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प्रणव तीन दिनों की ईरान यात्रा पर

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भारत पर आरोप लगता रहा है कि वह अमरीकी दबाव में परियोजना में देरी कर रहा है
भारतीय विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी शुक्रवार को तीन दिनों की ईरान यात्रा पर रवाना हो रहे हैं. वे ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन की बाधाओं पर चर्चा करेंगे
और इसे दूर करने का प्रयास करेंगे.

संभावना है कि इसके अलावा वे दोनों देशों के बीच व्यापार और व्यवसाय संबंधी द्विपक्षीय मुद्दों पर भी चर्चा करेंगे.उल्लेखनीय है कि गैस पाइपलाइन पर अगस्त 2007 के बाद से गतिरोध बना हुआ है और आगे बातचीत के आश्वासनों के बावजूद इसमें कोई प्रगति नहीं हो पाई है.

गतिरोध

अधिकारियों के अनुसार प्रणव मुखर्जी संयुक्त आयोग के ढाँचे के अंतर्गत ईरान के विदेश मंत्री मनुचेहर मोत्तकी से चर्चा करेंगे.संभावना है कि वे ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद अहमदीनेजाद से भी बातचीत करेंगे.

इस बातचीत में दोनों पक्षों के बीच गैसपाइप लाइन परियोजना को आगे बढ़ाने पर चर्चा होने की उम्मीद है.अहमदीनेजाद के आश्वासनों के बावजूद बातचीत आगे नहीं बढ़ी

लगभग साढ़े सात अरब डॉलर यानी साढ़े तीन सौ अरब रुपयों की इस परियोजना में गैस की लागत और सुरक्षा को लेकर मतभेद हैं. पाकिस्तान अपनी ज़मीन से पाइपलाइन गुज़रने देने के लिए ट्रांज़िट फ़ीस की मांग कर रहा है.

अप्रैल महीने में अपनी दिल्ली यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से हुई चर्चा के बाद ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने कहा था कि गैस पाइपलाइन पर 45 दिनों के भीतर सहमति बना ली जाएगी लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी.

इसके बाद जून में ईरानी तेल मंत्री ग़ुलाम हुसैन नज़ारी से बातचीत के बाद भारतीय तेल मंत्री मुरली देवड़ा ने कहा था कि समझौता जल्दी हो जाएगा लेकिन कोई प्रगति नज़र नहीं आई.

अक्तूबर के पहले हफ़्ते में ईरान के अधिकारियों ने संकेत दिए थे कि यदि भारत इस परियोजना के लिए आगे नहीं आता है तो ईरान पाकिस्तान के साथ ही काम शुरु कर देगा.

ईरान का कहना है कि अब गेंद भारत के पाले में है और जो फ़ैसला करना है वह भारत को ही करना है.ईरान का मानना है कि भारत पाइपलाइन पर इसलिए भी देर कर रहा था कि उसे डर था कि इसकी वजह से भारत-अमरीका असैन्य परमाणु समझौते पर असर पड़ सकता है.

परियोजना

भारत पेट्रोलियम पदार्थों का एशिया में तीसरा बड़ा उपभोक्ता है और वह ईरान से गैस ख़रीदने की परियोजना पर पिछले एक दशक से बातचीत कर रहा है.
देरी की वजह से परियोजना की लागत बढ़ती जा रही है

प्राकृतिक गैसों के भंडार के मामले में दुनिया के दूसरे सबसे संपन्न देश ईरान ने वर्ष 1995 में ही भारत को गैस बेचने पर सहमति जताई थी. तीनों देशों के संयुक्त कार्यदल की अब तक कई बैठकें हो चुकी हैं लेकिन कोई अंतिम फ़ैसला नहीं हुआ है. ईरान की योजना है कि 2011 तक पाकिस्तान को गैस की आपूर्ति शुरू कर दी जाए.

पाइपलाइन पर 1995 में बनी सहमति के बाद से गैस की क़ीमतें कई गुना बढ़ चुकी हैं और इसकी क़ीमत पर पेंच फंसा हुआ है.भारत 27 हज़ार किलोमीटर लंबी इस पाइपलाइन के पाकिस्तान वाले हिस्से की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताता रहा है. उसे पाकिस्तान को ट्रांज़िट फ़ीस देने में भी आपत्ति है.

इस तरह की ख़बरें आती रही हैं कि अमरीकी दबाव के कारण ईरान के साथ गैस परियोजना में देरी हो रही है. हालांकि भारत इससे इनकार करता आया है.
ऐसे ख़बरें भी आईं थीं कि इस परियोजना से भारत के बाहर निकलने पर ईरान उसकी जगह पर चीन को शामिल कर सकता है.

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