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आँखों का अत्याधुनिक इलाज

By Staff
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आँखों का अत्याधुनिक इलाज

नहीं, नहीं मैं आपको किसी पर्यटन स्थल की सैर कराने नहीं ले जा रही हूँ. बस इतना बता रही हूँ कि भारत के विकसित राज्यों में से एक कर्नाटक का यह क्षेत्र देश के सबसे पिछड़े इलाक़ों में से एक है.

लेकिन यहाँ मैंने देखी अत्याधुनिक उपकरणों से लैस एक मोबाइल वैन जो उन मरीज़ों के इलाज के लिए आई थी जो डायाबिटीज़ यानी मधुमेह की वजह से अपनी आँखों की रोशनी खो चुके हैं या खोने की कगार पर हैं.

अब तक रेटीनोथेरेपी का इलाज केवल बड़े शहरों में ही उपलब्ध था. जिसका मतलब है लोगों को इलाज के लिए 200-300 किलोमीटर का सफ़र तय करना होता था जो उनमें से बहुत से लोगों के बस की बात नहीं थी.इस मोबाइल वैन ने उनकी यह मुश्किल आसान कर दी है. डॉक्टर सिवारामा

अब तक रेटीनोथेरेपी का इलाज केवल बड़े शहरों में ही उपलब्ध था. जिसका मतलब है लोगों को इलाज के लिए 200-300 किलोमीटर का सफ़र तय करना होता था जो उनमें से बहुत से लोगों के बस की बात नहीं थी.इस मोबाइल वैन ने उनकी यह मुश्किल आसान कर दी है.

इस वैन के लिए ज़िम्मेदार है वर्ल्ड डायबिटीज़ फ़ाउंडेशन जिसने राज्य के कुछ बड़े नेत्र अस्पतालों के साथ मिल कर यह सुविधा मुहैया कराई है.

विश्व में कहीं भी अगर किसी की आँखों की रोशनी जाती है तो उसका सबसे बड़ा कारण डायबिटीज़ है.

भारत में डायाबिटीज़ के मरीज़ों की संख्या दुनिया के किसी भी देश से ज़्यादा है. एक अनुमान के अनुसार भारत में जिन लोगों को पिछले दस साल या उससे ज़्यादा समय से डायबिटीज़ है उन पाँच में से एक व्यक्ति डायबिटीक रेटीनोपैथी का शिकार हो सकता है.

यानी इस बीमारी से उसकी देखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.

इस मोबाइल वैन के साथ आए डॉक्टर सिवाराम का कहना था, "अब तक रेटीनोथेरेपी का इलाज केवल बड़े शहरों में ही उपलब्ध था. जिसका मतलब है लोगों को इलाज के लिए 200-300 किलोमीटर का सफ़र तय करना होता था जो उनमें से बहुत से लोगों के बस की बात नहीं थी. इस मोबाइल वैन ने उनकी यह मुश्किल आसान कर दी है".

लेज़र से इलाज

मधुमेह के कई रोगी नेत्रहीन होने की कगार पर हैं

मैंने चामराजा नगर की इस वैन में लोगों का लेज़र से इलाज होते भी देखा.

कुछ मरीज़ों से उनकी आपबीती जानने की कोशिश की तो पता चला कि वे कन्नड़ के अतिरिक्त और कुछ नहीं बोल पाते. किसी तरह दुभाषिए की मदद से उनकी बात समझने की कोशिश की.

एक मरीज़ अन्नास्वामी की उम्र अभी सिर्फ़ तीस वर्ष है लेकिन वह लंबे समय से यह परेशानी झेल रहे हैं. आँखों से कम दिखने की वजह से वह कहीं नौकरी भी नहीं कर पाते और पूरी तरह अपने पिता पर निर्भर हैं.

अन्नास्वामी का कहना था, "जब मेरा वज़न तेज़ी से कम होने लगा तो मैं घबराया. उस समय तक मैंने मधुमेह के बारे में सुना भी नहीं था. डॉक्टरों ने मुझसे ख़ून की जाँच कराने को कहा तब पता चला कि मुझे यह बीमारी है. मेरे परिवार में पहले कोई भी इससे पीड़ित नहीं रहा है".

मैं अट्ठारह साल से इस रोग से परेशान हूँ और पिछले दो साल में मेरी नज़र पूरी तरह कमज़ोर हो गई है. पहले इसका असर एक आँख पर पड़ा लेकिन अब दोनों आँखें बेकार होती जा रही हैं. सिर्फ़ धुँधले से आकार नज़र आते हैं. मेरा गुर्दा भी ख़राब हो गया है. एक मरीज़ महादेव

मैं अट्ठारह साल से इस रोग से परेशान हूँ और पिछले दो साल में मेरी नज़र पूरी तरह कमज़ोर हो गई है. पहले इसका असर एक आँख पर पड़ा लेकिन अब दोनों आँखें बेकार होती जा रही हैं. सिर्फ़ धुँधले से आकार नज़र आते हैं. मेरा गुर्दा भी ख़राब हो गया है.

इस तरह की मोबाइल सेवा कर्नाटक के 13 ज़िलों मे उपलब्ध कराई गई है. यह दूरदराज़ के गाँवों में जाती है और मरीज़ो को पहले से सूचना दे दी जाती है.

मरीज़ बसों या बैलगाड़ियों में सवार हो कर इलाज कराने आते हैं. मेरी कुछ ऐसे लोगों से भी मुलाक़ात हुई जो बस का किराया तक ख़र्च करने की स्थिति में नहीं है और पंद्रह-बीस मील की यात्रा पैदल ही तय करते हैं.

साठ वर्षीय महादेव अपनी बेटी के कंधे का सहारा लेकर वहाँ पहुँचे थे. उनका कहना था, "मैं अट्ठारह साल से इस रोग से परेशान हूँ और पिछले दो साल में मेरी नज़र पूरी तरह कमज़ोर हो गई है. पहले इसका असर एक आँख पर पड़ा लेकिन अब दोनों आँखें बेकार होती जा रही हैं. सिर्फ़ धुँधले से आकार नज़र आते हैं. मेरा गुर्दा भी ख़राब हो गया है".

महादेव महीने में एक बार मोबाइल वैन के साथ आए डॉक्टरों से मिलते हैं. उन्हें इलाज से फ़ायदा नज़र आ रहा है और अब वह आकार पहचान सकते हैं.

इस परियोजना की शुरुआत को अभी तीन साल ही हुए हैं और अब तक इससे तीस हज़ार से ज़्यादा रोगी लाभ उठा चुके हैं. अब ज़रूरत है इसे देश के अन्य भागों से जोड़ने की जहाँ लाँखों लोग चिकित्सा के अभाव में अपनी आँखों की रोशनी पूरी तरह खो चुके हैं.

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