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'बर्मा को अध्यक्ष बनाना ग़लत'

By रेणु अगाल,
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आसियान के देशों ने बर्मा की सैनिक सरकार को मान्यता नहीं दी है
'बिमस्टेक' ने बर्मा को अपना अगला अध्यक्ष बनाया है. एशियन सेंटर फ़ॉर ह्यूमन राइट्स के निदेशक सुहास चकमा इसे ग़लत फ़ैसला मानते हैं.

एशियन सेंटर फ़ॉर ह्यूमन राइट्स के निदेशक सुहास चकमा इस फ़ैसले को ग़लत बताते हैं.

उनका कहना है कि बर्मा इससे पहले दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के संगठन यानी 'आसियान' का सदस्य था. लेकिन आसियान के देशों ने आज तक बर्मा की अध्यक्षता स्वीकर नहीं की.

उनका मानना था कि बर्मा की सैनिक सरकार ने आजतक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है जिससे वहाँ मेल-मिलाप हो सके, आंग सान सू ची और अन्य राजनैतिक कैदियों की रिहाई हो सके.

ग़लत संदेश

'आसियान' एशियाई देशों का सबसे मज़बूत संगठन है लेकिन उसने बर्मा की सैनिक सरकार को मान्यता नहीं दी है. ऐसे समय में अगर भारत और दक्षिण एशिया के अन्य देश बर्मा की सैनिक सरकार को मान्यता देते हैं तो इससे ग़लत संदेश जाएगा.

दक्षिण एशिया में भारत एक प्रमुख देश है लेकिन वह अपनी आलोचना नहीं सुनना चाहता है. लेकिन ऐसा आसियान के देशों में नहीं है.

आसियान के ऐसे देश जिनका बर्मा के साथ व्यापारिक और सामरिक संपर्क हैं. अगर वे बर्मा का मुद्दा उठा सकते हैं तो भारत क्यों नहीं?

अगर भारत सरकार घरेलू दबाव में आकर श्रीलंका की सरकार से यह कह सकती है कि वह लिट्टे से बात करे, जो कि भारत में एक आतंकवादी संगࢠन के रूप में दर्ज है. ऐसे में वह बर्मा में शांतिपूर्वक और लोकतांत्रिक रूप से चल रहे आंदोलन की बात क्यों नहीं उࢠा सकती है
आज सबसे बड़ा बात यह है कि भारत यह नहीं देख रहा है कि उसके पड़ोस में क्या हो रहा है.

पिछले डेढ़ साल में भारत के पड़ोस में तीन बड़ी घटनाएँ हुई हैं. नेपाल में दो सौ साल पुरानी राजशाही को हटाकर एक गुरिल्ला नेता वहाँ के प्रधानमंत्री बने हैं. वहीं पाकिस्तान में सैनिक तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ़ को सत्ता से हटा दिया गया है और मालदीव में हुए आम चुनाव के बाद वहाँ तीस साल से सत्ता पर काबिज़ अब्दुल गयूम को सत्ता से हटा दिया गया है.

भारत की लाचारी

भारत सरकार ने इन तीनों ही जगहों के शासकों को समर्थन दिया था.

आज सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि अगर भारत सरकार घरेलू दबाव में आकर श्रीलंका की सरकार से यह कह सकती है कि वह लिट्टे से बात करे, जो कि भारत में एक आतंकवादी संगठन के रूप में दर्ज है. ऐसे में आप बर्मा में शांतिपूर्वक और लोकतांत्रिक रूप से चल रहे आंदोलन की बात क्यों नहीं उठा सकते हैं.

ऐसा लगता है कि भारत का विदेश मंत्रालय यह समझ ही नहीं पाता है कि उसके पड़ोसी देशों में क्या हो रहा है. पड़ोसी देशों में जब भी सरकार बदलती है तो वह उसके पीछे हो लेता है. विदेश मंत्रालय को लगता है कि कहीं उसके पड़ोसी देश किसी दूसरे देश के साथ न चलें जाएँ.

जब तक आप अपने पड़ोसी देश की घटनाओं का मूल्यांकन कर वहाँ के लोगों का समर्थन नहीं करते हैं तो ऐसी स्थिति हमेशा आती रहेगी.

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