यूएपीए: आतंक से लड़ने का सही जवाब?

भारत ने ग़ैरक़ानूनी गतिविधि क़ानून को कड़ा बनाया है और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी के गठन को मंज़ूरी दी है. पर क्या आतंक से निपटने का ये सही जवाब है? नाराज़गी इतनी बड़ी थी कि सब ओर से कड़े क़ानून और संघीय जाँच एजेंसी की मांग उठने लगी.
अब संसद में ग़ैरक़ानूनी गतिविधि क़ानून को कड़ा बनाया है और एक राष्ट्रीय जाँच एजेंसी के गठन को मंज़ूरी दी है. पर क्या आतंक से निपटने का ये सही जवाब है. पेश है एक विवेचना.
राजनीति
केंद्र की यूपीए सरकार आतंकवाद से निपटने के लिए कड़े क़ानून का लगातार विरोध करती रही है, वहीं विपक्षी भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से ऐसे क़ानून की मांग करती रही है.
पोटा में कई ऐसे प्रावधान थे जो मानवाधिकार और लोगों की स्वतंत्रता के लिए ख़तरा थे, लेकिन यूएपीए में ऐसा नहीं है वृंदा ग्रोवर, वकील
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पर क्या वाकई मुंबई जैसे हमले क़ानून से रोके जा सकते हैं? क्या चुनावी माहौल में यूपीए कड़े क़ानून लाकर राजनीतिक फायदे के बारे में सोच रही है. मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा को कुछ ऐसा ही नज़र आता है.
नवलखा कहते हैं, "यूपीए दोमुंही बात करता है. पोटा के कई प्रावधान यूएपीए में डाल दिए हैं. ये कहना कि यूपीए सरकार की नीति अलग है, ग़लत है"
ये सरकार इस बात पर ज़ोर दे रही है कि वो 1967 के ग़ैरक़ानूनी गतिविधि निरोधक क़ानून यानी यूएपीए में संशोधन लाकर पीछे के रास्ते से पोटा और टाडा नहीं ला रही.
पर क्या वाकई संशोधित यूएपीए, पोटा से अलग है और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी, सीबीआई से अलग है.
आज तक पुलिस व्यवस्था राज्यों के हाथों में थी, पर क़ानूनविदों का मानना है कि जहाँ सीबीआई राज्य सरकार या अदालत के आदेश पर ही मामले हाथ में ले सकती है. मशहूर वकील वृंदा ग्रोवर बताती हैं कि कैसे यूएपीए, पोटा से अलग है.
वृंदा कहती हैं, "पोटा में कई ऐसे प्रावधान थे जो मानवाधिकार और लोगों की स्वतंत्रता के लिए ख़तरा थे. पोटा में जहाँ जज के सामने जुर्म कबूल करने को वैधानिक स्वीकृति दी गई थी, लेकिन यूएपीए में ऐसा नहीं है."
आशंकाएँ
जानकार कहते हैं कि 180 दिन तक हिरासत में रखने, मामला बनने पर ज़मानत नामंज़ूर करने और विदेशियों की ज़मानत न करने जैसे प्रावधानों का बांग्लादेशियों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो सकता है.
जानकारों का मानना है कि पुलिस को आधुनिक हथियारों से लैस करने की ज़रूरत है
साथ ही आतंकवादी घटना की परिभाषा इतनी व्यापक है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी या समाज के हर उस तबके जो अपने अधिकार की लड़ाई नहीं लड़ सकता, उसके ख़िलाफ़ इसका दुरुपयोग हो सकता हैं.
पंजाब पुलिस के पुलिस महानिदेशक केएस ढिल्लों का कहना है कि विषम परिस्थितियों से निपटने के लिए कड़े क़ानून की ज़रूरत है. पर असल ध्यान पुलिस प्रशासन पर दिया जाना चाहिए, जिनके हाथों में इस क़ानून का क्रियान्वयन है.
ढिल्लों कहते हैं, "हमारे मुल्क में ऐसे लोगों की तादाद बहुत ज़्यादा है जिनके ख़िलाफ़ पैसा नहीं है या फिर जिनके ख़िलाफ़ इस क़ानून का इस्तेमाल किया जा सकता है. चूँकि सुरक्षा एजेंसियां सरकार के नियंत्रण में हैं, इसलिए इसके दुरुपयोग की संभावनाएं हैं."
नए क़ानून के दुरुपयोग का डर मुस्लिम समाज को भी सता रहा है.
जमात-ए-इस्लामी हिंद के अमीर सैयद जलालुद्दीन उमर कहते हैं,"सरकार को मुंबई हमलों के बाद इसकी ज़रूरत महसूस हुई है. इस तरह के क़ानूनों पर अब तक का तजुर्बा ये रहा है कि इसका निशाना ज़्यादातर अल्पसंख्यक बन रहे हैं. इससे संविधान में मिले अधिकारों का हनन होता है. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे क़ानून को कभी पसंद नहीं किया है. हम भी इसकी मुख़ालफ़त करते हैं."
