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जीने का अधिकार कितना सुरक्षित?

By महबूब ख़ान
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ऐसे आरोप लगते हैं कि पुलिस अक्सर नागरिक अधिकारों की परवाह नहीं करती.
भारत में यह चर्चा जब-तब गर्म रहती है कि सरकारी व्यवस्था और संस्थाओं के मुक़ाबले व्यक्ति के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार कितने सुरक्षित हैं. ख़ासतौर से जीवन का अधिकार कितना सुरक्षित है?

अब्राहम लिंकन के इस बयान का मतलब यही निकलता है कि कोई भी देश या सरकार अपनी सत्ता लोगों से ही हासिल करती है लेकिन अगर इतिहास पर नज़र डालें तो यही नागरिक घाटे में नज़र आता है और उसने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए उसी से हासिल की हुई सत्ता के आधार पर सरकार या देश के सामने गुहार लगानी पड़ती है और उसके रहमो करम पर रहना पड़ता है.

भारतीय संविधान में नागरिकों के अधिकारों का विस्तार से वर्णन है लेकिन आम जीवन में देखें तो ऐसा ही लगता है कि व्यक्ति के अधिकारों का अक्सर उल्लंघन होता है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में व्यक्ति को जीवन के अधिकार की गारंटी दी गई है जिसका मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को क़ानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के बिना जीवन या उसकी निजी स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा. अनुच्छेद 22 में गारंटी है कि अगर किसी व्यक्ति को किसी भी आरोप में गिरफ़्तार किया जाता है तो उसे तुरंत गिरफ़्तारी की वजह बताई जाएगी और उसे अपनी पसंद के क़ानूनी वकील से राय मश्विरा करने और वकील की मदद लेने से नहीं रोका जाएगा. इसका मतलब है कि भारत में हर व्यक्ति के जीने के अधिकार की गारंटी न्यायालय द्वारा सुरक्षित है यानी जब तक कोई न्यायालय किसी व्यक्ति को किसी क़ानून के तहत दोषी या अपराधी क़रार नहीं दे देता तब तक उसे अपराधी या आतंकवादी कहकर नहीं पुकारा जा सकता.

लेकिन अक्सर मामलों में आरोप लगते हैं कि पुलिस नागरिकों के इन अधिकारों की परवाह नहीं करती.

मुठभेड़ का सच

जैसाकि संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ और मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले बुज़ुर्ग वकील शांति भूषण कहते हैं, "जब पुलिस किसी मुठभेड़ में यह कहते हुए कुछ लोगों को मार देती है कि मारे गए लोग शातिर अपराधी या आतंकवादी थे तो बहुत से मामलों में यह जानकारी सामने आई है कि पुलिस ने कथित मुठभेड़ में कई निर्दोष लोगों को मार दिया और मारे गए लोग भी अपराधी या आतंकवादी नहीं थे. चूँकि पूरे देश में पुलिस विभाग में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार व्याप्त है इसलिए पुलिस की बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि जो लोग मारे गए वे सचमुच अपराधी या आतंकवादी थे और वाक़ई कोई मुठभेड़ हुई है."

क़ानूनी जानकारों के अनुसार इस तरह से मुठभेड़ में किसी का भी मारा जाना उस व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है क्योंकि अगर कोई अपराधी भी है तो भी पुलिस को उसे जान से मारने का अधिकार नहीं मिल जाता क्योंकि उसके लिए तो न्याय व्यवस्था है जो किसी के अपराध के अनुसार उसकी सज़ा का निर्धारण करती है. शांति भूषण कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का एक बाध्यकारी निर्णय है कि अगर पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार करती है तो तुरंत उसके परिजनों या निकट संबंधियों को इसकी सूचना दी जाएगी और यह भी बताया जाएगा कि गिरफ़्तार व्यक्ति को कहाँ रखा गया है लेकिन पुलिस अक्सर अपनी यह ड्यूटी पूरी नहीं करती है और गिरफ़्तार लोगों को इस अधिकार की रक्षा के लिए फिर से न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता है. शांति भूषण के अनुसार यह दरअसल एक तरह से सुप्रीम कोर्ट की अवमानना है.

