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भारत में बढ़ता किराए की कोख का कारोबार

By पूनम तनेजा,
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    ऐसे देश में जहाँ अभी तक किराए की कोख के लिए कोई कानून नहीं है, यह उद्योग करोड़ों डॉलर का कारोबार बन गया है
    किराए की कोख के लिए ब्रिटेन के निसंतान एशियाई दंपतियों का भारत आना बढ़ता जा रहा है. यहाँ इसके लिए अब तक कोई कानून नहीं है.

    एक ऐसे देश में जहाँ अभी तक किराए की कोख के लिए कोई कानून नहीं है, यह उद्योग करोड़ों डॉलर का व्यवसाय बन गया है.

    भारत आने वाले एक ऐसे ही दंपति हैं 44 वर्षीय बॉब और 43 वर्षीय निक्की जो ब्रिटेन के इलफ़ोर्ड से आए हैं.

    उनकी बेटी डेज़ी मुंबई के रोतुंदा क्लीनिक में पैदा हुई है.

    दानकर्ता महिला के अंडाणुओं को पहले बॉब के शुक्राणुओं से निषेचित किया गया और इसके बाद भ्रूण को एक ऐसी महिला की किराए की कोख में प्रत्यारोपित कर दिया गया जिससे यह दंपति कभी नहीं मिला था.

    इस दंपति ने बच्चा पाने के लिए ब्रिटेन में कई बार इलाज कराया था. बॉबी का कहना है कि उन्हें ब्रिटेन में किराए की कोख नहीं मिली इसलिए उन्हें इसकी तलाश में भारत आना पड़ा.

    कानून और नैतिकता

    बॉबी कहते हैं, "2000 से पहले हमने ब्रिटेन में किराए की कोख की बहुत तलाश की लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ. अगर कोई मिली भी तो वह हमारे अनुसार ठीक नहीं थी. इसीलिए हमें यहाँ आना पड़ा."

    ब्रिटेन में किराए की कोख लेने का अर्थ है कि कानून और नैतिकता के पचड़े में फंस जाना. वहाँ यह उद्योग ख़ासे नियमों से बंधा है और इसके लिए कड़े कानून भी हैं.

    ख़ासतौर पर एशिया के लोगों के लिए तो यह बहुत परेशानियों से भरा है.

    भारत में यह ख़तरे से भरा है जहाँ दुनिया में गर्भावस्था से मौत की दर सबसे ज़्यादा है

    जैकसन कर्कमैन ब्राउन बर्मिंघम के एक महिला अस्पताल में वैज्ञानिक हैं.

    वे कहते हैं, "एशियाई समुदायों में अंडाणु और शुक्राणु उपलब्ध नहीं हैं. और पूरे ब्रिटेन में सिर्फ़ दो शुक्राणु दानकर्ता हैं जिनके बारे में हमें जानकारी है और जो आम एशियाई पृष्ठभूमि के साथ मैच करते हैं."

    एशियाई अंडाणुओं, शुक्राणुओं और किराए की कोख की कमी ही बॉबी और निक्की को मदद के लिए भारत ले आई.

    सीधा सादा मामला

    प्रसूति सलाहकार मेसोद अफ़नान कहते हैं, "एशियाई दंपति हों या कोई और, अपनी प्रजनन क्षमता के इलाज के लिए बाहर जा ही रहे हैं. इसके लिए बाहर जाने के मामले ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ रहे हैं."

    रोतुंदा क्लीनिक जहाँ बेबी डेज़ी पैदा हुई मुंबई के एक उपनगर में स्थित है.

    क्लीनिक की निदेशक डॉ गौतम अल्लपड़िया प्रजनन क्षमता की विशेषज्ञ हैं. वे बताती हैं कि क्यों उनके क्लीनिक में विदेशी दंपति आते हैं.

    वे कहती हैं, "किराए की कोख का खर्च यहाँ अमरीका या ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में होने वाले खर्च से काफ़ी कम है. इसके अलावा यहाँ इसके लिए किसी कागज़ी कार्यवाही या वकील की ज़रूरत भी नहीं है. यहाँ यह सीधा सादा मामला है."

    अल्लपड़िया क्लीनिक में एक बच्चे को पाने की कीमत क़रीब 13, हज़ार पाउंड हैं जबकि किराए की कोख देने वाली महिला को ढाई से साढ़े तीन हज़ार पाउंड दिए जाते हैं. यह राशि यहाँ ऐसी किसी महिला के दस साल के वेतन के बराबर होती है.

    गुजरात के आनंद में भी प्रजनन पर्यटन का यह उद्योग खासा फल फूल रहा है

    मैंने गुजरात के आनंद में भी देखा कि प्रजनन पर्यटन का यह उद्योग वहाँ भी खासा फल फूल रहा है.

    पिछले चार सालों में 150,000 लोगों के इस समुदाय ने किसी भी दूसरे देश से ज़्यादा किराए के बच्चे पैदा किए हैं.

    लोकप्रिय क्लीनिक

    किराए की कोख का चलन यहाँ आकांक्षा क्लीनिक की वजह से बेहद लोकप्रिय हो गया है. इस क्लीनिक को डॉ नयना पटेल चलाती हैं.

    पिछले साल उन्होंने किराए की कोख के माध्यम से सौ से भी ज़्यादा दंपतियों की मदद की थी. उन्हें उम्मीद है कि इस बार यह आँकड़ा 40 फ़ीसदी बढ़ जाएगा.

    फ़िलहाल, इस क्लीनिक में 20 गर्भवती महिलाएं मौजूद हैं जिनकी कोख में विदेशी दंपतियों के बच्चे हैं.

    डॉ नयना पटेल कहती हैं, "हम पहले इन दंपतियों की उम्र देखते हैं. उनके स्वास्थ्य का इतिहास देखते हैं, उनके खून की स्थिति की जाँच करते हैं. अगर इनमें कोई समस्या होती है तो हम ऐसे मामले को स्वीकार नहीं करते या उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है तब भी हम ऐसे मामलों को स्वीकार नहीं करते."

    हालांकि किराए की कोख देने की इच्छुक महिलाओं की आनंद में कोई कमी नहीं है, फिर भी डॉ पटेल कहती हैं कि इसे देखने का नज़रिया कुछ दकियानूसी है.

    ख़तरे से भरा

    वे कहती हैं, "मैं इसकी आलोचना करने वालों से कहती हूँ, क्या वे कुछ ग़लत कर रहे हैं? क्या उन्होंने किसी की हत्या की है? क्या उन्होंने किसी को लूटा है? क्या वे कुछ अनैतिक कर रहे हैं? नहीं, तब वे ऐसा क्या बुरा कर रहे हैं. बल्कि वे तो किसी को बच्चा देने का अच्छा काम ही कर रहे हैं."

    क्या भारत में यह नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है?

    लेकिन यह एक ऐसे देश में ख़तरे से भरा काम है जहाँ दुनिया में गर्भावस्था से मौत की दर सबसे ज़्यादा है.

    29 वर्ष की विधवा हासू मारू एक छोटे बेटे के साथ रहती है. उसकी कोख में एक अमरीकी दंपति का बच्चा है. वह कहती है कि इससे मिलने वाले पैसे से वह अपने बेटे को पढ़ाएगी और एक घर ख़रीदेगी.

    इस उद्योग के फलने फूलने का मुख्य कारण पैसा ही है लेकिन क्या भारत में यह नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है?

    यही वह प्रश्न है जिसकी वजह से सरकार इसका कानून बनाने के लिए बाध्य हो रही है. उम्मीद है कि इस साल के अंत तक किराए की कोख के लिए कानून आ जाएगा.

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