श्रीलंका के 'संघर्ष की कवरेज' पर प्रदर्शन

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श्रीलंका में तमिल विद्रोहियों और सेना के बीच संघर्ष की कथित तौर पर सही तस्वीर नहीं दिखाने के विरोध में बीबीसी मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन हुआ.उधर अमरीका ने कहा है कि वो 'श्रीलंका में मीडिया पर हो रहे हमलों से चिंतित और भयभीत है.'

ब्रिटेन में तमिल संगठनों का प्रतिनिधित्व कर रहे इन प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि बीबीसी श्रीलंका में सरकारी सेनाओं और तमिल विद्रोहियों के बीच संघर्ष की असलियत दुनिया को दिखाने में नाकाम रहा है.

श्रीलंका में इन दिनों सेना और स्वायत्तता की मांग कर रहे तमिल विद्रोहियों के बीच भीषण संघर्ष छिड़ा हुआ है. ताज़ा सशस्त्र अभियान में तमिल विद्रोहियों को काफी नुकसान भी हुआ है.

सेना और तमिल विद्रोहियों के बीच चल रहे संघर्ष में बड़ी संख्या में आम नागरिकों के हताहत होने की विरोधाभासी ख़बरें आई हैं. लेकिन इन रिपोर्टों का खंडन भी हुआ है.

मुश्किल हालात

जिन इलाकों में तमिल विद्रोहियों और सेना के बीच संघर्ष चल रहा है वहाँ पत्रकारों के जाने पर पाबंदी है इसलिए सेना या विद्रोहियों के दावों की पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं की जा सकती है.

बीबीसी वर्ल्ड टेलीविजन और बीबीसी वेबसाइट के ज़रिए दुनिया भर की ख़बरें कवर करता है. इसके अलावा बीबीसी की तमिल और सिंहला रेडियो और ऑनलाइन सेवाएँ हैं. हम श्रीलंका की लगभग हर घटना की कवरेज कर रहे हैं बीबीसी

बीबीसी वर्ल्ड टेलीविजन और बीबीसी वेबसाइट के ज़रिए दुनिया भर की ख़बरें कवर करता है. इसके अलावा बीबीसी की तमिल और सिंहला रेडियो और ऑनलाइन सेवाएँ हैं. हम श्रीलंका की लगभग हर घटना की कवरेज कर रहे हैं

उधर बीबीसी ने श्रीलंका में संघर्ष की कवरेज के बारे में कहा है कि वहाँ पत्रकारों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है और संघर्ष वाले इलाक़ों में असली हालात की स्वतंत्र रूप से पुष्टि कर पाना बेहद कठिन है.

बीबीसी ने कहा, "बीबीसी वर्ल्ड टेलीविजन और बीबीसी वेबसाइट के ज़रिए दुनिया भर की ख़बरें कवर करता है. इसके अलावा बीबीसी की तमिल और सिंहला रेडियो और ऑनलाइन सेवाएँ हैं. हम श्रीलंका की लगभग हर घटना की कवरेज कर रहे हैं."

बीबीसी का कहना है, "संघर्षरत उत्तरी हिस्से को छोड़कर पूरे श्रीलंका में बीबीसी का विशाल नेटवर्क है. श्रीलंका सरकार ने सेना के साथ रह रहे और चल रहे पत्रकारों को छोड़कर अन्य पत्रकारों को युद्धग्रस्त क्षेत्र में जाने की इजाज़त नहीं दी है."

मीडिया पर हमले

ग़ौरतलब है कि श्रीलंका में मीडियाकर्मियों पर हमले की कुछ घटनाएँ हुई हैं. मीडिया अधिकार समूहों का कहना है कि श्रीलंका में लगातार मीडियाकर्मी इस तरह के हमलों या हिंसा का निशाना बनते आ रहे हैं.

दो सप्ताह पहले ही 'संडे लीडर' नाम के एक समाचार पत्र के संपादक लासांता विक्रमतुंगा को अज्ञात लोगों ने गोली मारी दी थी.

अमरीका ने भी मीडियाकर्मियों पर हमले पर चिंता जताई है. अमरीकी विदेश विभाग के प्रवक्ता रॉबर्ट वुड ने श्रीलंका सरकार से मीडियाकर्मियों को सुरक्षा देने और क़ानून व्यवस्था की स्थिति सुधारने की अपील की है.

उल्लेखनीय है कि लगभग ढाई दशक से तमाल विद्रोही अलग राष्ट्र की मांग को लेकर सशस्त्र लड़ाई लड़ रहे हैं, इस संघर्ष में दोनों पक्षों के कम से कम 70 हज़ार लोग मारे जा चुके हैं.

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