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ओबामाः कहीं इतिहास तो कहीं सपना

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अमरीकी चुनाव में पहली बार किसी अश्वेत को राष्ट्रपति चुने जाने को भारत के हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों ही अख़बारों ने या तो इतिहास से जोड़ा है या फिर सपने से.

'सपना' कहने से वो सपना जो मार्टिन लूथर किंग ने 45 साल पहले देखा था कि अमरीका में किसी अश्वेत को उसकी चमड़ी के रंग से नहीं बल्कि उसके गुणों से पहचाना जाएगा.

और 'इतिहास' कहने से यह कि अमरीकी इतिहास में पहली बार कोई अश्वेत को राष्ट्रपति बनकर व्हाइट हाउस में प्रवेश करेगा. वैसे कुछ अख़बारों ने इसे परिवर्तन से भी जोड़कर देखा है.

अख़बारों ने ओबामा की बड़ी तस्वीरें प्रकाशित की हैं. कुछ ने उनके पूरे परिवार की तस्वीर छापी है तो कुछ ने वह तस्वीर प्रकाशित की है जिसमें ओबामा अपनी पत्नी मिशेल का चुंबन ले रहे हैं.

अख़बारों ने बहुत कल्पनाशीलता के साथ शीर्षक लगाए हैं. कुछ अख़बारों ने पहले पृष्ठ पर विशेष संपादकीय भी लिखी है. लेकिन ज़्यादातर अख़बारों ने यह विश्लेषण करने की कोशिश ज़रुर की है कि ओबामा की जीत का भारत के लिए क्या मतलब है.

आकर्षक शीर्षक

'नवभारत टाइम्स' ने ओबामा के प्रशंसकों की बड़ी तस्वीर प्रकाशित करते हुए उस पर सिर्फ़ 'ओबामा' लिखा है. ओबामा के परिवार की तस्वीर दूसरे कोने पर है और उस पर एक छोटा शीर्षक है 'दुनिया पर चला उम्मीद का मैजिक'.

'दैनिक जागरण' ने 'परिवर्तन' को महत्व देते हुए इसे बड़ा शीर्षक बनाते हुए लिखा है, 'व्हाइट हाउस पहुँचे ब्लैक ओबामा'. 'अमर उजाला' ने भी इससे मिलता जुलता शीर्षक लगाया है, 'व्हाइट हाउस में मि. ब्लैक'. 'जनसत्ता' कहता है, 'व्हाइट हाउस की चौखट पर काले ओबामा'

'राष्ट्रीय सहारा' ने शीर्षक लगाया है, 'ओबामा ने बदला युग' तो 'हिंदुस्तान' ने मार्टिन लूथर किंग और ओबामा की तस्वीर प्रकाशित करते हुए शीर्षक दिया है, 'बदल गया है अमरीका'

अंग्रेज़ी के अख़बारों में देखें तो 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' ने लिखा है कि दौड़ एक ऐतिहासिक जीत में ख़त्म हुई.

'इंडियन एक्सप्रेस' ने आधे पेज में ओबामा की अभिवादन स्वीकार करती हुई तस्वीर प्रकाशित की है और शीर्षक लगाया है, 'अमेरिकन ड्रीम'. ऐसा ही शीर्षक 'स्टेट्समैन' ने भी लगाई है और लिखा है कि जब दुनिया ने आँखें मलीं तो देखा कि सपना सच हो गया था. 'स्टेट्समैन' ने ओबामा से बड़ी तस्वीर मार्टिन लूथर किंग की लगाई है.

'हिंदू' ने बराक ओबामा और उपराष्ट्रपति पद के लिए जीते जो बाइडन की तस्वीरें प्रकाशित की हैं जिसमें वे अपनी पत्नियों के साथ अपने समर्थकों का अभिवादन स्वीकार कर रहे हैं. अख़बार ने शीर्षक लगाया है, 'अमरीका ने इतिहास बनाया'

'इकॉनॉमिक टाइम्स' ने थोड़ा और कल्पनाशील होते हुए लिखा है, 'नो रेड, नो ब्लू. ओनली ब्लैक'. तो 'हिंदुस्तान टाइम्स' ने बराक ओबामा के उस बयान को ही शीर्षक बना दिया है जिसमें उन्होंने कहा है, "अमरीका में परिवर्तन आ गया है"

विशेष संपादकीय

'हिंदुस्तान' और 'पंजाब केसरी' ने ओबामा की जीत पर विशेष संपादकीय प्रकाशित की है तो 'जनसत्ता' ने इस पर विशेष टिप्पणी छापी है.

अमरीकी चुनावों ने यही सिद्ध किया है कि लोकतंत्र को मज़बूत रखने की पहली ज़िम्मेदारी राजनीतिक दलों पर ही होती है

'हिंदुस्तान' की प्रमुख संपादक मृणाल पांडे ने अपने हस्ताक्षर से लिखे संपादकीय में लिखा है, "अब्राहम लिंकन और मार्टिन लूथर किंग ने जिस मिश्रित न्यायपूर्ण और संघीय लोकतंत्र का सपना देखा था, विश्वपटल पर उसकी ठोस शुरुआत 2008 में एक सैंतालिस वर्षीय बराक हुसेन ओबामा जैसे नाम वाले अश्वेत राष्ट्रपति की धमाकेदार जीत के साथ हो गई है."

इस विशेष संपादकीय में अख़बार ने सुझाव दिया है कि इस नई शुरुआत का अभिनंदन किया जाना चाहिए. उधर 'पंजाब केसरी' में मुख्य संपादक अश्विनी कुमार ने विशेष संपादकीय में कहा है, "भारत में जाति और वर्ण के वोट बैंक के सहारे दलित नेतृत्व की क्षमता का आभास कराया जा रहा है वहीं अमरीका की महान जनता ने इन बंधनों को तोड़कर केवल और केवल योग्यता के आधार पर एक अश्वेत व्यक्ति को अपना सच्चा प्रतिनिधि होने का प्रमाण दिया है."

उन्होंने लिखा है, "अमरीकी चुनावों ने यही सिद्ध किया है कि लोकतंत्र को मज़बूत रखने की पहली ज़िम्मेदारी राजनीतिक दलों पर ही होती है." जनसत्ता में टिप्पणी लिखते हुए प्रदीप श्रीवास्तव ने लिखा है, "सच पूछा जाए तो ओबामा की जीत को अमरीका में 21 वीं सदी की शुरुआत मान सकते हैं."

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