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चुनाव बाद बदलेंगे भारत-अमरीका संबंध?

By वंदना
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बुश प्रशासन के तहत भारत-अमरीका संबंधों को नया आयाम मिला है
अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव के बाद नए शासन का क्या रणनीतिक, सामरिक और आर्थिक असर पड़ेगा भारत-अमरीका संबंधों पर?

तारीफ़ों के इतने पुल शायद ही किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने किसी अमरीकी राष्ट्रपति के लिए बाँधे हों.

पर क्या अमरीका चुनाव में नए शासन के आने के बाद भारत-अमरीका के बीच पनपता ये नवा नवेला प्यार यूँ ही बरकऱार रह पाएगा?

शीत युद्ध के दौर ने दोनों देशों के रिश्तों को भी ठंडा ही रखा, दोनों देशों में दूरी और तनाव बना रहा. मौटे तौर पर माना जाता रहा कि रिपब्लिकन पार्टी के शासन के दौरान भारत से रिश्ते ख़राब रहते थे और डेमोक्रेटिक पार्टी के शासन में कुछ बेहतर.

लेकिन पिछले 10 वर्षों के घटनाक्रम ने इन सब धारणाओं को बदल कर रख दिया है. बदलाव के आसार क्लिंटन प्रशासन के दौरान ही दिखने लगे थे जब वो भारत यात्रा पर आए.

बदलते रिश्तों की ताज़ा मिसाल है भारत-अमरीका परमाणु समझौता. आर्थिक संकट ने समझौता लागू होने की चमक भारतीय और अमरीकी नेताओं के चेहरे पर कुछ कम भले ही कर दी हो लेकिन ये समझौता दोनों देशों के बीच बदले समीकरणों का परिचायक है- ये समीकरण कुछ को भा रहा है तो कुछ को खटक रहा है.

बड़ा अंतर नहीं

पिछले कुछ सालों में अमरीका की दोनों बड़ी पार्टियाँ-डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन के बीच एक राय सी बन गई है कि भारत एक बड़ी शक्ति है और उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए. अगर दोनों पार्टियों का चुनावी घोषणा पत्र पढ़ें तो भारत को करीब-करीब चीन के समकक्ष रखा गया है
अमरीका में नए शासन के आने का क्या रणनीतिक, सामरिक और आर्थिक असर पड़ेगा भारत-अमरीका संबंधों पर? लंदन में किंग्स कॉलेज के डॉक्टर हर्षवर्धन पंत मानते हैं कि अमरीकी चुनाव में सत्ता किसी के भी हाथ में रहे भारत का कोई बड़ा नुकसान नहीं होने वाला.

डॉक्टर पंत कहते हैं, "पिछले कुछ सालों में अमरीका की दोनों बड़ी पार्टियाँ-डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन के बीच एक राय सी बन गई है कि भारत एक बड़ी शक्ति है और उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए. अगर दोनों पार्टियों का चुनावी घोषणा पत्र पढ़ें तो भारत को करीब-करीब चीन के समकक्ष रखा गया है."

भारत के वरिष्ठ पत्रकार इंदर मल्होत्रा भी मानते हैं कि चाहे मैक्केन चुने जाएँ या ओबामा भारत को मोटे तौर पर कोई बड़ा फ़र्क़ पड़ने वाला नहीं है.

इंदर मल्होत्रा कहते हैं, "इसमें कोई शक़ नहीं कि जॉर्ज बुश ने जितना हिंदुस्तान को अमरीका के करीब लाने की कोशिश की है और परमाणु समझौते को लेकर जो हिम्मत दिखाई है उतना शायद ही कोई अमरीकी राष्ट्रपति कर पाए, ख़ासकर अब अमरीकी अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो रही है. दस्तख़्त होने के बाद अब अगले कुछ समय तक तो परमाणु ममला तंग करने वाला नहीं है, विवाद होगा तो केवल भारत के भीतर. अमरीका की दोनों पार्टियों की नीति भारत को लेकर स्पष्ट है."

