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अमरीकाः किसकी झोली में गिरेगा मुस्लिम वोट

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मुसलमानों की ओबामा को वोट देने के मसले पर अलग-अलग राय है
अमरीका में राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए मतदान तो क़रीब है पर यह कहना मुश्किल है कि मुसलमानों का वोट किसी एक को ही मिलेगा या फिर..?

बराक ओबामा और जॉन मैकेन की पाकिस्तान नीति को बारीकी से जांचें परखें तो बहुत अंतर नहीं नज़र आएगा लेकिन ऊपरी तौर पर दोनों में ख़ासा फ़र्क दिखता है और यही आमतौर पर जनता को भी नज़र आता है.

वर्ष 2007 के जून में जब बराक ओबामा अपनी ही पार्टी की उम्मीदवारी के लिए एक बहस में भाग ले रहे थे तो उनसे पूछा गया था कि अगर आपको पता चलता है कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान के कबायली इलाकों में छिपे हुए हैं तो आप क्या करेंगे.

इसका जवाब था कि अगर सही सही ख़ुफ़िया जानकारी हो, और पाकिस्तान कार्रवाई करने के काबिल नहीं हो या कार्रवाई नहीं करना चाहता हो तो वो अमरीकी फौज को सीधा हमला करने का हुक्म देंगे.

उस बहस के सवा साल के बाद जब बराक ओबामा जॉन मैकेन के साथ बहस में हिस्सा ले रहे थे तो फिर उनसे वही सवाल पूछा गया और जवाब वही था जो वो पिछले पंद्रह महीनों से देते आए हैं.

अमरीकी भूमिका

इन पंद्रह महीनों मे बुश प्रशासन के आदेश पर न जाने कितनी बार कबायली इलाकों में मिसाइल हमले हुए बल्कि एक बार तो अमरीकी कमांडो पाकिस्तान की ज़मीन पर भी उतरे.

दोनों देशों के रिश्तों में काफ़ी तल्ख़ी भी आई. लेकिन बराक ओबामा के बयान का जो असर हुआ वो इन सब हमलों से ज़्यादा था क्योंकि उसे देखा ऐसे गया जैसे वो पाकिस्तान पर हमला करना चाहते हों.

वैसे देखा जाए तो उन्होंने वही कहा जो कुछ वक्त से अमरीकी नीति का हिस्सा रहा है लेकिन यहां के नेता और अधिकारी कभी खुलकर इसकी बात नहीं करते.

और उनके विरोधी जॉन मैकेन ने जब भी मौका मिला उन्हें इस बात की नसीहत देने में बिल्कुल देर नहीं लगाई.

मैकेन का कहना था कि ये सब बातें कही नहीं जाती हैं. जो करना है, वो करना है और ये पाकिस्तानी सरकार के साथ मिलकर करने की ज़रूरत है.

जॉन मैकेन अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के लिए इराक़ जैसी नीति की बात कर रहे हैं. उनका कहना है कि फ़ौज में बढ़ोत्तरी की जाए और जिस तरह से इराक़ के अनबर इलाके में सुन्नियों की मदद से काबू पाया गया वैसे ही अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में किया जा सकता है और वो भी पाकिस्तानी फ़ौज की मदद से.

उनका कहना है कि ये आसान नहीं होगा लेकिन लोगों को साथ लिए बिना कामयाबी नहीं मिलेगी.

बराक ओबामा भी कहते हैं कि अफ़गानिस्तान में मौजूद अमरीकी फ़ौज में बढ़ोत्तरी की जाए लेकिन पाकिस्तानी फ़ौज को ब्लैंक चेक नहीं दिया जाए जैसा मुशर्रफ़ के ज़माने में हुआ है.

जहां तक पाकिस्तानी जनता के साथ रिश्ते बेहतर करने की बात है तो वो पाकिस्तान में स्कूल, अस्पताल, सड़कें बनाने के लिए जो पंद्रह अरब डॉलर के अनुदान का बिल सेनेट में पेश किया गया है, उसके बड़े समर्थकों में से हैं.

यहां के कई विश्लेषक मानते हैं कि पाकिस्तानी फ़ौज के नज़रिए से देखें तो शायद मैकेन अच्छे उम्मीदवार होंगे, जनता के लिए ओबामा और बाइडेन की जोड़ी ज़्यादा बेहतर होगी.

क्या सोचते हैं मुस्लिम..?

लेकिन अमरीका में बसे पाकिस्तानी जो इन उम्मीदवारों की नीतियों को क़रीब से देख सुन रहे हैं, उनकी क्या राय है?

इसी सवाल का जवाब जानने के लिए शुक्रवार के दिन मैं पहुंचा वर्जीनिया राज्य की दारूल खुदा मस्जिद में जहां काफ़ी संख्या में पाकिस्तानी मूल के लोग नमाज़ अदा करने आते हैं.

कुछ मुसलमानों का मानना है कि ओबामा मैकेन से ज़्यादा बेहतर विकल्प हैं

नमाज़ पढ़ने आए ख़ालिद का कहना है कि ओबामा जो भी बयान दे रहे हैं वो राजनीति से प्रेरित हैं और अमरीकी जनता को खुश करने के लिए हैं.

उनका कहना है, "मैं उम्मीद यही करता हूँ कि वो सचमुच पाकिस्तान पर बमबारी करने की नहीं सोच रहे हैं."

लेकिन वहीं मौजूद हारून का कहना है कि यह महज राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं है क्योंकि अमरीकी राजनीति का इतिहास यही है कि नेता जो कहते हैं, वो करते हैं.

उनका कहना है, "पाकिस्तानियों को कभी भी ओबामा को वोट नहीं देना चाहिए क्योंकि उसने कम से कम 20 बार कहा है कि वो पाकिस्तान पर हमला करने में पीछे नहीं रहेंगे. हम कैसे पाकिस्तानी कहलाएंगे अगर उसके बावजूद हम उन्हें वोट देते हैं."

उनका कहना है कि इतिहास यही कहता है कि रिपबलिकन्स पाकिस्तान के लिए बेहतर होते हैं, डेमोक्रैट्स तो यहूदियों की पार्टी है और वो मुसलमानों का कभी भला नहीं चाहते.

इस बहस को दारूल खुदा मस्जिद के मोअज़्ज़िन जिनका ताल्लुक अफ़गानिस्तान से है, बड़े ग़ौर से सुन रहे थे और जब भी मेरी नज़र उनकी तरफ़ जाती वो हवा में मुठ्ठियां लहराकर ओबामा, ओबामा कहने लगते.

ये पूछने पर कि ओबामा उन्हें क्यों अच्छे लगते हैं, उन्होंने कहा, "वो ख़ुदा का बंदा लगता है, और मुझे उसका रंग बहुत अच्छा लगता है."

ये तो तय है कि व्हाइट हाउस की चाभी मैकेन को मिले या ओबामा को, दरवाज़ा खुलने से भी पहले उनके सामने समस्याओं का अंबार लगा रहेगा और पाकिस्तान का नंबर उसमें काफ़ी उपर होगा इसमें किसी को शक नहीं है.

देखने वाली बात ये होगी कि दुनिया का सबसे बूढ़ा लोकतंत्र, नए सिरे से चलना सीख रहे पाकिस्तानी लोकतंत्र का हाथ थामता है या फिर झटक देता है.

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