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परमाणु समझौताः अंतिम औपचारिकता पूरी

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जुलाई 2005 में अमरीका और भारत के बीच असैन्य परमाणु समझौते पर सहमति बनी
भारत-अमरीका असैन्य परमाणु समझौते को लागू करने की अंतिम औपचारिकता पूरी करते हुए दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने इस पर हस्ताक्षर कर दिए हैं.

अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोंलीज़ा राइस और भारतीय विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने वॉशिंगटन में शुक्रवार को समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते को अमरीकी क़ानून बनाने की औपचारिकता पूरी करते हुए राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने बुधवार को इस पर हस्ताक्षर किए थे.

कांग्रेस के दोनों सदनों ने इसे पहले ही मंज़ूर कर दिया था. इस समझौते के साथ ही भारत के साथ असैनिक मकमसदों के लिए परमाणु ईंधन और तकनीक के व्यापार पर तीन दशकों से लगा हुआ प्रतिबंध ख़त्म हो जाएगा.

इस समझौते को लेकर भारत में यूपीए सरकार को और अमरीका में बुश प्रशासन को बड़ी राजनीतिक मशक्कत करनी पड़ी है. कई लोगों का मानना है कि बुश प्रशासन की विदेश नीति की गिनी चुनी उपलब्धियों में इस समझौते का अहम स्थान होगा.

इसी तरह भारत की यूपीए सरकार भी इसे एक बड़ी उपलब्धि की तरह देख रही है. हालांकि उसे इसके लिए कड़े राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ा है और सरकार को बाहर से साथ दे रहे वामपंथियों का समर्थन खोना पड़ा है.

सहमति-असहमति

अमरीका ने भारत के साथ परमाणु सहयोग पर वर्ष 1974 में प्रतिबंध लगा दिया था. वर्ष 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद तारापुर परमाणु केंद्र के लिए परमाणु ईंधन की सप्लाई बंद कर दी गई थी.

वर्ष 1998 में परमाणु परीक्षणों के बाद ये प्रतिबंध और कड़े कर दिए गए थे. भारत सरकार का मानना है कि इस समझौते से उसे देश और अर्थव्यवस्था की बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी. भारत में अनेक विपक्षी दल इस तर्क से सहमत नहीं हैं.

उधर समझौते के अंतरराष्ट्रीय समीक्षकों का मानना है कि इससे परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर न करने के बावजूद भारत को अपने परमाणु ऊर्जा उद्योग का विस्तार करने की अनुमति मिल जाएगी.

अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस इस समझौते को 'ऐतिहासिक' बता चुकी हैं.

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