'भूत मेला' के आगे लाचार है प्रशासन

मान्याताओं के मुताबिक मलाजपुर में विक्रम संवत 1770 श्रावण चौथ को अपने असंख्य श्रद्घालु भक्तों के समक्ष प्राणायाम मुद्रा में गुरु साहब बाबा ने जीवित समाधि ली थी। बाबा की याद में ही यहां मेला लगता है।
उल्लेखनीय है कि श्री देवजी संत गुरू साहब बाबा का जन्म विक्रम संवत 1727 में फाल्गुन सुदी पूर्णिमा को कटकुही गांव में हुआ था। 13 वर्ष की अल्पायु में अनेक तीर्थ यात्राएं करने वाले बाबा को कई नामों से प्रसिद्घि मिली। बाबा ने पंजाब में रहकर देवल बाबा नाम से प्रसिद्धि पाई जहां उनकी याद में मेला भी लगता है। इस मेले में लाखों लोग हिस्सा लेते हैं और कथित तौर पर भूत-प्रेत से ग्रसित व्यक्ति मुक्ति पाते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता मयंक भार्गव बताते हैं, "'भूत-प्रेत से पीड़ित महिला या पुरुष को मलाजपुर पहुंचने पर सबसे पहले बंधारा नदी में स्नान कराकर समाधि स्थल पर लाया जाता है। यहां पहुंचते ही पीड़ित व्यक्ति झूमने लगता है।
उसकी सांसे तेज चलने लगती है। आवाज बदल जाती है। वह जोर जोर से चिल्लाने लगता है। इतना ही नहीं पीड़ित कुछ इस तरह उछलने लगता है कि उसे साथ में आए लोगों को उसे संभालना मुश्किल हो जाता है। वह व्यक्ति जब यहां से लौटता है तो उसका अंदाज बदल जाता है।
आस्था की आड़ में बढ़ते अंधविश्वास पर बैतूल के जिला अधिकारी अरुण भट्ट का कहना है कि वह अंधविश्वास के समर्थक नहीं है लेकिन लोगों की आस्था के आगे वह कुछ नहीं कर सकते। इस मेले का आयोजन चिन्चोली जनपद पंचायत करती है और समिति ही साफ -सफाई पानी आदि की जरूरत को पूरा करती है। सुरक्षा के इंतजाम प्रशासन की ओर से किए जाते हैं।
जनपद सदस्य चिन्चोली सुभाष ठाकुर भी इस तरह के आयोजनों को ठीक नहीं मानते हैं। उनका कहना है, "इस तरह के आयोजनों का विरोध करके आम लोगों से बुराई कौन मोल ले। कोई भी इस अंधविश्वास के खिलाफ मुहिम चलाने का साहस नहीं कर पाता।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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