तो फिर पुलिस ऐसा क्यों करती है. पुलिस तो वर्दी पहनते समय संविधान और देश के क़ानून की रक्षा करने की शपथ लेती है. पुलिस की बात पर भरोसा क्यों नहीं किया जाता है. पुलिस पर भी तो दबाव होते हैं और अनेक मामलों में ऐसी भी जानकारी सामने आती है कि पुलिस पर भी हमला होता है. पुलिस को आत्मरक्षा में हथियारों का इस्तेमाल करने की इजाज़त है तो फिर किसी मुठभेड़ पर सवाल क्यों उठाए जाते हैं.

नकारात्मक छवि?

भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के पूर्व अधिकारी और पुलिस सुधारों पर काम कर रहे के एस ढिल्लों कहते हैं कि पुलिस की इस नकारात्मक छवि के कुछ ऐतिहासिक कारण हैं, "आम आदमी को इतिहास ये बताता है कि पुलिस जब कुछ कहती है तो वो ठीक नहीं होता है. पुलिस के लिए आम लोगों का यह अविश्वास आज का नहीं, बल्कि सौ-दो सौ साल पुराना है क्योंकि भारतीय पुलिस कभी भी नागरिक पुलिस नहीं रही है यह हमेशा से ही शासक वर्ग की पुलिस रही है, चाहे वो अंग्रेज़ों का ज़माना हो या अन्य राजा-महाराजाओं का, भारतीय पुलिस ने हमेशा से ही शासक वर्ग के हितों की रक्षा के लिए काम किया है. भारतीय पुलिस ने शासक वर्ग को संरक्षण देना हमेशा ही अपनी ड्यूटी माना है और 1861 के पुलिस क़ानून में भी यही व्यवस्था है."

"भारत में पुलिस में कभी भी आम नागरिक के लिए कोई सहानुभूति नहीं रही है. यही वजह है कि भारत में आम आदमी पुलिस को हमेशा ही शक की नज़र से देखता है. ख़ासतौर से बहुत से ऐसे मामले होते हैं जिनमें पुलिस मुठभेड़ के लिए पुलिस का पक्ष अदालत में ग़लत साबित होता है तो आम आदमी पुलिस की बात पर भरोसा ही नहीं करता."

ऐसे हालात में ये चर्चा प्रासंगिक हो जाती है कि क्या सरकार लोगों के अधिकारों की हिफ़ाज़त के लिए समुचित कार्रवाई करती है, जब पुलिस, सुरक्षा बल या गुप्तचर एजेंसियाँ क़ानून को धता बताकर नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं तो क्या इससे देश की न्याय व्यवस्था की अहमियत कम नहीं होती है.

जाँच पर सवाल क्यों?

दिल्ली के जामिया नगर में सितंबर में हुई कथित पुलिस मुठभेड़ ने इस चर्चा को फिर से जीवित कर दिया है. हालाँकि दिल्ली पुलिस बार-बार कह चुकी है कि जाँच हो रही है और जल्दी ही दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.

दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत कहते हैं कि जाँच प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है और पूरी जानकारी अदालत के सामने रख दी जाएगी जिस पर क़ानून के तहत कार्रवाई होगी.

मगर पुलिस मुठभेड़ों पर आमतौर पर सवाल उठते ही रहे हैं. दबी ज़ुबान में लोगों को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि पुलिस ऐसी मुठभेड़ों का सहारा लेकर कथित अराधियों का भी सफ़ाया करती है. लेकिन यहीं सवाल ये भी है कि अगर कोई व्यक्ति आपराधिक पृष्ठभूमि का है भी तो भी क्या पुलिस को सिर्फ़ इतने भर से उसे जान से मार देने का अधिकार मिल जाता है? तो फिर क़ानून और अदालतें किसलिए हैं? इतना ही नहीं, मुठभेड़ करने वाले पुलिस अधिकारियों को मुठभेड़ विशेषज्ञ के तौर पर पेश किया जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह चलन बहुत ग़लत है क्योंकि अगर पुलिस को इसकी छूट दे दी जाए तो इसका शिकार कोई भी नागरिक हो सकता है.