क़ानून की ज़रूरत
वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा का तर्क है कि आतंकवाद से निपटने के लिए सही माहौल तैयार करना ज़्यादा ज़रूरी है. लोगों को ये विश्वास होना चाहिए कि देश की क़ानून व्यवस्था के दायरे में उन्हें इंसाफ मिलेगा.
नवलखा कहते हैं, "इस क़ानून का किस तरह से दुरुपयोग होता रहा है ये हमने गुजरात और झारखंड में देखा है. कड़े क़ानूनों से इस तरह की घटनाओं को नहीं रोका जा सकता. अगर ख़ुफ़िया एजेंसियां सही तरीके से काम करती हैं और लोगों को इंसाफ मिले तो ऐसे क़ानूनों की ज़रूरत नहीं है."
ये बात तय है कि मौजूदा यूएपीए मुंबई हमलों से उत्पन्न परिस्थितियों की उपज है. पर जब पोटा या टाडा था, भारत में तब भी आतंकी हमले हुए थे. उन्हें रोका नहीं जा सका था. तो क़ानून पर ज़ोर देकर कहीं हम फिर ग़लत राह पर तो नहीं चल रहे हैं.
अगर ख़ुफ़िया एजेंसियां सही तरीके से काम करती हैं और लोगों को इंसाफ मिले तो ऐसे क़ानूनों की ज़रूरत नहीं है नवलखा, मानवाधिकार कार्यकर्ता
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वकील वृंदा ग्रोवर कहती हैं, "क़ानून के अभाव के कारण आतंकवाद नहीं बढ़ रहा है. आतंकवाद की छवि बदल चुकी है. आत्मघाती को आप क़ानून से कैसे डराएंगे. पुलिस को अच्छी ट्रेनिंग नहीं है और उसका कामकाज का तरीक़ा भी ठीक नहीं है."
पर केएस ढिल्लों इस आरोप को सही नहीं मानते. पर साथ ही पुलिस सुधार की मांग करते हैं. वे स्वयं लंबे समय से इस पर आवाज़ उठा रहे हैं.
उनका कहना है कि राजनेता पुलिस पर अपना नियंत्रण नहीं खोना चाहते इसलिए पुलिस सुधार पर ज़ुबानी जमाखर्च के अलावा आज तक कुछ नहीं हुआ.
ढिल्लों कहते हैं, "पुलिस सुधार का काम लंबे समय से चल रहा है, लेकिन हक़ीक़त में इस पर कुछ नहीं हुआ."
भारत में साथ ही बार-बार ये कहा जा रहा है कि दुनिया भर में आतंकवाद से लड़ने के लिए कड़े क़ानून बनाए गए हैं. भारत क्यों इनसे परहेज़ कर रहा है. पर वृंदा ग्रोवर इसे सही नहीं मानतीं.
वृंदा कहती हैं, "ये ग़लत धारणा है कि भारत में क़ानून कड़े नहीं हैं. यूएपीए पूरे देशभर में हर वक़्त लागू होता है. भारत में मुठभेड़ पर एफआईआर दर्ज नहीं होती."
प्रशिक्षण की दरकार
जैसे-जैसे मुंबई हमलों की जाँच हो रही है. वैसे-वैसे पुलिस प्रतिक्रिया में ढिलाई, गुप्तचर सूचनाओं पर ठीक से काम न करने, पुराने शस्त्रों और प्रशिक्षण के अभाव की बातें सामने आ रही हैं.
इस तरह के क़ानूनों पर अब तक का तजुर्बा ये रहा है कि इसका निशाना ज़्यादातर अल्पसंख्यक बन रहे हैं. इससे संविधान में मिले अधिकारों का हनन होता है सैयद जलालुद्दीन उमर
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पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक केएस ढिल्लों कहते हैं कि पुलिस को ऐसा प्रशिक्षण नहीं मिला है कि वे चरमपंथियों का मुक़ाबला कर सकें.
केएस ढिल्लों ये भी कहते हैं कि भारत में पुलिस को आतंकवाद से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण भी नहीं दिया जाता और आशा की जाती है कि वही पुलिसवाला जो वीआईपी सुरक्षा करता है, सिनेमा हॉल में तैनात है, वही एक दिन आतंकवादियों से भी भिड़ सकता है.
तो सरकार ने पुलिस, गुप्तचर व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय क़ानून बनाने जैसा आसान क़दम उठाया है. मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा कहते हैं कि सुरक्षा के नाम पर मानवाधिकारों के हनन की कोशिशें जारी हैं.
नवलखा कहते हैं, "सुरक्षा के नाम पर मानवाधिकारों के हनन की कोशिशें हो रही हैं. लेकिन लोगों को सुरक्षा देने से पहले उनके अधिकार सुरक्षित करने होंगे"
यानी शायद एक बार फिर सरकार कड़े और कड़वे सवालों की बजाय जनता के गुस्से को शांत करने और राजनीतिक नफे-नुकसान पर नज़र रख क़ानून और जाँच एजेंसी का सहारा ले रही हैं.
पर क्या पुलिस सुधार, गुप्तचर सेवाओं को और मुस्तैद बनाने जैसे क़दमों पर भी सरकार की नज़र जाएगी, ये देखने की बात होगी?


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