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मुठभेड़ और मीडिया सर्कस

By सुशील कुमार झा
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बंधकों के ज़्यादातर रिश्तेदारों ने मीडिया के दूर रहने में ही भलाई समझी
मुंबई में हुए हमलों में अगर सबसे व्यवस्थित कोई दिखे तो वो थे चरमपंथी और एनएसजी के कमांडो जबकि सबसे अव्यवस्थित थी पुलिस और फिर मीडिया.

चरमपंथियों को पता था कि उन्हें कहां जाना है क्या करना है और कैसे करना है.

लगता नहीं कि कहीं भी उन्हें अपनी योजना में फेरबदल करना पड़ा हो. दूसरी ओर थी मुंबई की पुलिस जिसने शुरुआती समय में कोई भी ऐसा क़दम नहीं उठाया जिससे चरमपंथियों पर काबू पाया जा सके.

नतीजा ये हुआ कि आतंकवादी निरोधी दस्ते (एटीएस) के प्रमुख समेत आला अधिकारी कई और पुलिसकर्मी मारे गए. आखिरकार जब सेना और एनएसजी के कमांडो घटनास्थल पर पहुंचे और कमान अपने हाथों में ली तब जाकर कहीं मुंबई पुलिस के चेहरे पर राहत देखी जा सकी.

एनएसजी की व्यवस्था चुस्त दुरुस्त, चाक चौबंद. चरमपंथी घेरे में और 48 घंटों के बाद दो स्थानों पर कमांडो कामयाबी.

जहां तक पुलिस का सवाल है तो सेना ने जब घटनास्थलों को अपने नियंत्रण में ले लिया तो उन्हें भीड़ को दूर रखने का काम दिया गया और पुलिस ये काम भी ठीक से नहीं कर सकी.

करीब 40 घंटों तक हर आदमी को ताज पर जाने की अनुमति थी बिना किसी चेकिंग के. यही हाल ओबेराय और नरीमन हाउस पर भी था. इतने घंटों के बाद जाकर कहीं ताज पर लोगों को रोका जाने लगा और पहली बार हमारे पहचान पत्र देखे गए.

पुलिस की लापरवाही ही थी कि ओबेराय में बंधकों की रिहाई के समय बार बार अफ़रा-तफरी का माहौल बनता रहा और बंधकों को मीडिया ने ख़ासा परेशान किया.

इस तरह के हमलों के दौरान मीडिया की भूमिका पर हमेशा से बहस होती रही है लेकिन इसके बाद भी लगता नहीं है कि भारतीय टीवी चैनलों ने कोई सीख ली है.

पूरे देश से और विदेशों से पत्रकार जमा हुए मुंबई में लेकिन कई मौकों पर उनका रवैया शर्मसार करने वाला दिखा.

परेशान करने वाला रवैया

ओबेराय पर जब बंधक रिहा होकर निकल रहे थे तब जिस तरह मीडियाकर्मियों ने तस्वीरों और बाइट के लिए घेरा वो उनकी परेशानी को एक तरह से बढ़ाने वाला ही रहा.

जिसकी जान पर बनी हो कई घंटों से और फिर मुश्किल से जान बची हो वो क्या बताएगा कि उस पर क्या बीती है लेकिन टीवी चैनल तो चाहते थे कि वो अपनी पूरी रामकहानी उन्हें सुना दें.

जब कुछ विदेशी बंधक निकले तो लगा मानो मीडियाकर्मी अपने माइक उन्हें मुंह में न घुसा दें. इस व्यक्ति ने मात्र इतना ही कहा, "आपको मेरी प्राइवेसी का सम्मान करना चाहिए. मैं बात नहीं करना चाहता."

लेकिन उनकी बात किसी ने नहीं सुनी. शायद यही कारण था कि ओबेराय के पास उन लोगों ने मीडिया से दूर रहना ही उचित समझा जिनके रिश्तेदार अंदर फंसे हुए थे.

बाद में भी लोगों ने उन्हीं पत्रकारों से बात की जिन्हें या तो वो जानते थे या फिर जिनके बारे में उन्हें लगा कि वो उनकी दिक्कतों को समझ पाएंगे.

नरीमन हाउस और ऑबराय होटल में अहम कार्रवाई के समय जब मीडिया को लाइव कवरेज से रोक दिया गया तो टेलीविज़न के अनुभवी संपादक तक शिकायत करते देखे गए कि उनको रोका जा रहा है.

मुंबई जैसी घटनाएं केवल पुलिस या प्रशासन के लिए सबक नहीं है बल्कि मीडिया के लिए भी सबक हैं कि उन्हें ऐसे मौकों पर हर व्यक्ति की प्राइवेसी का सम्मान करने की कोशिश करनी चाहिए वरना उन्हें शायद ही ख़बर मिल पाएगी.

मुंबई में आतंकी हमलेः हर पल की खबर

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