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उम्मीद के उजाले के सहारे जी रहा है धनेश्वर !

By Staff
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वाराणसी, 26 अक्टूबर (आईएएनएस)। यह कतई जरूरी नहीं है कि त्योहार हर किसी के लिए खुशी का पर्याय हो। कुछ ऐसा ही है वाराणसी के रोहनिया क्षेत्र के रहने वाले धनेश्वर के साथ। पांच साल का यह बच्चा एपालस्टिक एनीमिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा है। इस रोग के पीड़ितों के शरीर में खून बनाने की क्षमता नहीं होती। उसके टू-व्हीलर मैकेनिक पिता बोन मैरो ट्रांसप्लांट पर आने वाले सात-आठ लाख रुपये का खर्च उठाने में असमर्थ हैं।

वाराणसी, 26 अक्टूबर (आईएएनएस)। यह कतई जरूरी नहीं है कि त्योहार हर किसी के लिए खुशी का पर्याय हो। कुछ ऐसा ही है वाराणसी के रोहनिया क्षेत्र के रहने वाले धनेश्वर के साथ। पांच साल का यह बच्चा एपालस्टिक एनीमिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा है। इस रोग के पीड़ितों के शरीर में खून बनाने की क्षमता नहीं होती। उसके टू-व्हीलर मैकेनिक पिता बोन मैरो ट्रांसप्लांट पर आने वाले सात-आठ लाख रुपये का खर्च उठाने में असमर्थ हैं।

भले ही इस घर में दीवाली मनाने के लिए पैसे न हों लेकिन उम्मीद का उजाला जरूर है। एक ऐसा उजाला जो इस परिवार में जीने की ललक को जिंदा रखे हुए है। अपनी गरीबी पर अफसोस करते हुए भी धनेश्वर का पिता विष्णु निराश नहीं होता है। वह कहता है, क्या हुआ अगर हमारे पास पैसा नहीं है। हम हार नहीं मानेंगे। जब तक धनेश्वर का इस तरह इलाज करा सकते हैं, कराएंगे और हम पैसे इकठ्ठा करके एक दिन उसका बोन मैरो ट्रांसप्लांट भी कराएंगे।

वाराणसी-इलाहाबाद रोड के किनारे अपनी छोटी सी दुकान में बैठा विष्णु दीवाली पर न तो अपने घर में कोई नया सामान खरीदने के लिए परेशान है और न ही बच्चों के लिए पटाखे को लेकर। वह परेशान है तो अपने तीन बच्चों में सबसे बड़े धनेश्वर को खून चढ़वाने के लिए पैसे के इंतजाम में। यह परेशानी विष्णु के कोई नयी नहीं है।

दरअसल धनेश्वर के शरीर में खून का निर्माण ही नहीं होता है ऐसे में लगभग हर तीस दिनों के बाद उसके शरीर में खून की कमी होने लगती है। पूरा शरीर फूलने लगता है। लिहाजा उसे बाहर से खून चढ़वाना पड़ता है। बाहर से खून चढ़वाने में हर बार लगभग ढाई से तीन हजार रुपये का खर्च आता है।

खराब गाड़ियों की मरम्मत करके अपना घर चलाने वाले विष्णु के लिए यह रकम जुटा पाना बेहद मुश्किल काम है। महीने में 1600 रुपये तो दुकान और मकान के किराए पर ही खर्च हो जाते हैं। ऐसे में धनेश्वर के इलाज के लिए वह किस तरह पैसे जुटा पाता होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

धनेश्वर को खून चढ़वा देना उसका कोई इलाज नहीं है। यदि उसे इस रोग से पूरी तरह छुटकारा पाना है तो उसे बोन मैरो ट्रांसप्लांट कराना होगा। इस इलाज में सात-आठ लाख रुपये खर्च होंगे। धनेश्वर के मां-बाप इतनी बड़ी रकम का प्रबन्ध कर पाने में असर्मथ हैं लेकिन वे अपने बच्चे को तड़पता हुआ भी तो नहीं देख सकते।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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