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जेपीः भारत में समाजवादी आंदोलन के सशक्त स्तंभ

By राजीव रंजन नाग
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    भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर आपातकाल तक जेपी एक सशक्त आवाज़ बनकर उभरे
    लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन पर उनके व्यक्तित्व, कृतित्व को याद कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार और जेपी आंदोलन में सक्रिय रहे राजीव रंजन नाग.

    चंबल के चार सौ डाकुओं का समर्पण, बिहार में अराजक सत्ता व्यवस्था, कुशिक्षा, अपराध और अराजकता के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक छात्र आंदोलन, व्यवस्था में बदलाव के लिए संपूर्ण क्रांति के आहवान से लेकर केंद्र में इंदिरा गांधी की तत्कालीन सरकार को सत्ता से उखाड़कर लोकतंत्र की बहाली तक जयप्रकाश नारायण ने विविध और सत्याग्रही भूमिकाओं का निर्वाह किया.

    स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए झारखंड में हजारीबाग़ की 17 फीट ऊँची जेल की दीवार फाँदकर भागने की घटनाएँ जेपी के व्यक्तित्व की कहानी कहती हैं.

    दिसंबर 1973 में जेपी ने यूथ फ़ॉर डेमोक्रेसी नामक संगठन बनाया और देशभर के युवाओं से अपील की कि वे लोकतंत्र की रक्षा के लिए आगे आएँ. गुजरात के छात्रों ने जब 1974 में चिमनभाई पटेल की भ्रष्ट सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन शुरू किया तो जेपी वहाँ गए और नवनिर्माण आंदोलन का समर्थन किया.

    जेपी ने तब कहा था- "मुझे क्षितिज पर वर्ष 1942 दिखाई दे रहा है." मार्च में पटना में छात्रों ने आंदोलन की शुरुआत की. शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक आंदोलन का भरोसा मिलने की शर्त पर जेपी ने बिहार में आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया. यही बिहार आंदोलन बाद में संपूर्ण क्रांति आंदोलन में बदल गया.

    जून 1975 में गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हार गई और जनता पार्टी सत्ता पर काबिज हो गई. उसी दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया.

    चंबल के चार सौ डाकुओं का समर्पण, बिहार में अराजक सत्ता व्यवस्था, कुशिक्षा, अपराध और अराजकता के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक छात्र आंदोलन, व्यवस्था में बदलाव के लिए संपूर्ण क्रांति के आहवान से लेकर केंद्र में इंदिरा गांधी की तत्कालीन सरकार को सत्ता से उखाड़कर लोकतंत्र की बहाली तक जयप्रकाश नारायण ने विविध और सत्याग्रही भूमिकाओं का निर्वाह किया
    आंदोलन में शामिल विपक्ष ने इंदिरा गांधी से इस्तीफा माँगा. जेपी ने विपक्ष की इस माँग का समर्थन किया. देश में सरकार विरोधी माहौल बना और इंदिरा गांधी का सत्ता में रहना मुश्किल होने लगा. चंद्रशेखर, मोहन धारिया, हेमवती नंदन बहुगुणा, जगजीवन राम, रामधन और रामकृष्ण हेगड़े सरीखे नेताओं के कांग्रेस से अलग होकर जेपी के समर्थन में उतर आने से इंदिरा गांधी बुरी तरह बिफर गईं.

    इन घटनाओं से असुरक्षित महसूस कर रही इंदिरा गांधी ने देश में रातोंरात इमरजेंसी लगा दी. देशभर में सेंसरशिप लागू कर दी गई और जेपी समेत सैकड़ों बड़े नेताओं को मीसा और राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत गिरफ़्तार कर ज़ेलों में डाल दिया गया.

    अख़बारों का मुँह बंद कर दिया गया और पुलिस को खुली छूट दे दी गई. इमरजेंसी का विरोध न हो, इसके लिए लाखों कार्यकर्ताओं को ज़ेलों में ठूँस दिया गया. इस दौरान संजय गांधी का नसबंदी कार्यक्रम खूब परवान चढ़ा.

