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विधायक बनने की दौड़ में ऑटो ड्राईवर

By सुशील झा,
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दिल्ली की पहली महिला ऑटो ड्राईवर सुनीता चौधरी अब विधायक बनना चाहती है
दिल्ली विधानसभा चुनावों में भांति भांति के उम्मीदवारों अपना भाग्य आजमा रहे हैं और उन्हीं में से एक हैं दिल्ली की पहली ऑटो रिक्शा चालक सुनीता चौधरी.

सुनीता दिल्ली की एकमात्र महिला ऑटो ड्राईवर है और अब वो विधायक बनना चाहती हैं. उन्हें पैंथर्स पार्टी से टिकट मिला है और वो बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के दावेदार वीके मल्होत्रा के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ रही हैं.

सुनीता कहती है, ''बीजेपी और कांग्रेस ने बिल्कुल विकास कार्य नहीं किया. इस बार भी जो उम्मीदवार मैदान में हैं वो स्थानीय नहीं हैं. मल्होत्रा दूसरे इलाके में रहते हैं और कांग्रेस के जितेंद्र कुमार भी ग्रेटर कैलाश के रहने वाले नहीं हैं. मै स्थानीय उम्मीदवार हूं और मुझे आम जनता का समर्थन है. ''

वैसे इस ऑटो रिक्शा डॉईवर के जीतने की उम्मीद कम ही दिखती है लेकिन ये ज़रुर है कि चुनाव प्रचार के दौरान लोग उनकी तरफ आकर्षित ज़रुर होते हैं.

असल में दिल्ली के चुनावों में पैंथर्स पार्टी ने ऐसे ही उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है जो वोट न सही तो कम से लोगों को अपनी ओर खींच ज़रुर सकें.

मसलन पार्टी के हर्ष मल्होत्रा ने अपनी ही बीवी से छह बार शादी की है और भगवान शिव की तरह सात बार अपनी ही बीवी से शादी करना चाहते हैं.

इसी तरह पार्टी ने दो ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं जो सबसे युवा पुरुष और महिला उम्मीदवार हैं.

सुनीता से यह पूछे जाने पर कि क्या उनके जीतने की उम्मीद है, वो सकारात्मक जवाब देती हैं, ''कोई नहीं जानता कौन जीतेगा. जनता जिसको चाहेगी वो जीतेगा. मैं तो संघर्ष कर रही हूं जीतने के लिए. आज नहीं तो कल मैं विधानसभा में ज़रुर जाऊंगी. ''

सुनीता को चुनावों में जीत मिले न मिले लेकिन उनके संघर्ष की कहानी किसी महिला को प्रेरित ज़रुर करती है.

ऑटो चलाना और वो भी महिलाओं के लिए एक बिल्कुल ही नए तरह का काम था और उन्हें इसके लिए लाईसेंस भी नहीं मिला था.

वो बताती हैं, ''मैं तीन साल तक दौड़ती रही लाईसेंस के लिए लेकिन कोई मेरे कागज़ों पर हस्ताक्षर नहीं करता था. फिर जब मैंने चेतावनी दी हाईकोर्ट में जाने कि तब कहीं जाकर मुझे कमर्शियल लाईसेंस मिला.''

सुनीता ऑटो चलाकर खुश हैं और कहती हैं कि उनके साथ सफ़र के दौरान महिला और पुरुष सवारियां सवाल बहुत करते हैं.

वो बताती हैं, ''पहले तो लोग मुझे ध्यान से देखते हैं, थोड़ा आश्चर्यचकित होते हैं फिर पूछने लगते हैं क्यों ये काम करती हो. कैसे करती हो और इसी बातचीत में रास्ता कट जाता है. ''

सुनीत क़रीब सौ महिलाओं को ऑटो चलाने की ट्रेनिंग भी दे रही हैं और उन्हें उम्मीद है कि आने वाले दिनों में दिल्ली की सड़कों पर कई और महिला ऑटो ड्राईवर भी होंगी.

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