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    फुटबाल निर्माण में बालश्रम का उपयोग जारी

    By Staff
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    नई दिल्ली, 9 अक्टूबर (आईएएनएस)। फुटबाल निर्माण में बालश्रम रोकने के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय फुटबाल महासंघ (फीफा) के वर्ष 1996 के प्रसिद्ध समझौते, यूरोपीय संसद के 2007 के प्रस्ताव, भारतीय खेल सामग्री निर्माण उद्योग के संबंध में साफ निर्देशों और सभी सरकारी दावों के बावजूद फुटबाल निर्माण में बाल श्रम का उपयोग जारी है।

    इंटरनेशनल लेबर राइट्स फोरम के सहयोग से बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) द्वारा किए एक नए अध्ययन के अनुसार अभी भी 5,000 बच्चे फुटबाल सिलाई के साथ ही बेसबाल, क्रिकेट बाल, बास्केटबाल वॉलीबाल, टेनिस बाल और अन्य खेलों का सामान बनाने के काम में लगे हुए हैं।

    भारतीय खेल उद्योग कुल 318 तरह के खेल सामान बनाते हैं। उत्तरप्रदेश के मेरठ शहर और पंजाब के जालंधर की झुग्गियों में ये बच्चे अपने परिवार द्वारा भारी कर्ज के चलते बंधुआ मजदूरों की तरह काम करने के लिए मजबूर किए जाते हैं। इसका उनके स्वास्थ्य और शिक्षा पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है।

    प्रसिद्ध बाल अधिकार कार्यकर्ता और बीबीए के अध्यक्ष कैलाश सत्यार्थी द्वारा किए गए अध्ययन के ये निष्कर्ष "ऑफसाइड : चाइल्ड लेबर इन फुटबाल स्टीचिंग- ए केस स्टडी ऑफ मेरठ डिस्ट्रिक्ट" शीर्षक से जारी किए गए हैं। सत्यार्थी ने इस अध्ययन में जिन पांच बच्चों को शामिल किया है वे अब बीबीए के अंतर्गत स्कूल में दाखिल हो चुके हैं। पर अभी भी इनके परिवार को कर्ज से उबारने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

    सत्यार्थी ने बताया कि मेरठ के बाहरी इलाके बुद्धविहार और कमालपुर या नजदीकी गांव शिवाल खास में हजारों बच्चे कृत्रिम चमड़े से फुटबाल बनाने के काम में लगे हुए हैं। इन सामानों पर बाद में 'बालश्रम मुक्त' का ठप्पा लगा दिया जाता है।

    बीबीए द्वारा वर्ष 1996 में पहली बार इस मामले को सामने लाने के बाद से फुटबाल सिलने में बच्चों के उपयोग में काफी अधिक कमी आई है। अंतर्राष्ट्रीय उपभोक्ताओं के दबाव और बीबीए और अन्य स्वंयसेवी संगठनों की गतिविधियों के कारण फुटबाल उद्योग में लगे बच्चों की संख्या 20,000 से घटकर अब 5,000 रह गई है।

    अध्ययन से यह स्पष्ट हो गया है कि इन बच्चों को 12-14 घंटे तक काम लिया जाता है। बच्चों के शरीरिक स्वास्थ्य पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इनमें से 35 प्रतिशत बच्चों को चमड़ा सिलने की सुई से कटने से घाव होता है। अन्य 35 प्रतिशत को आंख में दर्द, 50 प्रतिशत को पीठ दर्द और 85 फीसदी बच्चों को हाथों और अंगुलियों में बराबर दर्द रहता है।

    सत्यार्थी ने कहा कि अध्ययन का उद्देश्य समस्या को अंतर्राष्ट्रीय ग्राहकों के सामने सनसनी के रूप में पेश करना नहीं वरन घरेलू उपभोक्ताओं के बीच यह अभियान शुरू करना है कि वे बालश्रम मुक्त खेल के सामान की मांग करें।

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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