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राजनीति पर भारी पड़ी रोटी!

By आलोक प्रकाश पुतुल
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रवींद्र चतुर्वेदी बिलासपुर नगर निगम के लिए कांग्रेस के पार्षद चुने गए थे
छत्तीसगढ़ में बिलासपुर के एक पार्षद ने आर्थिक तंगी के चलते अपने पद से इस्तीफा दे दिया और तृतीय श्रेणी शिक्षाकर्मी की नौकरी कर ली है.

छत्तीसगढ़ के दूसरे सबसे बड़े शहर बिलासपुर के पार्षद रवींद्र चतुर्वेदी ने ऐसे समय में इस्तीफा दे कर शिक्षाकर्मी की नौकरी शुरू की है, जब राज्य में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव में कई पार्षद विधायक बनने के लिए चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहे हैं.

राज्य में ऐसे उम्मीदवार भी बहुत से हैं, जो नौकरी छोड़ कर चुनाव लड़ रहे हैं.

पार्षद रवींद्र के इस्तीफ़े से राजनीतिक गलियारे में लोग चकित हैं. लेकिन बिलासपुर समेत राज्य के दूसरे हिस्सों में पार्षद के इस क़दम का आम लोगों ने स्वागत किया गया है.

नहीं सुहाई राजनीति

क़ानून और इतिहास में स्नातकोत्तर की डिग्री लेने वाले रवींद्र चतुर्वेदी पिछले 9 साल से पार्षद थे. पिछले चुनाव में उनके ख़िलाफ़ राज्य के वित्त मंत्री और सांसद ने प्रचार किया था.

पहली बार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पार्षद के चुनाव में खड़ा हुआ और जनता ने साबित कर दिया कि धन और बाहुबल के बदौलत ही चुनाव नहीं जीते जाते
तमाम विरोधों के बावजूद रवींद्र ने दूसरे सभी उम्मीदवारों को हराकर बिलासपुर नगर निगम में अपनी जगह सुनिश्चित की थी. लेकिन जनसेवा का मंत्र लेकर राजनीति में आए रवींद्र को आर्थिक समस्याओं के आगे घुटने टेकने पड़े.

शिक्षक माता-पिता की संतान रवींद्र कहते हैं, "अच्छे लोगों को भी राजनीति में आना चाहिए, यही सोच कर मैं राजनीति में आया. पहली बार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पार्षद के चुनाव में खड़ा हुआ और जनता ने साबित कर दिया कि धन और बाहुबल के बदौलत ही चुनाव नहीं जीते जाते."

अगली बार रवींद्र को कांग्रेस पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया और इस बार भी वे जनता की उम्मीदों पर खरे उतरे.

लेकिन पार्षद के पद पर रहते हुए रवींद्र के लिए अपना घर चलाना भी मुश्किल हो गया.

रवींद्र कहते हैं, "मेरे पास आय का कोई और स्रोत नहीं था और पार्षद के रूप में लगभग 18 घंटे तक जनसेवा करने के बदले मुझे मानदेय के रूप में केवल ढाई हज़ार रुपए मिलते थे. मेरे पास इतना समय भी नहीं होता था कि मैं कोई और काम कर सकूँ, जिससे मुझे थोड़े पैसे मिल सकें. "

मुश्किलें

पत्नी और दो बच्चों वाले परिवार का जब गुज़ारा मुश्किल हो गया तो रवींद्र ने तय किया कि राजनीति को अब अलविदा कह देना चाहिए.

इसके बाद जैसे ही उन्हें तृतीय श्रेणी के शिक्षाकर्मी का प्रस्ताव मिला उन्होंने तत्काल इसे स्वीकार कर लिया और पार्षद पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

ईमानदार व्यक्ति का पार्षद का पद छोड़कर तृतीय श्रेणी के शिक्षाकर्मी की नौकरी करना संकेत करता है कि राजनीति शायद भले लोगों के लिए नहीं है
छत्तीसगढ़ की राजनीति को बेहद क़रीब से देखने वाले समाजवादी चिंतक आनंद मिश्रा कहते हैं " रवींद्र चतुर्वेदी का इस्तीफ़ा लोकतंत्र में अनास्था की भी निशानी है. ईमानदार व्यक्ति का पार्षद का पद छोड़कर तृतीय श्रेणी के शिक्षाकर्मी की नौकरी करना संकेत करता है कि राजनीति शायद भले लोगों के लिए नहीं है."

रवींद्र के पड़ोस में रहने वालों को इस बात की खुशी है कि उन्होंने रवींद्र जैसा ईमानदार जनप्रतिनिधि चुना था, लेकिन अब उन्हें इस बात की चिंता भी सता रही है कि नगर निगम में उनकी आवाज़ अब कौन सुनेगा.

कुदुदंड इलाक़े के संतोष कुमार कहते हैं, "बेइमानी कर हर महीने लाखों रुपए कमाने की बजाय ईमानदारी से शिक्षाकर्मी की नौकरी करना सबके बस का नहीं है. इसके लिए तो कलेजा चाहिए."

व्यवस्था पर सवाल

बिलासपुर नगर निगम में ही कांग्रेस की पार्षद शाहज़ादी कुरैशी पूरे मामले के लिए व्यवस्था को दोष देती हैं. उनकी मांग है कि पार्षदों को भी विधायक और सांसदों की तरह सम्मानजनक वेतन मिले.

किसी पार्षद से जनता की अपेक्षा बहुत होती है. शहर में होने वाले आयोजनों में अगर पार्षद केवल चंदा ही देना चाहे तो रकम हर माह 10-20 हजार रुपये तक पहुँच जाएगी
शाहज़ादी कहती हैं, "किसी पार्षद से जनता की अपेक्षा बहुत होती है. शहर में होने वाले आयोजनों में अगर पार्षद केवल चंदा ही देना चाहे तो रकम हर माह 10-20 हजार रुपये तक पहुँच जाएगी. ऐसे में रवींद्र का त्यागपत्र हमारी पूरी व्यवस्था औऱ सोच को ही कटघरे में खड़ा करता है."

लेकिन अब रवींद्र इन बातों से अलग-थलग बिलासपुर शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर एक गाँव बेलटुकरी के प्राथमिक विद्यालय में बच्चों के बीच मगन हैं, जहाँ उनकी पहली नियुक्ति हुई है. यहाँ उन्हें पहली कक्षा के बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा मिला है.

रवींद्र कहते हैं, "जब मैंने पहले दिन स्कूल में बच्चों के कमरे में क़दम रखा तो डर था कि अपना दायित्व ठीक से निभा पाऊँगा भी या नहीं. लेकिन पहले दिन से ही सब कुछ ठीक हो गया और अब मैं यहाँ खुश हूँ."

रवींद्र की पत्नी भी खुश हैं कि अब उनके पति को पार्षद के रुप में मिलने वाले ढाई हज़ार रुपए के बजाय शिक्षाकर्मी के तौर पर वेतन के रुप में साढ़े चार हज़ार रुपए मिलेंगे.

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