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आगे बढ़ती भूख की कहानी

By निष्ठा चुघ
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    दुनियाभर में बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषण के शिकार हैं
    ग्लोबल हंगर इंडेक्स के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ विकासशील देशों में ही 90 करोड़ से ज्यादा लोग भूख का शिकार हैं. दुनिया तरक्की कर रही है तो फिर बच्चे भूखे क्यों हैं?

    लुपलुपाती आँखों वाला एक निर्मम माँसखोर पक्षी और उससे थोड़ी ही दूर ज़मीन पर हड्डियों के ढांचे पर खींचखांच कर थोड़ी सी चमड़ी पहने इंसान का एक बच्चा. दोनों ही भूखे थे.

    गिद्ध की पैनी नज़रें इस इंतज़ार में कि कब वो भूख और गरीबी से बेहाल ज़िंदा माँस का लोथड़ा, जो एक किलोमीटर दूर एक राहत शिविर तक कीड़े की तरह रेंग कर पहुंचने की नाकाम कोशिश कर रहा था, दम तोड़े और वो उसे नोच खाए.

    भूख की कहानी कहती वो ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर 1993 में सूडान में पड़े भंयकर अकाल के दौरान ली गई थी. और इस तस्वीर को लेने वाले फोटोग्राफर कैविन कॉर्टर को इस मानवीय त्रासदी को दुनिया के नाश्ते की टेबल तक पहुंचाने के लिए पुलिट्ज़र अवॉर्ड से नवाज़ा गया था. तब मैं स्कूल में पढ़ती थी. लेकिन तस्वीर को देख कर ऐसा लगा था जैसे किसी ने लाखों सुइयों की नोक पीसकर मेरी नसों में उंडेल दी हो.

    भयावह सच्चाई

    रूह को ज़र्द कर देने वाली उस तस्वीर की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. इनाम मिलने के ठीक तीन महीने के बाद 33 वर्षीय कॉर्टर ने आत्महत्या कर ली. वजह, कार्टर अपने ही हाथों ली उस तस्वीर की भयावह सच्चाई को स्वीकार नहीं पाए.

    इनाम मिलने के बाद रातोंरात कार्टर ने दुनिया भर में नाम तो कमाया, लेकिन वहीं उनकी नैतिकता पर भी सवाल उठाया गया...उन्होंने तस्वीर लेने के बाद क्यों उस बच्चे की मदद नहीं की...कोई नहीं जानता कि वो बच्चा दो निवालों की ज़िंदगी तक पहुंच भी पाया या नहीं...क्या कार्टर उस तस्वीर में न दिखने वाले दूसरे गिद्ध थे.

    इस सवाल की नोक कार्टर को चुभती रही और इसका जवाब वे खुद ही खुदकुशी से पहले अपनी आखिरी चिट्ठी में लिख गए.

    दुनियाभर में हर रोज़ बच्चे भूख से तम तोड़ रहे हैं

    आज 15 साल के बाद एक बार फिर उस गिद्ध, उस बच्चे और उस अंतरात्मा की आवाज़ के शिकार फोटोग्राफर के बारे में सोच रही हूं. इन डेढ़ दशकों में दुनिया कहां की कहां पहुंच गई है. विज्ञान, ऊर्जा, आईटी, चिकित्सा, व्यापार, विमानन सभी क्षेत्रों में बेतहाशा तरक्की हुई है, लेकिन आज भी दुनिया का हर सांतवा आदमी पेट में भूख की आग लिए घूम रहा है.

    15 साल पहले की बात करें तो एक अनुमान के मुताबिक 82 करोड़ लोग भूख से मजबूर थे. आज ग्लोबल हंगर इंडेक्स के ताज़ा आंकड़े सामने रखे हैं जो कहते हैं कि सिर्फ विकासशील देशों में ही 90 करोड़ से ज्यादा लोग भूख का शिकार हैं. दुनिया तो तरक्की कर रही थी तो फिर ये आठ करोड़ से भी ज्यादा भूखे लोग, या कहूं कि एक पूरा जर्मनी देश, कहां से आ गया.

