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टखनों को लचीला बनाता है उत्कट आसन

By Staff
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टखनों को लचीला बनाता है उत्कट आसन

इसी तरह फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए वक्ष स्थल शक्ति विकासक व्यायाम किया जा सकता है.

उत्कट आसन

दोनों पैरों को मिलाकर रखिए और सीधे खड़े रहें. पैरों की एड़ियाँ और उंगलियाँ भी मिलाकर रखें. दोनों घुटनों को मोड़ते हुए नीचे बैठिए और एड़ियों को उठा लीजिए ताकि पूरे शरीर का संतुलन दोनों पैरों की उंगलियों पर रहे.

दोनों घुटनों को मिलाकर रखिए. रीढ़ को सीधा रखने का प्रयास करें. दोनों हाथों को बगल में ज़मीन से सटाकर रखें ताकि संतुलन बनाने में सुविधा हो.

इसके बाद दोनों कोहनियों को जंघाओं पर रखिए और हाथों की उंगलियों को आपस में मिलाकर ठुड्डी के नीचे रखिए.

सांस के प्रति सजग रहें और संतुलन बनाए रखने का प्रयास करें. एक-दो मिनट तक इस स्थिति में रुकें और सामने किसी एक बिंदु पर एकाग्र करें. इसके बाद फिर से खड़े हो जाएँ.

अगर खड़े होने में असुविधा हो तो ज़मीन पर बैठ जाएँ. पैरों को सीधा कर लें ताकि खून का संचार सही तरीके से हो सके. थोड़ी देर रुकने के बाद इस आसन का दो-तीन बार अभ्यास करें.

अगर घुटनों, एड़ियों और टखनों में दर्द हो तो इस आसन के अभ्यास से बचना चाहिए.

जिनके पैर के तलवे बिल्कुल समतल हैं, उन्हें इस आसन के अभ्यास से काफ़ी लाभ मिलता है और कुछ हद तक इससे होने वाली परेशानी से छुटकारा पाया जा सकता है.

वक्ष स्थल शक्ति विकासक

उत्कट आसन के अभ्यास से पैरों की उंगलियों और टखनों की की लचक बढ़ जाती है. पैरों और कमर की थकान दूर होती है.

इस आसन में संतुलन बढ़ाने से एकाग्रता बढ़ती है. शरीर और मस्तिष्क के बीच समन्वय स्थापित होता है.

वक्ष स्थल शक्ति विकासक

सीधे खड़े हो जाएँ और दोनों पैर मिलाकर रखें. दोनों हथेलियों को जंघाओं के सामने रखिए, बाजू सीधी रहनी चाहिए. अब सांस भरते हुए हाथों को सामने से ऊपर उठाते हुए सिर के ऊपर लेकर आएँ.

सांस रोकिए और अपनी बाजू, सिर और कंधों को एक साथ पीछे की ओर खींचिए ताकि छाती में भी खिंचाव महसूस हो. इसके बाद सांस छोड़ते हुए हाथों को फिर नीचे लेकर आएँ और सांस सामान्य कर लें. इस क्रिया को पाँच-छह बार दोहराइए.

इस अभ्यास को धीरे-धीरे करें. सांस भरते हुए पूरी सजगता से अपने शरीर में खिंचाव लाइए और सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे हाथों को नीचे लेकर आएँ.

इस क्रिया के अभ्यास से आलस्य, सुस्ती दूर होती है. शरीर में एक नई ताजगी का अनुभव होता है.

फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है, फेफड़ों के वायुकोष अधिक सक्षम बनते हैं. कहने का मतलब फेफड़े, ज़्यादा से ज़्यादा शुद्ध वायु को ग्रहण करते हैं और अशुद्ध हवा को पूरी तरह से बाहर निकाल देते हैं.

इस प्रकार रक्त की शुद्धि होती है और शरीर में रक्त का संचार बढ़ता है.

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