यानी कहने का आश्य ये कि भारत-अमरीका संबंधों ने अब वो गति पकड़ ली है कि वो किसी पार्टी या व्यक्ति विशेष के बंधनों से मुक्त होते जा रहे हैं.

हालांकि डॉक्टर हर्षवर्धन पंत के मुताबिक अगर भारत के प्रति अमरीका का रवैया दोस्ताना हुआ है तो इसमें अमरीका का कोई हृदय परिवर्तन नहीं हुआ है, ये इसलिए हुआ क्योंकि भारत ने पिछले कुछ सालों में अपनी राजनीतिक और आर्थिक प्रोफ़ाइल मज़बूत की है, इसे देखते हुए ही अमरीका ने भी अपनी विदेश नीति बदली है.

लेकिन अमरीका से बढ़ती निकटता के कारण भारत को ये आलोचना भी झेलनी पड़ रही है कि अमरीका के दवाब में वो विदेश नीति के कुछ फ़ैसले बदल रहा है, ख़ासकर ईरान से संबंधित नीति.

ओबामा या मैक्कन

चुनाव के बाद अमरीका में बागडोर या तो रिपब्लिकन पार्टी की ओर से जॉन मैक्केन के हाथ में होगी या डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से बराक ओबामा के हाथ में.

ओबामा को लेकर हमेशा भारत संबंधी टिप्पणियाँ सामने आती रही हैं- कभी वे गांधीजी का ज़िक्र करते हुए सुनाई देते हैं तो कभी सुनने में आता है कि वो अपनी जेब में एक ताबीज़ रखते हैं जिस पर हनुमान जी का चित्र छपा है.

वहीं उनके रनिंग मेट और उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडन की छवि भी भारत-समर्थक नेता की है. परमाणु समझौते के लिए ज़रुरी हाइड एक्ट को कांग्रेस की मंज़ूरी दिलाने में बाइडन ने अहम भूमिका निभाई थी.

वहीं मैक्केन भी भारत को अहमियत को दर्शाते बयान बार-बार देते आए हैं हालांकि विश्व के दूसरे देशों की तरह भारत के लिए भी सारा पेलिन अभी नई हैं जिन्हें परखना होगा.

आतंकवाद का मसला

काबुल में भारतीय दूतावास पर हमले का आरोप पाकिस्तान पर लगाया गया था

भारत के लिए आतंकवाद एक बड़ा मुद्दा रहा है. केवल 2008 में ही भारत के अहमदाबाद, जयपुर, दिल्ली जैसे शहर हमलों की चपेट में आ चुके हैं जिसमें सैकड़ों लोगों की जानें गईं.

भारत के लिए ये देखना दिलचस्प रहेगा कि अमरीका का नया प्रशासन भारत के पड़ोसी देशों पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान को लेकर क्या नीति अपनाता है क्योंकि वहाँ की गतिविधियों का सीधा असर भारत पर पड़ता है.

लंदन के किंग्स कॉलेज में डिफ़ेंस विभाग के डॉक्टर हर्षवर्धन पंत कहते हैं, "अमरीका जिस तरह से आतंक के ख़िलाफ़ जंग चला रहा है उसमें अहम बदलाव आया है और वो अब मानता है कि अफ़ग़ानिस्तान का मुद्दा तब तक नहीं सुलझ सकता जब तक पाकिस्तान नहीं सुलझता. इसलिए दोनों उम्मीदवार पाकिस्तान को गंभीरता से ले रहे हैं. पाकिस्तान पर दवाब पड़ रहा है कि वो आतंकवादियों के अड्डों को नष्ट करे."

पाकिस्तान को लेकर ओबामा के कड़े बयानों को देखते हुए पाकिस्तान थोड़ा परेशान है लेकिन मैकेक्न वैसी भाषा नहीं बोलते जैसे ओबामा बोल रहे हैं. उनकी पार्टी को पाकिस्तान से हमदर्दी रही है.
इस मुद्दे पर ओबामा ने काफ़ी कड़ा रुख़ अपनाया है. ओबामा ने सीधे-सपाट शब्दों में यहाँ तक कहा है कि अमरीका से मिलने वाली आर्थिक सहायता का इस्तेमाल पाकिस्तान भारत के खिलाफ़ लड़ाई की तैयारी में कर रहा है.