    तरक्की और भूख

    मैं सोच रही हूं कि वो तरक्की कहाँ है या फिर दुनिया में गिद्धों की संख्या में भी तरक्की हो गई है... जब से याद पड़ता है तब से दुनिया में गरीबी कम करने और भूख मिटाने के नारे और वादे सुनती आ रही हूँ.

    सरकारें, नेता, गैर सरकारी एजेंसियाँ, नीतियाँ बनाने वाले संस्थान न जाने कब से साल दर साल भूख और गरीबी को जड़ से मिटाने के लक्ष्य तय करते आ रहे हैं, राहत देने के वादे करते आ रहे हैं... लेकिन दुनिया के लिये हीरे उगलने वाला अफ्रीका आज भी भूखा है.

    सूनी आंखों वाले बेबस लोग किसी भी धर्म जाति या देश के हों, तकलीफ होती है, लेकिन भारतीय हूँ, शायद इसलिये ये देख कर मन ज़्यादा विचलित हुआ कि भुखमरी के शिकार दुनिया के सबसे ज़्यादा लोग मेरे ही देश में रहते हैं. 20 करोड़ यानि भारत का लगभग हर पाँचवाँ इंसान.

    मध्य प्रदेश में भूख की स्थिति अत्याधिक चिंताजनक है और उसकी गंभीरता का स्तर उतना ही है जितना कि इथोपिया या चाड में. लेकिन भारत तो इथोपिया या चाड नहीं है. इथोपिया या चाड ने इतनी तरक्की नहीं की है जितनी भारत ने, उनके पास अंतरिक्ष में प्रक्षेपण की क्षमता नहीं है, उनके फिल्म या आईटी उद्योग का नामोनिशान भी नहीं है, उनके पास अमरीका के साथ परमाणु संधि भी नहीं है...तो फिर भारत का स्थान उस सूची में 66वां क्यों है.

    उड़ीसा के कालाहांडी में भुखमरी की कहानियाँ ज़्यादा पुरानी नहीं हैं

    जूँ तक नहीं रेंगती

    अचानक मध्य प्रदेश में सालों पहले उठा एक विवाद याद आ रहा है जब उमा भारती ने भगवान हनुमान को केक का चढ़ावा चढ़ाया था. मामले ने राजनीतिक रंग पकड़ा, विपक्षियों ने फिकरे कसे, हो हल्ला हुआ, कुछ जगह प्रदर्शन भी हुए. आज उसी राज्य में हालत खराब हैं लेकिन भूखे लोगों के लिए कोई हो हल्ला या रैली नहीं कर रहा.

    ग्लोबल हंगर इंडेक्स में देश के किसी भी राज्य को 'गंभीर' के स्तर से कम नहीं आंका गया है. लेकिन कहीं कोई नेता उफ करता हुआ सुनाई नहीं दे रहा.

    महाराष्ट्र में भी स्थिति चिंताजनक है लेकिन वहां उत्तरी भारत या हिंदी भाषी लोगों को बाहर खदेड़ना शायद चिंता का ज्यादा गंभीर मुद्दा था.

    कई साल पहले उड़ीसा के कालाहांडी में पत्ते उबाल कर खाने को मजबूर या अपने बच्चों को 400 रूपये में बेच देने वाले लोगों के चेहरे टीवी पर देखे थे.

    उन्ही चैनलों और अखबारों में आजकल सोनिया गांधी और मायावती की राजनीतिक रस्साकशी अपने बल छोड़ती ज्यादा नज़र आती है.

    भूख ज़िंदगी भर रहने वाली शायद एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज दिन में तीन बार रोटी खाने से ही हो सकता है. वक्त और तरक्की के साथ भूख भी बढ़ रही है. लेकिन ऐसा लगता है जैसे तरक्की के साथ उस तस्वीर से हज़ारों गिद्ध भी बाहर निकल आए हैं.

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