    19 महीने के काले क़ानून के बाद जनवरी 1977 में इंदिरा गांधी ने आम चुनाव की घोषणा कर दी. जेपी का गुर्दा ख़राब था, लेकिन डायलसिस पर होने के बावजूद उन्होंने चुनाव की चुनौती स्वीकार की. चुनाव में उत्तर भारत से कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ हो गया.

    इंदिरा और संजय गांधी चुनाव हार गए. जेपी की नैतिक शक्ति और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान ने उन्हें वो अवसर दिया था कि वे इंदिरा और उनकी राज्य शक्ति को पराजित कर सकें.

    छात्र आंदोलन के सारथी

    वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद गुजरात और बिहार में व्यवस्था परिवर्तन को लेकर 1974 में शुरू हुआ छात्र आंदोलन आज़ाद भारत के लिए अनोखी घटना थी.

    इंदिरा गांधी के आपातकाल का जेपी के नेतृत्व में प्रखर विरोध हुआ

    वर्ष 1973 में गुजरात विश्वविद्यालय में मेस खर्च की राशि बढ़ाए जाने को लेकर हुए छात्र आंदोलन का सीधा असर बिहार पर पड़ा, जहाँ बनती-गिरती सरकारों ने राज्य में अराजक स्थिति पैदा कर दी थी.

    वर्ष 1974 में शुरू हुआ बिहार का छात्र आंदोलन उन नागरिक समस्याओं की परिणति था जिन्हें लेकर छात्रों और नागरिकों में ज़बर्दस्त असंतोष और आक्रोश था.

    शैक्षिक स्तर में गिरावट, महंगाई, बेकारी, शासकीय अराजकता और राजनीति में बढ़ता अपराधीकरण ऐसे मुद्दे थे जिन्हें लेकर बिहार का आम नागरिक त्रस्त था. ऐसे में छात्र-युवाओं का संगठित आंदोलन एक स्वाभाविक घटना थी. लिहाजा 18 मार्च 1974 को पटना में शुरू हुआ आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था जिसका प्रभाव पूरे देश पर पड़ा.

    बिहार आंदोलन के नायक बने सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण को भी इस बात की ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि नागरिक समस्याओं को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन देशव्यापी बन जाएगा और देश का पूरा युवा वर्ग इसमें अपनी भागीदारी के लिए उठ खड़ा होगा.

    जेपी स्थिति का मूल्यांकन कर रहे थे. जब छात्रों ने जेपी से आंदोलन का नेतृत्व करने को कहा तो वे सहज ही तैयार हो गए. आंदोलन में महिलाओं, युवाओं, बुजुर्गों और बच्चों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.

    आंदोलन को कुचलने के लिए तत्कालीन सरकारों ने पुलिस का सहारा लिया. जनमानस पर इसका विपरीत असर हुआ. छात्र संगठित होते गए और संगठित छात्र शक्ति सरकार के लिए खतरा बन गई. जेपी की जनसभाओं में उमड़ती भीड़ से केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार हिल गई थी.

    जेपी आंदोलन को मिल रहे भारी समर्थन की सुगबुगाहट जब सचिवालयों से लेकर सेना की बैरकों तक देखी-सुनी जाने लगी तो परेशान इंदिरा गांधी ने 26 जून 1975 की आधी रात में इमरजेंसी की घोषणा कर दी.

    शैक्षिक स्तर में गिरावट, महंगाई, बेकारी, शासकीय अराजकता और राजनीति में बढ़ता अपराधीकरण ऐसे मुद्दे थे जिन्हें लेकर बिहार का आम नागरिक त्रस्त था. ऐसे में छात्र-युवाओं का संगࢠित आंदोलन एक स्वाभाविक घटना थी. लिहाजा 18 मार्च 1974 को पटना में शुरू हुआ आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था जिसका प्रभाव पूरे देश पर पड़ा
    इमरजेंसी की भनक मंत्रिमंडल के सदस्यों और सेना के अधिकारियों को भी नहीं लगने दी गई. सिर्फ़ तत्कालीन राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद, पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे और संजय गांधी को ही इस फ़ैसले की जानकारी थी.

