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पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह का निधन

By Staff
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वीपी सिंह वर्ष 1989 में भारत के प्रधानमंत्री बने थे
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का गुरुवार तड़के निधन हो गया. वे दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भर्ती थे और लंबे अरसे से बीमार चल रहे थे.

वीपी सिंह के निजी स्टाफ़ रहे विनोद सिंह ने बीबीसी को बताया कि उनका निधन गुरुवार सुबह दो बजकर 27 मिनट पर अपोलो अस्पताल में हुआ.

उन्होंने बताया, "उनके लीवर ने पूरी तरह से काम करना बंद कर दिया था. पिछले पाँच-छह दिनों से वो कुछ खा भी नहीं रहे थे." वीपी सिंह का अंतिम संस्कार शुक्रवार को दिल्ली में होगा.

कांग्रेस से अलग होकर विपक्ष की राजनीति में जान फूँकने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह वर्ष 1989 में भारत के प्रधानमंत्री बने. हालाँकि क़रीब एक साल बाद नवंबर 1990 में उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा.

राजनीतिक सफ़र

25 जून 1931 में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में जन्मे वीपी सिंह ने अपना राजनीतिक सफ़र भी इसी शहर से शुरू किया था.

वीपी सिंह जन्म: 25 जून 193

प्रधानमंत्री: 2 दिसंबर 1989-10 नवंबर 1990 निधन: 27 नवंबर 2008

अपनी क्षमता के बल पर जल्द ही उन्होंने कांग्रेस पार्टी में अपनी पैठ बना ली थी. जनता पार्टी के शासनकाल के बाद जब कांग्रेस उत्तर प्रदेश की सत्ता में दोबारा लौटी, तो इंदिरा गांधी ने वीपी सिंह में अपना भरोसा जताया.

वीपी सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया. इंदिरा गांधी की मौत के बाद जब राजीव गांधी भारी बहुमत से सत्ता में आए तो केंद्र की राजनीति में वीपी सिंह का क़द बढ़ा.

राजीव गांधी की कैबिनेट में उन्हें वित्त मंत्री का महत्वपूर्ण पद मिला. लेकिन जल्द ही राजीव गांधी से उनके रिश्ते बिगड़ने लगे और उन्हें अपना वित्त मंत्री का पद गँवाना पड़ा.

राजीव गांधी ने उन्हें रक्षा मंत्री बनाया, तो बोफ़ोर्स मामले पर तनातनी शुरू हो गई. आख़िरकार उन्हें रक्षा मंत्री का पद भी गँवाना पड़ा. नाराज़ वीपी सिंह ने लोकसभा से और फिर कांग्रेस पार्टी से भी त्यागपत्र दे दिया.

विपक्ष की राजनीति

वीपी सिंह ने अरुण नेहरु और आरिफ़ मोहम्मद ख़ान के साथ मिलकर जनमोर्चा का गठन किया. विपक्षी पार्टियों को एक करने की उनकी कोशिश वर्ष 1988 में रंग लाई.

राजीव गांधी से उनके रिश्ते अच्छे नहीं रहे

उसी साल जय प्रकाश नारायण के जन्मदिन 11 अक्तूबर को जनमोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल और कांग्रेस (एस) का विलय हुआ और नई पार्टी जनता दल का गठन हुआ.

वीपी सिंह को जनता दल का अध्यक्ष चुना गया. इतना ही नहीं वीपी सिंह की अगुआई में क्षेत्रीय दलों को एक झंडे के नीचे लाने की कोशिशें हुई और फिर नेशनल फ़्रंट का गठन हुआ.

इस फ्रंट में तेलुगूदेशम, डीएमके और असम गण परिषद जैसी क्षेत्रीय पार्टियाँ शामिल हुई. वर्ष 1989 के चुनाव में नेशनल फ्रंट को अच्छी सफलता मिली लेकिन इतनी नहीं कि वो सरकार बना सके.

नेशनल फ्रंट ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और वामपंथी दलों के सहयोग से सरकार बनाई. बीजेपी और वामपंथी दलों ने इस सरकार को बाहर से समर्थन देने का फ़ैसला किया.

प्रधानमंत्री का कार्यकाल

प्रधानमंत्री के रूप में वीपी सिंह का चयन नाटकीय रहा और एक तरह से यही उनकी सरकार की नाकामी की वजह भी बनी. एक दिसंबर 1989 को पार्टी की बैठक में वीपी सिंह ने देवीलाल को संसदीय दल का नेता चुनने का प्रस्ताव रखा.

आडवाणी की गिरफ़्तारी के बाद बीजेपी ने समर्थन वापस ले लिया

लेकिन देवीलाल ने नेता बनने से इनकार कर दिया और वीपी सिंह के नाम का प्रस्ताव रख दिया. ये बात चंद्रशेखर को नागवार गुज़री और वे बैठक से चले गए. बाद में उन्होंने कैबिनेट में कोई पद लेने से इनकार कर दिया.

प्रधानमंत्री के रूप में वीपी सिंह का क़रीब एक साल का कार्यकाल काफ़ी चुनौतीपूर्ण रहा. तत्कालीन गृह मंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी की रिहाई के बदले चरमपंथियों को छोड़े जाने का मामला सुर्ख़ियों में रहा.

पिछड़े वर्गों को आरक्षण का मामला तो इतना तूल पकड़ा कि भारत में ख़ूब प्रदर्शन हुए. लेकिन बाद में यही आरक्षण का मामला भारतीय राजनीति का एक प्रमुख मुद्दा भी बना.

भारतीय जनता पार्टी की रथ यात्रा वीपी सिंह सरकार के लिए मुश्किल साबित हुआ. बिहार में जनता दल की सरकार के मुख्यमंत्री लालू यादव ने लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ़्तार किया, तो बीजेपी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया और आख़िरकार वीपी सिंह की सरकार गिर गई.

सत्ता से बेदखल होने के बाद वीपी सिंह धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से अलग होने लगे. उनकी बीमारी ने भी इसमें योगदान दिया. हालाँकि वीपी सिंह विपक्ष की राजनीति से जुड़े रहे और गाहे-बगाहे किसानों के मुद्दे पर आंदोलन में भी कूदे लेकिन सक्रिय रूप से वे राजनीति से अलग रहे.

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