शांति भूषण कहते हैं, "भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने एक निर्देश दिया हुआ है कि जब भी कोई मुठभेड़ हो और पुलिस के हाथों किसी व्यक्ति की मौत होती है तो उसमें किसी जज द्वारा उस मामले की जाँच किया जाना बहुत ज़रूरी है ताकि वास्तविकता सामना आ सके. उस जाँच की रिपोर्ट मानवाधिकार आयोग को भेजना भी अनिवार्य है."

शांति भूषण कहते हैं कि जामिया नगर में हुई कथित पुलिस मुठभेड़ में पुलिस ने दो लोगों को यह कहते हुए मार दिया है कि वे आतंकवादी थे और पुलिस पर उन्होंने पहले गोलियाँ चलाईं, तो इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का निर्देश लागू होता है कि मामले की FIR दर्ज कराकर उसकी न्यायिक जाँच कराई जाए. क्योंकि पुलिस मीडिया के ज़रिए अपना पक्ष तो जनता के सामने रख देती है चाहे वो सच हो या झूठ मगर जो लोग मारे या पकड़े जाते हैं, अक्सर उनका पक्ष बहुत देर से मीडिया में सामने आता है, या कभी-कभी आता ही नहीं है.

हिरासत में?

क़ानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पुलिस अक्सर किसी को गिरफ़्तार करने के बाद उस पर दबाव डालकर या धमकियाँ देकर कोई बयान दिलवा लेती है और फिर मीडिया के सामने पेश कर देती है कि ये व्यक्ति तो ख़ुद ही स्वीकार कर रहे हैं कि वे अपराधी या आतंकवादी हैं तो पुलिस पर शक क्यों किया जा रहा है, जबकि पुलिस हिरासत में दिए गए किसी बयान का अदालत में कोई महत्व नहीं होता है, मगर तब तक पुलिस मीडिया के ज़रिए अपना झूठ लोगों तक पहुँचाने में कामयाब हो जाती है.

गुजरात में सोहराबुद्दीन शेख़ मुठभेड़ की जाँच हुई तो चौंका देने वाली जानकारी सामने आई और तीन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को जेल हुई. दिल्ली के कनाट प्लेस इलाक़े में 1997 में एक कथित पुलिस एनकाउंटर में मारे गए दो उद्योगपतियों प्रदीप गोयल और जगजीत सिंह का मामला सबसे ज्वलंत उदाहरण है जिसमें भी कुछ पुलिस कर्मियों को न्यायालय ने दोषी क़रार दिया है. हर मुठभेड़ में पुलिस की यही कहानी सामने आती है कि कथित अपराधियों या आतंकवादियों ने ही पहले पुलिस पर गोली चलाई और जवाब में गोलीबारी हुई जिसमें वे कथित अपराधी या आतंकवादी मारे गए.

के एस ढिल्लों कहते हैं, "हमारे देश की व्यवस्था के अनुसार पुलिस क़ानून अपने हाथ में नहीं ले सकती. सीआरपीसी में व्यवस्था है कि पुलिस को आत्मरक्षा में हथियार चलाने की इजाज़त है मगर उसके लिए वास्तविकता का सामने आना भी ज़रूरी है. क़ानून यह नहीं है कि पुलिस जिसको अपराधी या आतंकवादी समझ ले और उसे जान से मार दे. कोई भी व्यक्ति अपराधी या आतंकवादी तब कहलाया जाता है जब किसी क़ानूनी अदालत में यह साबित हो जाए. हाल के वर्षों में कितनी बार भारतीय पुलिस ने दावे किए हैं कि विभिन्न बम धमाकों के मास्टरमाइंड पकड़ लिए गए हैं, मगर किसी अदालत में तो अभी कुछ भी साबित नहीं हुआ है. आम लोगों का अनुभव तो ये है कि पुलिस अक्सर मामलों में पहले किसी को जान से मार देती है और उसके पास हथियार वग़ैरा रख देती है और दावा कर देती है कि उन्होंने किसी बड़े अपराधी या आतंकवादी को मार दिया है. इसलिए आम लोग अक्सर पुलिस की बात पर भरोसा नहीं करते हैं."

आप अपनी राय इस ईमेल पर भी भेज सकते हैं --Hindi.Letters@bbc.co.uk

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