    इंदिरा गांधी ने सेना के तीनों प्रमुखों को बुलाकर इतना संकेत ज़रूर दे दिया था कि वे सतर्क रहें. दूसरे दिन न्यायपालिका, कार्यपालिका, संवैधानिक संस्थाओं और यहाँ तक कि सेना को इंदिरा गांधी ने अपने नियंत्रण में ले लिया था. श्रीमती गांधी की इस पहल की देश भर में प्रतिक्रिया हुई.

    दुनिया यह देख-सुन कर स्तब्ध थी कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र लड़खड़ा गया है और शासन पर उनकी पकड़ ढीली पड़ गई है. इंदिरा गांधी पर इसका कोई फ़र्क नहीं पड़ा क्योंकि उनका उद्देश्य सिर्फ़ कुर्सी बचाए रखने तक सीमित हो गया था. 1971 में बांग्लादेश युद्ध से वीरांगना बनीं इंदिरा गांधी पर चार साल बाद तानाशाही के भी आरोप लगे.

    आपातकाल के 19 महीनों के बाद जब उन्होंने आम चुनाव कराने का निश्चय किया तो उन्हें इस बात की तनिक भी भनक नहीं थी कि देश की जनता उन्हें सत्ता से बेदखल करने का मन बना चुकी है. जेपी के आहवान पर देश भर के नेता आपस में कांग्रेस के खिलाफ़ संगठित हो गए. 1977 में जनता पार्टी केंद्रीय सत्ता पर काबिज हो गई.

    ...जब आहत हुए जेपी

    मोरारजी देसाई जनता पार्टी सरकार के प्रधानमंत्री बनाए गए. विभिन्न प्रदेशों में जब चुनाव हुए तो वहाँ भी जनता पार्टी एक वैकल्पिक राजनीतिक पार्टी के तौर पर उभरकर सत्तारूढ हो गई. विश्व के राजनीतिक क्षितिज पर यह पहली और अनोखी घटना थी जब शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता का परिवर्तन किया गया.

    जेपी आंदोलन से उपजे कई नेताओं पर अब जेपी के मूल्यों की अनदेखी का आरोप लगने लगा है

    दुनिया के देशों ख़ासकर अमरीका, तत्कालीन सोवियत रूस और ब्रिटेन तक की सरकारों को भारत की इस घटना पर आश्चर्य हुआ था.

    केंद्र में जनता पार्टी सरकार का जब विजयोत्सव मनाया जा रहा था, तब जेपी वहाँ न होकर सीधे 1-सफ़दरजंग स्थित प्रधानमंत्री आवास पहुँचे जहां पराजित इंदिरा गांधी रह रही थीं. तब इंदिरा गाँधी के साथ उनके सलाहकार एचवाई शारदाप्रसाद थे तो जेपी के साथ गाँधी शांति प्रतिष्ठान के प्रमुख राधाकृष्णन और प्रभाष जोशी थे.

    वह अदभुत मिलन था. मिलकर इंदिरा और जेपी दोनों रोए. जेपी अपनी जीत पर हुँकार के बजाए अपनी पराजित बेटी इंदू के साथ बैठकर रोए. जेपी के लिए इंदिरा गांधी इंदू बेटी थी. निजी तौर पर इंदिरा गाँधी भी जेपी को अपना चाचा मानती थीं. व्यक्तिगत तौर पर जेपी का इंदिरा गाँधी के लिए सदभाव, सौहार्द और स्नेह तनिक भी कम नहीं हुआ था. वह मूलत: सैद्धांतिक और मूलभूत प्रश्न उठा रहे थे.

    कुछ दिनों बाद जनता पार्टी में भी व्यक्तित्व की टकराहट शुरू हो गई. दोहरी सदस्यता का सवाल उछाला जाने लगा. समाजवादियों को यह स्वीकार्य नहीं था कि जनसंघ गुट को सरकार में ज़्यादा महत्व दिया जाए. समाजवादियों की यह चिंता स्वाभाविक थी क्योंकि जनसंघ के लोग काफ़ी तेज़ी से सत्ता के महत्वपूर्ण पदों पर क़ाबिज कर दिए गए थे.

