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डायबिटीज़ में भारत अव्वल नंबर

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डायबिटीज़ में भारत अव्वल नंबर

पिछले साल दुनिया में इस बीमारी से मरने वालों की संख्या 38 लाख थी. यानी मरने वाले सभी लोगों का छह प्रतिशत. एक अनुमान के अनुसार इस समय दुनिया भर में 24 करोड़ 60 लाख लोग डायबिटीज़ से पीड़ित हैं और 2025 तक इस संख्या के 38 करोड़ हो जाने की आशंका है.

डायबिटीज़ पर चिंता

हाल ही में चेन्नई में संपन्न हुए दक्षिण-पूर्व एशिया में डायबिटीज़ सम्मेलन में प्रमुख स्वास्थ्य विशेषज्ञों, स्वास्थ्य मंत्रियों, दानकर्ताओं और राष्ट्रीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने इन्हीं विषयों पर अपनी चिंता का इज़हार किया.

 हर लड़की की नियमित जाँच ज़रूरी है. क्योंकि गर्भावस्था में यह रोग माँ से शिशु में बहुत आसानी से प्रविष्ट हो सकता है. सब जानते हैं कि यह आनुवंशिक है. लेकिन इसको नियंत्रित किया जा सकता है.   प्रोफ़ेसर सीएस याज्ञनिक

 हर लड़की की नियमित जाँच ज़रूरी है. क्योंकि गर्भावस्था में यह रोग माँ से शिशु में बहुत आसानी से प्रविष्ट हो सकता है. सब जानते हैं कि यह आनुवंशिक है. लेकिन इसको नियंत्रित किया जा सकता है.

सम्मेलन का आयोजन, विश्व स्वास्थ्य संगठन, वर्ल्ड डायबिटीज़ फ़ाउंडेशन, अंतरराष्ट्रीय डायबिटीज़ फ़ेडेरेशन और विश्व बैंक ने संयुक्त रूप से किया था.

सम्मेलन में भारत की स्थिति पर विशेष रूप से चिंता प्रकट की गई क्योंकि भारत में सबसे बड़ी आबादी मधुमेह से पीड़ित है. देश में इस समय डायबिटीज़ के मरीज़ों की संख्या चार करोड़ है जिसके 2025 तक सात करोड़ हो जाने की आशंका व्यक्त की जा रही है.

समय रहते ही...

जानलेवा है लेकिन समय रहते इस पर क़ाबू पाया जा सकता है. जैसे, सम्मेलन में हिस्सा ले रहे पुणे के स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉक्टर चित्तरंजन सकरलाल याज्ञनिक का कहना था कोशिश यह होनी चाहिए कि यह रोग माँ से बच्चे में न जाने पाए.

सम्मेलन में आए विशेषज्ञों ने बीबीसी से विशेष रूप से बात की

उनका कहना था, "हर लड़की की नियमित जाँच ज़रूरी है. क्योंकि गर्भावस्था में यह रोग माँ से शिशु में बहुत आसानी से प्रविष्ट हो सकता है. सब जानते हैं कि यह आनुवंशिक है. लेकिन इसको नियंत्रित किया जा सकता है".

डायबिटीज़ का शरीर के कई अंगों पर असर होता है. दस साल लगातार इस रोग को झेल चुके रोगी की आँखों की रोशनी तो प्रभावित होती है उसके अन्य अंग भी इसकी चपेट में आ सकते हैं.

कई विकासशील देशों में इसका इलाज टाँग का वह हिस्सा काट देना ही ठीक समझा जाता है जो इस रोग के प्रभाव में आ कर संक्रमित हो चुका हो.

डायबिटीज़ फ़ाउंडेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में जितने लोगों के पैर का अगला हिस्सा या घुटनों तक टाँग काट दी जाती है उनमें से 70 प्रतिशत मामलों में इसकी वजह डायबिटीज़ ही होती है.

चोट का अहसास नहीं होता

दरअसल डायबिटीज़ की वजह से उनकी टाँगों की संवेदनशीलता जाती रहती है और उन्हें किसी चोट या खरोंच का पता नहीं चलता जो बाद में आगे जा कर संक्रमित हो सकती है.

 मैं जब स्कूल जाता था तो पाँच किलोमीटर पैदल चल कर वहाँ पहुँचता था. आज मेरे बच्चे कार से स्कूल जाते हैं. लोगों की जीवनशैली बदल चुकी है. शारीरिक परिश्रम तो दूर की बात प्रायः वे व्यायाम भी नहीं करते   श्रीलंका के स्वास्थ्य मंत्री

 मैं जब स्कूल जाता था तो पाँच किलोमीटर पैदल चल कर वहाँ पहुँचता था. आज मेरे बच्चे कार से स्कूल जाते हैं. लोगों की जीवनशैली बदल चुकी है. शारीरिक परिश्रम तो दूर की बात प्रायः वे व्यायाम भी नहीं करते

डायबिटीज़ के रोगी यूँ तो दुनिया भर में फैले हुए हैं लेकिन भारत, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका जैसे दक्षिण एशियाई देशों में इनकी संख्या चिंताजनक हद तक बढ़ चुकी है.

डायबिटीज़ होने के प्रमुख कारणों में पौष्टिक आहार की कमी और माता या पिता में इसके लक्षण होना तो शामिल हैं ही श्रीलंका के स्वास्थ्य मंत्री निमल सिरीपला डि सिल्वा ने बीबीसी से कहा कि शारीरिक श्रम का अभाव भी इसकी एक बड़ी वजह है.

जीवनचर्या बदली

उनका कहना था, "मैं जब स्कूल जाता था तो पाँच किलोमीटर पैदल चल कर वहाँ पहुँचता था. आज मेरे बच्चे कार से स्कूल जाते हैं. लोगों की जीवनशैली बदल चुकी है. शारीरिक परिश्रम तो दूर की बात प्रायः वे व्यायाम भी नहीं करते.''

स्वास्थ्य मंत्री ने कहा,'' इसके अलावा लोगों की खाने पीने की आदतें भी बदली हैं. अब श्रीलंका के ही लगभग पंद्रह लाख लोग मध्यपूर्व में काम करते हैं जहाँ वे भारी चिकनाई वाला खाना खाते हैं. हरी सब्ज़ियों की ओर तो देखते भी नहीं. बस यही सब कारण हैं.''

शायद इन्ही कारणों को देखते हुए भारत के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामादॉस ने अगले शैक्षिक सत्र से सभी स्कूलों में योग की शिक्षा अनिवार्य करने की घोषणा की है.

कहते हैं एक बार डायबिटीज़ हो जाने पर उसे नियंत्रित तो किया जा सकता है, पूरी तरह दूर किया जाना अब भी आसान नहीं है. इसीलिए इसका न होना ही अच्छा और यह आपके अपने बस में हैं. बस ज़रूरत है थोड़े संयम की, पौष्टिक आहार की और इस प्रयास की आपका शरीर निष्क्रिय न होने पाए.

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