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चुनाव देता है नेताओं को मानसिक तनाव

By नारायण बारेठ
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पार्टी के दफ़्तर के बाहर टिकट पाने वालों का लंबी लाइन लगी होती है
प्रेम प्रसंग और व्यापर मे नुक़सान जैसे मामलों में तनाव पैदा होने पर तो लोग मनोचिकित्सों के पास जाते रहते हैं. लेकिन अब चुनाव भी मानसिक तनाव का कारण बन कर उभरा है.

जयपुर में सवाई मान सिंह मेडिकल कॉलेज अस्पताल के मनो-चिकित्सकों ने इस पर अध्ययन कर बताया है कि चुनावी प्रक्रिया में लगे लोगों को कई बार मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है.

डॉक्टर कहते हैं कि जितना छोटा चुनाव, तनाव उतना ही बड़ा. टिकट पाने से निराश कई बार लोग अवसाद का शिकार हो जाते हैं और डॉक्टरों से मदद लेते है.

सवाई मान सिंह मेडिकल कॉलेज में मनोचिकित्सा विभाग के अध्यक्ष डॉ शिव गौतम ने बीबीसी को बताया, "इस अध्ययन में पता लगा कि न केवल उम्मीदवार और टिकट के आवेदक, बल्कि उनके परिजन, रिश्तेदार, समर्थक और चुनाव कराने वाले कर्मचारी भी इस तनाव के शिकार होते हैं."

डॉ गौतम ने इस शोध में पाया कि चुनाव में अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने और चुनाव के दौरान अत्यधिक काम करने वाले लोग अक्सर कम सो पाते हैं और नशे का सहारा भी लेते हैं, इससे तनाव और अवसाद पैदा होता है.

तरीक़े

मनोचिकित्सक ऐसे लोगो को अब तनाव से बचने के तरीक़े भी बता रहे हैं. डॉ गौतम कहते है, "मादक पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए और कम से कम छह घंटे की नींद ज़रूर लेनी चाहिए."

जयपुर के किशन शर्मा छोटू भारत की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस के सदस्य है. टिकट के लिए बहुतेरे प्रयास किए मगर ख़ाली हाथ लौटना पड़ा.

किशन शर्मा कहते हैं, "जब हम अपने समर्थकों के साथ कई-कई दिन नेताओं के चक्कर काटते हैं तो भावनात्मक तौर पर जुड़ जाते हैं. जब टिकट नहीं मिलता है तो निराशा होती है. मेरे साथ यही हुआ और मुझे डॉक्टरों के पास जाना पड़ा और दवा लेनी पड़ी."

अतर सिंह गुर्जर ख़ुद भारतीय जनता पार्टी के सदस्य है. वे कहते हैं, "टिकट हासिल करने की पूरी प्रक्रिया ही तनाव भरी है. इस स्थिति में अच्छे नेता की हालत भिखारी जैसी हो जाती है और उसे तनाव दूर करने के लिए इधर-उधर जाना पड़ता है."

बाड़मेर के पोकरराम को ख़ुद के लिए टिकट नही चाहिए. पर वे अपने साथियों के संग जयपुर आए और विधायक तगाराम के लिए गुहार करते मिले. कहने लगे हमें तनाव हो रहा है हमारे नेता को टिकट नही मिलने से. मैं क्या हम सभी को ही तनाव हो रहा है.

सहारा

भारत मे चुनाव के दौरान अब कार्यकर्ता तार्किक बहस या बौद्धिक संबोधनों की बजाय उत्तेजक नारों का सहारा लेते देखे गए हैं.

जब हम अपने समर्थकों के साथ कई-कई दिन नेताओं के चक्कर काटते हैं तो भावनात्मक तौर पर जुड़ जाते हैं. जब टिकट नहीं मिलता है तो निराशा होती है. मेरे साथ यही हुआ और मुझे डॉक्टरों के पास जाना पड़ा और दवा लेनी पड़ी
डॉ गौतम कहते हैं, "ये देखा गया है कि पंचायत जैसे छोटे चुनावों में लोगों में तनाव ज़्यादा होता है. क्योंकि वहाँ लोग बहुत से व्यक्तिगत मुद्दों को बीच में लाते हैं और दुश्मनी भी निकलते हैं."

विधानसभा चुनावों मे उससे कम तनाव और लोकसभा चुनावो में और भी कम तनाव होता है. यूँ तो सिसायत कभी जातीय और कभी संप्रदायिक तनाव से अपनी राजनैतिक पूंजी जमा करती देखी गई है. पर अब सियासत मे लगे लोग ख़ुद भी इसका शिकार होने लगे है.

और ये सब इसलिए होता है कि हर उम्मीदवार जनसेवा करना चाहता है. जनसेवा का संकल्प गाँधी को दीन दुखियारों तक ले गया और वे मोहनदास से साबरमती के संत बन गए. पर ये नए भारत की सियासत है. इसमें नेता जन सेवा के लिए तनाव झेलने को भी तैयार है.

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