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'भारतीय राजनीति का चेहरा बदल दिया'

By प्रभाष जोशी
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वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री रहते हुए मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू की थीं.
वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर भारतीय राजनीति का चेहरा बदल दिया. ऐसा काम इंदिरा गांधी के अलावा किसी और नेता ने नहीं किया.

उन्हें हम दूसरा सबसे बड़ा निर्णायक या प्रभावशाली प्रधानमंत्री कह सकते हैं.

मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर उन्होंने भारतीय राजनीति का चेहरा सदा-सदा के लिए बदल दिया. इस तरह का काम किसी और राजनीतिज्ञ ने नहीं किया था सिवाय इंदिरा गांधी के जिन्होंने 1970 में समाजवाद के नाम पर व्यक्तिगत सत्ता की जो परंपरा कायम की. उसी तरह का काम वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू करके किया.

भारतीय राजनीति के परीक्षित

आज जब वे इस दुनिया में नहीं हैं तो मुझे लगता है कि मैंने अपना एक अंतरंग मित्र खो दिया है.

एक दिन शाम को मैं उनके दिल्ली के तीन मूर्ति मार्ग स्थित घर से निकल कर बाहर आ रहा था तो मुझे लगा कि अगर किसी एक प्रधानमंत्री जिससे मेरा निजी और व्यक्तिगत संबंध है तो वह वीपी सिंह से था. वहाँ से लौटकर मैंने अपने अख़बार में रविवार को 'एक और परीक्षित' के नाम से लेख लिखा.

परीक्षित भारत के पौराणिक मिथ के एक ऐसे पात्र हैं. जो जानते थे कि आठवें दिन तक्षक नाम का सांप उन्हें डस लेगा. इस कहानी पर ‘भागवत नाम का एक पूरा ग्रंथ है.

वीपी सिंह अगर विपक्ष के सभी नेताओं और पार्टियों को अपने साथ कर सकें तो वह सिर्फ़ इसलिए कि उनके ऊपर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं था
परीक्षित की तरह के इंसान थे वीपी सिंह. वह जानते थे कि मौत दिन-प्रतिदिन उनके क़रीब आ रही है. उन्होंने डायलिसिस का सबसे बड़ा रिकॉर्ड बनाया. उनकी जिजीविषा इतनी मज़बूत थी कि वे फ़ेल होते गुर्दों और जवाब देती मज्जा से लड़ते हुए भी इतने दिनों तक ज़िंदा रहे.

वह सचमुच एक परीक्षित थे भारतीय मिथक के नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के.

जिस समय वीपी सिंह का भारतीय राजनीति में उदय हुआ वह सबसे निर्णायक समय था. इंदिरा गांधी 1980 में वापस लौटी थीं. उन्हें यह विश्वास हो गया था कि विचार के बल पर देश की सत्ता में नहीं रहा जा सकता है. इसलिए वह विचारधारा की राजनीति छोड़कर सांप्रादायिक राजनीतिक पर उतर आई थीं.

उन्होंने हिंदू-मुसलमान को आगे बढ़ाया, सिख आतंकवाद को बढ़ावा दिया और भारतीय राजनीति का सांप्रदायीकरण किया.

भाजपा को फ़ायदा

इंदिरा गांधी के इस काम का सबसे अधिक फ़ायदा भाजपा को मिला क्योंकि सांप्रदायिक विचारधारा रखने वाली पार्टी थी.

वीपी सिंह ने भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति की काट के रूप में 'मंडल' का प्रयोग किया

उस राजनीति को बदलने के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग का उपयोग किया.

भारत के इतिहास को अगर देखा जाए तो यहाँ संप्रदाय और जाति की लड़ाई अनंत काल से चली आ रही है. कभी संप्रदाय ज़ोर मारता है तो जातियाँ उसे ठीक करती हैं. कभी जातिवाद बहुत बढ़ जाता है तो संप्रदाय उसके विरुद्ध खड़ा होता है.

वीपी सिंह ने जाति की ताक़त को भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति की काट के रूप में प्रयोग किया. 'कमंडल' का काट 'मंडल' से निकला.

वे उस समय विपक्ष के सभी नेताओं और पार्टियों को अगर अपने साथ कर सकें तो सिर्फ़ इसलिए कि उनके ऊपर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं था. वह ऐसा समय था जब राजीव गांधी को देश ने 'मिस्टर क्लीन' के नाम से स्वीकार किया था. जिनका नाम बोफ़ोर्स और एसबीडब्ल्यू मामले में आया था.

राजनीति को संदेश

भ्रष्टाचार ख़त्म करने के मुद्दे पर मोहभंग होने के बाद अगर जनता का राजनीति में कोई विश्वास कायम कर सका था तो वह वीपी सिंह थे. उन्होंने ऐसा 1986 से 1990 तक किया. लेकिन मंडल और कमंडल के झगड़े से देश में इतनी ज़्यादा अस्थिरता क़ायम हुई कि उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा.

वीपी सिंह के उदय के बाद दलित और पिछड़ी जातियाँ अपने आप में एक ताक़त बनीं. इनकी उभार से राजनीति का रंग ऐसा बना कि कोई भी पार्टी पिछड़ी और दलितों का विचार किए बिना अपनी राजनीति नहीं कर सकती
आज देश में पिछड़ी और दलित जातियों का जो गठजोड़ बना है वह भारतीय राजनीति में वीपी सिंह की देन है.

इसके पहले भी ये दोनों ताकतें थीं. जिनका इस्तेमाल इंदिरा गांधी करती थीं. उस समय इनका इस्तेमाल सवर्ण ताक़त के अधीन चलने वाली ताक़त के रूप में होता था.

वीपी सिंह के उदय के बाद दलित और पिछड़ी जातियाँ अपने आप में एक ताक़त बनीं. इनकी उभार से राजनीति का रंग ऐसा बना कि कोई भी पार्टी पिछड़ी और दलितों का विचार किए बिना अपनी राजनीति नहीं कर सकती. मुख्य धारा की पार्टियाँ भी इनके बिना सत्ता में आने का सपना भी नहीं देख सकतीं.

वीपी सिंह का आज की सत्ता के लिए संदेश यह है कि देश में सबसे बड़ी परिवर्तनकारी ताकतें दलित और पिछड़ी जातियाँ हैं. इनको अपने साथ लेकर जो राजनीतिक दल चलेगा वह देश में बड़े से बड़ा परिवर्तन कर सकता है.

(बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद से हुई बातचीत के आधार पर)

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