    देखते-देखते मोरारजी सरकार में आतंरिक संघर्ष तेज़ होने लगा और कुछ दिनों में देसाई की सरकार गिर गई. जेपी की बातें अनसुनी की जाने लगीं. वे असहाय सी स्थिति में थे. इन घटनाओं ने उन्हें बुरी तरह तोड़ दिया. जेपी जनता पार्टी सरकार के सिर्फ़ माध्यम भर थे.

    जेपी अपनी जीत पर हुँकार के बजाए अपनी पराजित बेटी इंदू के साथ बैࢠकर रोए. जेपी के लिए इंदिरा गांधी इंदू बेटी थी. निजी तौर पर इंदिरा गाँधी भी जेपी को अपना चाचा मानती थीं. व्यक्तिगत तौर पर जेपी का इंदिरा गाँधी के लिए सदभाव, सौहार्द और स्नेह तनिक भी कम नहीं हुआ था. वह मूलत: सैद्धांतिक और मूलभूत प्रश्न उࢠा रहे थे
    देसाई सरकार के पतन के बाद कांग्रेस के सहयोग से चौधरी चरण सिंह की सरकार बनी. उनका प्रधानमंत्री बनना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं थी. इंदिरा गाँधी और उनके पुत्र संजय से वे सीधे संपर्क में थे.

    मोरारजी देसाई की सरकार में गृह और वित्तमंत्री रहते हुए उन्होंने इंदिरा गाँधी की पनाह ले रखी थी. यह किसान नेता के राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा थी. चरणसिंह का टूटना कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण घटना थी.

    जेपी की लड़ाई से उपजे राजनेता ख़ासकर लालू प्रसाद यादव, नितिश कुमार, शरद यादव, जार्ज फ़र्नांडिस, सुबोधकांत सहाय और जाबिर हुसैन सरीखे नेताओं के लिए जेपी के निधन के लगभग चार दशक बाद आज जेपी के मूल्य, सिद्धांत और उनके आदर्श शायद उतने प्रासंगिक नज़र नहीं आते हैं.

    नब्बे के शुरूआती साल में लालू प्रसाद का बिहार का मुख्यमंत्री बनना एक स्मरणीय घटना थी. लालू ने पटना के गाँधी मैदान में खुले आकाश के नीचे जब लोकनायक जयप्रकाश की प्रतिमा के सामने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के अपने फ़ैसले का ऐलान किया तो एक बारगी बिहार ही क्यों, समूचे देश को यह अनुभव होना स्वाभाविक था कि अब वहाँ जनता का राज कायम होगा.

    शपथ लेने के बाद लालू साइकिल से मुख्यमंत्री सचिवालय गए. उस शुरूआती छवि और आज की उनकी छवि में परस्पर विरोधी चेहरे देखे जा सकते हैं. जेपी के जाति तोड़ो के नारे को लालू ने रंग और आकार दिया. बीते लगभग दो दशक की उनकी राजनीति और उसके परिणाम, पूरे बिहार में जंगल की आग की तरह फैले उग्र जातिवादी उन्माद से ज़ाहिर हैं.

    लालूप्रसाद यादव भ्रष्टाचार के जिस नारे के ख़िलाफ़ सत्ता पर क़ाबिज़ हुए थे, वह उनका राजनीति आधार बन गया. पशुपालन घोटाले में उनकी संलिप्तता की घटना और इन्ही आरोपों में उनकी ग़िरफ़्तारी और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उनकी राजनीतिक स्थिति आज सबकी ज़ुबान पर है.

    नितिश कुमार में भी बहुत फ़र्क नहीं है. उनका राजनीतिक आधार भी जाति पर आधारित है और बढते राजनीतिक अपराध का संरक्षण लालू की तरह उनकी भी राजनीतिक मजबूरी बन गई है.

    (वरिष्ठ पत्रकार राजीव रंजन नाग जेपी आंदोलन से अपने छात्र जीवन में जुड़े रहे हैं. उन्होंने जेपी के जीवन और आंदोलन का अध्ययन भी किया है और एक पुस्तक भी लिख चुके हैं.)

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