाँव पर लगी है".

    इस मामले पर ठोस कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारत के लोकतांत्रिक चरित्र के लिए ही ख़तरा पैदा हो जाएगा राजीव प्रताप रूडी, भाजपा प्रवक्ता

    इस मामले पर ठोस कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारत के लोकतांत्रिक चरित्र के लिए ही ख़तरा पैदा हो जाएगा

    भाजपा के प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा, "इस मामले पर ठोस कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारत के लोकतांत्रिक चरित्र के लिए ही ख़तरा पैदा हो जाएगा. जब चुनाव आयोग पर ही विश्वास नहीं रह जाएगा तो लोकतंत्र और संविधान का पालन कैसे होगा."

    एन गोपालस्वामी और नवीन चावला के बीच जारी इस खींचतान को कई राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस और भाजपा के बीच चल रही रस्साकशी के रूप में देख रहे हैं.

    वामपंथी पार्टी सीपीआई ने कहा है कि गोपालस्वामी की सिफ़ारिश से किसी'राजनीतिक मक़सद' का संदेह पैदा हो रहा है इसलिए संसद को चाहिए कि वह चुनाव आयोग के कामकाज और अधिकारों की समीक्षा करे.

    सीपीआई के वरिष्ठ नेता डी राजा ने कहा, "इस तरह की सिफ़ारिश के समय को देखते हुए इससे राजनीतिक मक़सद की बू आती है इसलिए सही यही होगा संसद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, निष्कासन आदि के तौर-तरीक़ों पर पुनर्विचार करे."

    विश्वसनीयता का सवाल

    सुपरिचित क़ानूनविद फ़ाली एस नरिमन भी मानते हैं कि इस विवाद से चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं.

    जिस तरह मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद ही हटा सकती है उसी तरह दो और चुनाव आयुक्तों को भी हटाने की सिफ़ारिश करने का अधिकार मुख्य चुनाव आयोग को नहीं संसद को होना चाहिए फ़ाली एस नरिमन

    जिस तरह मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद ही हटा सकती है उसी तरह दो और चुनाव आयुक्तों को भी हटाने की सिफ़ारिश करने का अधिकार मुख्य चुनाव आयोग को नहीं संसद को होना चाहिए

    टेलीविज़न चैनल एनडीटीवी से बात करते हुए नरिमन ने कहा कि यह विवाद ऐसे समय में खड़ा हुआ है जब भारत के चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और निष्पक्षता की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है.

    उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त की सेनानिवृत्ति और आगामी लोकसभा चुनाव का ज़िक्र करते हुए इस विवाद के समय को लेकर भी सवाल खड़े किए.

    उनका कहना था कि सरकार को गोपालस्वामी की इस सिफ़ारिश पर कोई न कोई कार्रवाई तो करनी होगी लेकिन इस प्रक्रिया ने चुनाव आयोग के ढाँचे में सुधार की ज़रुरत को रेखांकित किया है.

    नरिमन ने कहा, "जिस तरह मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद ही हटा सकती है उसी तरह दो और चुनाव आयुक्तों को भी हटाने की सिफ़ारिश करने का अधिकार मुख्य चुनाव आयोग को नहीं संसद को होना चाहिए."

    हालांकि उन्होंने माना कि नवीन चावला की भूमिका आपातकाल और उसके बाद विवादास्पद रही है लेकिन उनका कहना था कि उस बात को काफ़ी समय बीत चुका है.

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