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चल गया शीला दीक्षित का जादू

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शीला का जादू चल गया

मोहनलाल सुखाड़िया 1954 से 1971 तक राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे जो करीबन 17 साल का कार्यकाल माना जाता है जो अब तक किसी भी कांग्रेसी मुख्यमंत्री का सर्वाधिक लंबा कार्यकाल माना जाता रहा है.

इसके अलावा कांग्रेस के वसंत नायक महाराष्ट्र में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे. उनका कार्यकाल 1962 से 1975 तक का रहा है जो 15 साल का कार्यकाल है.

वैसे पश्चिम बंगाल में वामपंथी दल लगातार पांच बार चुनाव जीत चुके हैं और ज्योति बसु लगातार 20 वर्ष मुख्यमंत्री रहे हैं.

आपातकाल के बाद कांग्रेस का कोई भी मुख्यमंत्री लगातार तीन बार सरकार नहीं बना पाया है.

हाल की बात करें तो मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह लगातार दो बार सरकार बनाने में कामयाब रहे थे लेकिन अब कांग्रेस मध्य प्रदेश में लगातार दूसरी बार हार गई है.

शीला का कार्यकाल

दिल्ली में पहली बार जब विधानसभा चुनाव हुए थे तो उसमें भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली थी और मुख्यमंत्री बने मदनलाल खुराना लेकिन 1998 के चुनावों में शीला दीक्षित ने जीत दर्ज़ की.

इसके बाद शीला दीक्षित ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. 2003 में हुए चुनावों में कांग्रेस अंदरुनी गुटबाज़ी का शिकार मानी जा रही थी और लग रहा था कि कांग्रेस की जीत के बावजूद शायद शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद न मिले.

ऐसा हुआ नहीं. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने शीला दीक्षित में विश्वास जताया और 2003 में पदभार ग्रहण करने के बाद उन्होंने विकास कार्य किया.

2008 के चुनावों में कोई सत्ता विरोधी लहर नहीं दिखी जो अपने आप में शीला दीक्षित की एक उपलब्धि मानी जा सकती है.

शीला दीक्षित का व्यक्तित्व भी एक मुद्दा रहा और भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार विजय कुमार मल्होत्रा के सामने शीला एक बेहतर विकल्प के रुप में उभर कर सामने आईं.

2003 की तुलना में इस बार कांग्रेस की सीटें कम ज़रुर हुई हैं लेकिन कांग्रेस लगातार तीसरी बार सरकार बनाने में कामयाब हुई यह बहुत बड़ी बात मानी जा सकती है.

लेकिन क्या इस जीत से पार्टी में शीला दीक्षित का कद बढ़ेगा, यह एक अहम सवाल है.

यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि शीला अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाएंगी केंद्रीय नेतृत्व में.

भले ही सोनिया गांधी से उनके सीधे संबंध हों लेकिन सोनिया के राजनीतिक सचिव और महत्वपूर्ण नेता अहमद पटेल के साथ उनके कटु संबंध जगजाहिर हैं.

ऐसे में भले ही शीला ने तीसरी बार जीत हासिल कर ली हो लेकिन फिलहाल ऐसा लगता नहीं कि उन्हें केंद्रीय नेतृत्व में अत्यंत सक्रिय भूमिका निभाने का मौका मिल पाएगा.

वैसे भी इस समय शीला दीक्षित का पूरा ध्यान 2010 में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों पर है और वो शायद ही केंद्र में आना चाहेंगी.

केंद्र में भले ही शीला सक्रिय न हो लेकिन एक बात साफ़ है कि कम से कम दिल्ली की राजनीति में शीला अत्यंत महत्वपूर्ण होंगी और कम से कम विधानसभा के स्तर पर उनको अगले कुछ वर्षों में शायद ही किसी से चुनौती मिल पाएगी.

 

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