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आज़ादी और भारी मतदान: दो अलग मुद्दे

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kashmir polls

कश्मीर के लोग मानते हैं कि भारी मतदान को आज़ादी के मसले से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही अलग-अलग मसले हैं.

अभी बहुत दिन नहीं गुज़रे हैं जब भारतीय कश्मीर की सड़कों पर आज़ादी की माँग को लेकर लाखों लोग सड़क पर उतर आए थे और अब, जब चुनाव हो रहे हैं तो बड़ी संख्या में लोग मतदान केंद्रों तक जाकर विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाल रहे हैं.

इसमें एक तरह का विरोधाभास दिखता है. आख़िर जो लोग अलगाववादी गुटों के आह्वान पर आज़ादी की माँग करने जुट जाते हैं वही लोग उन्हीं अलगाववादी गुटों के चुनाव बहिष्कार की अपील की अनदेखी कैसे कर रहे है?

 आम लोग समझते हैं कि हम तो आज़ादी के जद्दोजहद के साथ ही हैं तो अब वो डवलपमेंट के लिए वोट डाल देंगे. जो लोग सामने आएंगे उनसे जाकर कहेंगे कि हमारे यहाँ पानी नहीं है, सड़क नहीं है, मदरसा नहीं है या अस्पताल नहीं है   सैयद अली शाह गिलानी

 आम लोग समझते हैं कि हम तो आज़ादी के जद्दोजहद के साथ ही हैं तो अब वो डवलपमेंट के लिए वोट डाल देंगे. जो लोग सामने आएंगे उनसे जाकर कहेंगे कि हमारे यहाँ पानी नहीं है, सड़क नहीं है, मदरसा नहीं है या अस्पताल नहीं है

वरिष्ठ अलगाववादी नेता और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के एक धड़े के प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी कहते हैं कि चुनाव से मामला ख़त्म नहीं हो गया है, “आम लोग समझते हैं कि हम तो आज़ादी के जद्दोजहद के साथ ही हैं तो अब वो डवलपमेंट के लिए वोट डाल देंगे. जो लोग सामने आएंगे उनसे जाकर कहेंगे कि हमारे यहाँ पानी नहीं है, सड़क नहीं है, मदरसा नहीं है या अस्पताल नहीं है."

वर्ष 2002 में हुए चुनावों के बाद, पहले गठबंधन का नेतृत्व करते हुए और फिर गठबंधन की सहयोगी की तरह सत्ता में रही पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती भी यही कहती हैं, “जिस तादाद में लोग वोट डालने के लिए निकल रहे हैं मेरे ख़याल में इससे हमको यह नहीं समझना चाहिए जो लोग आज़ादी के लिए निकले थे या मसला-ए-कश्मीर के लिए निकले थे वो शायद अब ख़त्म हो गया है, ऐसा क़तई नहीं है."

विरोधाभास नहीं

दरअसल मतदान करने वाले लोगों ने भी मान लिया है कि चुनाव और आज़ादी दो अलग-अलग मसले हैं. ऑडियो कैसेट का व्यावसाय करने वाले रफ़ीक अहमद कहते हैं, “वोट हम इसलिए नहीं डालते ना कि ये हमें आज़ादी देंगे. जो चीफ़ मिनिस्टर बनेगा वो आज़ादी देगा नहीं. आज़ादी तो भारत और पाकिस्तान को मिलकर देना है."

महबूबा मुफ़्ती कहती हैं कि आज़ादी का मसला ठंडा नहीं पड़ा है

श्रीनगर के अख़बार कश्मीर इमेजेस के संपादक बशीर मंज़र मानते हैं कि लोगों ने दोनों मसलों को अलग करके देखना सीख लिया है, “सरकार ने अमरनाथ मंदिर बोर्ड को ज़मीन दे दी तो इसके ख़िलाफ़ जो आंदोलन खड़ा हुआ वो आज़ादी के आंदोलन से जुड़ गया और आख़िर में इसे कश्मीर मुद्दे से जोड़ दिया गया. कश्मीरियों ने सालों से बहुत कुछ सहा है, वह मरता रहा है, इस सारी मुसीबत ने उसे इतना परिपक्व बना दिया है कि उसने आज़ादी और इलेक्शन को अलग-अलग करके देखना सीख लिया है."

तो लोग सिर्फ़ इसलिए वोट डालने इतनी बड़ी संख्या में निकल रहे हैं कि दोनों मसले अलग दिखने लगे. बशीर मंज़र मानते हैं कि इसके पीछे एक कारण और है, “ वर्ष 2002 के चुनाव ने लोगों को यह सिखाया कि जितना वो चुनावों का बहिष्कार करते हैं उतना ही वो अवांछित लोगों को असेंबली में जाने का मौक़ा देते हैं जो उनका काम भी नहीं कर सकते."

वो कहते हैं, “इस बार लोगों ने सोचा कि क्यों न उन लोगों को चुना जाए जो सही मायनों में उनका प्रतिनिधित्व करने लायक हों."

निराशा भी है

लेकिन ऐसा नहीं है कि सभी ने चुनाव को सकारात्मक नज़रिए से ही देखना शुरु कर दिया है. अभी भी ऐसे लोगों की संख्या बड़ी है जो चुनाव और राजनीतिक दलों के रवैये से निराश दिखते हैं. ख़ासकर श्रीनगर ज़िले की उन आठ विधानसभा के लोग जहाँ सातवें और अंतिम चरण का मतदान होना है.

तहमीना कहती हैं कि चुनाव बहिष्कार से कुछ हासिल नहीं होगा

एक और व्यावसायी मोहम्मद ताहिर कहते हैं, “ये इलेक्शन तो फ़्रॉड हैं, ये तो 1953 से हो रहे हैं, हल तो कुछ नहीं निकल रहा है."

और कुछ मतदाताओं के मन में तो बीते सालों में मिले ज़ख़्म इतनी गहरे हैं कि वो वोट डालने के लिए निकलने को तैयार ही नहीं दिखते लेकिन वो चुनाव बहिष्कार को भी हल नहीं मानते.

एमकॉम की छात्रा तहमीना के तेवर तीखे दिखते हैं, “चुनाव बहिष्कार से कोई हल नहीं निकलेगा और ना ही चुनाव से क्योंकि हालात दोनों तरफ़ से तितर बितर है. पिट रहे हैं तो कश्मीरी ही पिट रहे हैं."

 ये इलेक्शन तो फ़्रॉड हैं, ये तो 1953 से हो रहे हैं, हल तो कुछ नहीं निकल रहा है   व्यवसायी मोहम्मद ताहिर

 ये इलेक्शन तो फ़्रॉड हैं, ये तो 1953 से हो रहे हैं, हल तो कुछ नहीं निकल रहा है

चुनाव बहिष्कार की अपील बेअसर दिख रही है लेकिन सैयद अली शाह गिलानी इससे चिंतित नहीं हैं. वो मानते हैं कि चुनाव ख़त्म होने के बाद भी लोग आज़ादी का परचम उठाने को तैयार दिखेंगे.

और इत्तेफ़ाक नहीं है कि महबूबा मुफ़्ती भी ऐसा ही सोचती हैं.

जम्मू-कश्मीर के बाहर, ख़ासकर दिल्ली में मतदान के प्रतिशत को देखकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. कुछ लोग इन चुनावों को अलगाववादी गुटों का हाशिए पर चला जाना मान रहे हैं तो कुछ इसे कश्मीरियों के मन में भारत के प्रति आकर्षण की तरह देख रहे हैं.

लेकिन लगता नहीं कि यह दो और दो को जोड़ने जैसा आसान गणित है.

 

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