इंदर मल्होत्रा कहते हैं, "इन बयानों को देखते हुए ओबामा से पाकिस्तान थोड़ा परेशान है लेकिन मैकेक्न वैसी भाषा नहीं बोलते जैसे ओबामा बोल रहे हैं. उनकी पार्टी को पाकिस्तान से हमदर्दी रही है."

डॉक्टर हर्ष पंत के मुताबिक अमरीका चाहता है कि पाकिस्तान का फ़ोकस कश्मीर से हटे और अफ़ग़ानिस्तान पर जाए.

अमरीका का नया प्रशासन ‘आतंक के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के ज़रिए अपनी जंग कैसे लड़ता है भारत उससे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होगा क्योंकि ये आरोप बार-बार लगते रहे हैं कि सीमा पार से भारत में चरमपंथ को प्रश्रय मिल रहा है. इसलिए भारत की नज़र अमरीका के नए राष्ट्रपति की पाकिस्तान नीति पर ज़रूर रहेगी.

आउटसोर्सिंग

रणनीतिक और सामरिक मसलों के अलावा भारतीय नज़रिए से अमरीका में आउटसोर्सिंग का मुद्दा अहम है.

राष्टपति पद के उम्मीदवार बराक ओबामा कह चुके हैं कि वे उन कंपनियों को दी जा रही करों में छूट खत्म कर देंगे, जो अन्य देशों को काम आउटसोर्स करती हैं. इनमें एक बड़ा प्रतिशत भारतीय कंपनियों का है. जबकि जॉन मैक्कन का रुख़ कुछ नर्म है और वे वैश्विकरण में प्रतियोगिता के हिमायती हैं.

डॉकटर हर्षवर्धन पंत कहते हैं,आउटसोर्सिंग को लेकर भारत के लिए थोड़ी सी चिंता की बात है क्योंकि ओबामा की नीति बहुत प्रोटेक्शनिस्ट है. हालांकि ये बात भी सच है कि एक चलन रहा है अमरीकी राजनीति में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार अभियान के दौरान ऐसा रुख़ अपनाते हैं लेकिन शासन में आने के बाद वो बदल जाते हैं. क्लिंटन का भी यही रुख़ था पर शासन में आने के बाद उन्होंने वैश्विकरण को बढ़ावा दिया. इसलिए आउटसोर्सिंग को लेकर नीतियाँ चुनाव बाद इतनी कठोर नहीं होंगी.

फ़ॉरेस्टर रिसर्च के अनुमान के मुताबिक 2015 तक करीब 33 लाख अमरीकी नौकरियाँ भारत और चीन जैसे देशों में चली जाएँगी.

जबकि इंदर मल्होत्रा मानते हैं,अगर विश्व में आर्थिक संकट ऐसे ही छाया रहा तो आउटसोर्सिंग का मसला ही नहीं रहेगा, कौन आउटसोर्स करेगा और किसको. भारत में आउटसोर्सिंग कंपनियाँ परेशान हैं, अमरीका में मोटी तन्ख़्वाह लेने वाले भारतीय परेशान हैं. एक भारतीय परिवार ने तो आत्महत्या कर ली है. आर्थिक संकट बहुत गहरा है.

भारत-अमरीका संबंधों को लेकर ज़्यादातर टीकाकार एकमत हैं कि सत्ता परिवर्तन का भारत नीति पर कोई बड़ा फ़र्क नहीं पड़ेगा और दूसरा ये कि वित्तीय संकट को देखते हुए आने वाला समय थोड़ा कष्टदाय होगा और नए राष्ट्रपति लगभग पहला साल तो इस आर्थिक सूनामी से निपटने में ही लगाना पड़ेगा.

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