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'हमने कम किया लोगों का डर'

By Sridhar L
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'हमने कम किया लोगों का डर'

हमने पोटा हटाया, टास्क फ़ोर्स को ख़त्म किया और विकास के काम किए तो लोगों को भरोसा हुआ कि जम्मू-कश्मीर की सरकार उनके बारे में भी सोच सकती है.

इतनी बड़ी संख्या में लोग वोट देने इसलिए निकल रहे हैं क्योंकि वो समझ गए हैं कि चुनाव बहिष्कार के बावजूद सरकार बनेगी और ख़ुदा न खास्ता ऐसी सरकार न आ जाए जिसने माज़ी में यानी पुराने समय में बहुत तकलीफ़ें दीं, काले क़ानून लागू किए.

पहले जिनकी सरकारें रही हैं उनका नज़रिया कश्मीर के पक्ष में नहीं रहा है, वो भारत की सांप्रदायिक एजेंडे वाले लोगों के साथ रहे हैं.

जम्मू और कश्मीर क्षेत्रों के बीच तनाव ज़रुर था लेकिन हमें यक़ीन है कि हम जम्मू में भी सबसे बड़ी पार्टी के रुप में जीतकर आएँगे.

जम्मू और कश्मीर क्षेत्रों के बीच तनाव ज़रुर था लेकिन हमें यक़ीन है कि हम जम्मू में भी सबसे बड़ी पार्टी के रुप में जीतकर आएँगे.

हमने सरकार में आने के बाद मसला-ए-कश्मीर को हल करने की पहल की, दोनों देशों के बीच बातचीत की शुरुआत करवाई और लोगों को मेलजोल का मौक़ा दिया.

तो लोग इस बार चाहते हैं कि जो भी सरकार बने उसमें उनका योगदान रहे. उन्हें यक़ीन हो गया है कि अपना फ़ैसला वो ख़ुद कर सकते हैं और उन पर कोई फ़ैसला थोपा नहीं जा सकता.

लेकिन बड़ी संख्या में जिस तरह लोग वोट देने निकल रहे हैं उसका मतलब यह क़तई नहीं निकालना चाहिए कि इससे कश्मीर का मसला ख़त्म हो गया है.

लोंगो को लग रहा है कि पीडीपी ने तीन साल में जो काम किए अगर उनको छह साल का वक़्त मिलता तो शायद ज़्यादा काम कर पाते.

इसलिए हम यक़ीन के साथ कह रहे हैं कि लोग पीडीपी को ही वोट देने के लिए निकल रहे हैं. जहाँ तक नेशनल कॉन्फ़ेंस का सवाल है तो फ़ारुख़ अब्दुल्ला अभी दो दिन पहले ही सार्वजनिक रुप से हुर्रियत के नेताओं को कोस रहे थे कि उनके चुनाव बहिष्कार का लोगों पर असर नहीं हो रहा है और उनके लोग निकलकर पीडीपी को वोट डाल रहे हैं.

'भावनाओं को नहीं समझा'

हाँ हमने कहा था कि चुनाव के लायक माहौल नहीं है लेकिन इसे यह नहीं समझना चाहिए कि हमने लोगों की भावनाओं को समझने में ग़लती की.

जहाँ तक महिलाओं की बड़ी संख्या में भागीदारी का सवाल है तो यह पीडीपी सरकार की उस पहल का फल है जिसमें उसने म्युनिसिपल के चुनाव में महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण देने का फ़ैसला किया था और लोगों को यक़ीन हुआ कि महिलाएँ ज़्यादा बेहतर काम कर सकती हैं.

जम्मू और कश्मीर क्षेत्रों के बीच तनाव ज़रुर था लेकिन हमें यक़ीन है कि हम जम्मू में भी सबसे बड़ी पार्टी के रुप में जीतकर आएँगे.

नतीजों के बाद देखेंगे कि सरकार किस तरह बनानी है. यह तय है कि नतीजों के बाद हमारे पास सरकार बनाने के लिए बहुत सारे विकल्प होंगे.

जहाँ तक भारत-पाकिस्तान के संबंधों का सवाल है तो दोनों मुल्कों के बीच रिश्तों का सबसे ज़्यादा असर जम्मू-कश्मीर के लोगों पर ही पड़ता है.

मुंबई में जो कुछ हुआ वह बुरा हुआ लेकिन यह समझना होगा कि दस लोगों ने अगर मुंबई में जाकर कुछ किया है तो इसके लिए पूरे देश को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

मालेगाँव के पीछ हिंदू संगठनों का नाम आ रहा है तो अगर उनमें से कुछ लोग किसी दूसरे मुल्क़ में जाकर कोई आतंकी हमला कर दें तो क्या इसके लिए हमारे मुल्क को दोषी ठहराना सही होगा?

(बीबीसी संवाददाता विनोद वर्मा से श्रीनगर में हुई बातचीत के आधार पर)

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